भारतीयों को किसी भी विदेशी चीज को पालतू बनाना आता है। अब यह न्यू इयर क्रिश्चियन है पर आज सुबह सुबह मैंने मंदिरों में गजब की भीड़ देखी। चूँकि यह ऐतिहासिक त्रुटि तो सरकार की रही कि स्वतंत्रता के बाद उसने पोप-प्रवर्तित ग्रेगोरियन कैलेंडर को जारी रखा, जबकि विश्व के कई अन्य देश अपने देशज कैलेंडर पर स्वतंत्रता पाते ही लौट आए थे, इसलिए उसका दोष उस भोली आस्था पर नहीं जाना चाहिए जो नववर्ष के दिन शिवजी के सामने शीश झुकाती है या राममंदिर में प्रसाद बाँट रही है। इस सर को झुकाते हुए भी वह उन्हें लज्जित कर रही है जिन्होंने स्वतंत्रता को अंग्रेजी व्यवस्था की निरन्तरता में देखा, एक नवारंभ में नहीं।
वह श्रद्धा जो मैंने काली मंदिर में देखी, वह नवारंभ की तरह आने वाले वर्ष में स्वस्तिकामना की श्रद्धा है। आज जो मंदिरों में भीड़ उमड़ती है, तो यह केवल अंधानुकरण नहीं है, बल्कि एक नए समय-चक्र के प्रारंभ पर ईश्वर से आशीर्वाद लेने की गहरी मानवीय आवश्यकता का ही द्योतक है। मंदिरों में यह नववर्ष की पूजा एक सृजनात्मक संश्लेषण है। यह भारतीय जनमानस की उस क्षमता को दर्शाता है जो विरोधाभासों को सामंजस्य में बदल देती है। कि उस पोपाज्ञा को जारी रखने की सरकारी दृष्टि कुछ भी हो, हम भारतीय किसी भी चीज को अपनी आध्यात्मिक परंपराओं के माध्यम से फ़िल्टर करते हैं।
जापान ने अपना पारंपरिक कैलेंडर बनाए रखा, चीन अपने चंद्र नववर्ष को राष्ट्रीय महत्व देता है, और कई इस्लामिक देश हिजरी कैलेंडर का उपयोग करते हैं।पर भारत? यह भीड़ एक अवचेतन प्रतिरोध है। जनता अपनी सरकार की नीतियों के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखने का प्रयास कर रही है। वह भोली आस्था वास्तव में एक गहरा सांस्कृतिक विवेक है जो विदेशी समय-गणना को भी भारतीय आध्यात्मिकता की चादर से ढक देता है। यह उन नीति-निर्माताओं को लज्जित करती है जिन्होंने स्वतंत्रता को केवल सत्ता-हस्तांतरण समझा, न कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अवसर।
आप इसे एक तरह की सांस्कृतिक संकरता (cultural hybridization) के रूप में देख सकते हैं। मंदिरों में नववर्ष पर जाने वाली भीड़ को यह दृष्टिकोण प्रतिरोध और समायोजन का समवर्ती अस्तित्व मानता है। यह न तो शुद्ध परंपरावाद है, न पूर्ण आधुनिकीकरण। यह एक तीसरा स्थान (third space) है जहाँ भारतीय अपनी विशिष्ट पहचान गढ़ रहे हैं। वे पश्चिमी समय-गणना को अस्वीकार नहीं कर रहे, बल्कि उसे अपनी शर्तों पर पुनर्परिभाषित कर रहे हैं।
धार्मिक दृष्टिकोण से, किसी भी शुभ अवसर पर मंदिर जाना स्वाभाविक है। हिंदू धर्मशास्त्र में समय को चक्रीय माना गया है, और प्रत्येक नया चक्र शुभारंभ का अवसर होता है। चाहे वह पहली जनवरी हो, चैत्र प्रतिपदा हो, या दिवाली – मूल भाव मंगलकामना और आत्म-नवीकरण का है। यह गहरी आध्यात्मिक समझ है कि समय का हर क्षण पवित्र है और उसे उसी तरह से जीना चाहिए।
(लेखक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मप्र के चुनाव आयुक्त के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं)

