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फिल्मी दुनिया ने हमारे पंडितों, महान चरित्रों और देवी-देवताओं का फूहड़ मजाक बनायाः डॉ. कुमार विश्वास

मुंबई। गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब द्वारा आयोजित ड़ॉ. कुमार विश्वास के अपने अपने राम कार्यक्रम के दूसरे और तीसरे दिन पूरा कार्यक्रम स्थल खचाखच भरा रहा। कार्यक्रम में ऐसे ऐसे बुजुर्ग भी पहुँचे जो चल पाने में असमर्थ थे, और कई दिव्यांग जन भी पूरे उत्साह और श्रध्दा के साथ कार्यक्रम में पहुँचे। क्लब की ओर से इन सभी के लिए व्हील चेअर की व्यवस्था की गई थी।  क्लब के चारों ओर अवयवस्थित और आयोजन स्थल पर उमड़ी भीड़ के बावजूद इन सबकी श्रध्दा देखने लायक थी। कार्यक्रम में फिल्मी दुनिया के निर्माता-निर्देशक, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सहित समाज के विभिन्न क्षेत्रों के कई प्रबुध्द लोग उपस्थित थे।

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इस अवसर पर उन्होंने गोरेगाँव स्पोर्ट्स क्लब द्वारा प्रकाशित कॉफी टेबल बुक का भी विमोचन किया। इस पुस्तक में क्लब के 40 वर्षों के गौरवशाली इतिहास, इस क्लब के निर्माण में अपना योगदान देने वाले लोगों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।

कार्यक्रम के समापन पर प्रभु श्री रामचन्द्र जी का राजतिलक भी किया गया। कार्यक्रम के अंत में काशी से आए पंडितों द्वारा प्रस्तुत  भव्य गंगा आरती ने उपस्थित दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

अपने अपने राम पर व्याख्यान  प्रारंभ करते हुए उन्होंने कहा कि फिल्मी दुनिया ने हमारे देवताओं से लेकर धर्मग्रंथों और महर्षि नारद जैसे विद्वान को उपहास का पात्र बना दि

या, इसका एक पूरी पीढ़ी पर घातक असर पड़ा।

डॉ. कुमार विश्वास ने रामकथा के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से राम के चरित्र के कई आयामों को एक नई अवधारणा, वैज्ञानिकता और आज के दौर की प्रासंगिकता के साथ इतने तर्कयुक्त और सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया कि  उपस्थित श्रोताओं को रामचरित मानस के अनसमझे और अनकहे प्रसंगों की जानकारी मिली।

उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम की संस्कृति है। हमने कभी किसी देश  पर आक्रमण कर उसे जीतने का प्रयास नहीं किया। राम ने अहंकारी रावण को मारकर लंका का राज्य विभिषण को सौंप दिया। हम पिछले सैकड़ों वर्षों से हमारे बारे में लिखे गए झूठे इतिहास और काल्पनिक कथाओं के माध्यम से हमारे गौरवशाली इतिहास को, हमारे धर्मग्रंथों को निंदित किया गया। लेकिन, अब परा दौर बदल चुका है, आज की नई पीढ़ी सत्य जानना चाहती है और सत्य हर तरह से बाहर आ रहा है।

उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों की चर्चा करते हुए कहा कि पटना के चन्द्रगुप्त, मलयदेश (मलयदेश प्राचीन भारत में दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया (आज का मलेशिया, इंडोनेशिया) के लिए प्रयुक्त सांस्कृतिक-भौगोलिक शब्द था) का सिंहरण, चीन व्हेनसांग जैसे लोगों को आचार्य शीलभद्र ने शिक्षा दी।

शंकराचार्य ने पूरे देश में पैदल भ्रमण कर हमारी संस्कृति को बचाया और अपने धर्म के प्रति लोगों में आत्मविश्वास पैदा किया।

उन्होंने कहा कि भारत के बाहर पढ़ने जाना गलत नहीं, लेकिन वहाँ जाकर अपने देश के बारे में गलत सोचना और बुरा कहना गलत है। ज्ञान की सीमाएँ पूरे विश्व को छूती है। इसे देश की भौगोलिक सीमा में नहीं बाँधा जा सकता।

राम का वन जाना ऋषि संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि विद्वान व संस्कारवान व्यक्ति के साथ बैठने मात्र से ही सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

हमारे देश का नाम भारत बहुत गूढ़ अर्थ रखता है भा का अर्थ होता है प्रकाश और रत का मतलब जो उसमें निरंतर रत है या लगा हुआ है-इसी का नाम भारत है।

आज पूरा विश्व एआई के खतरे से जूझ रहा है और इस खतरे से भारत ही निपट सकता है क्योंकि हमारी संस्कृति में शक्ति में विकृति नहीं बल्कि सकारात्मकता का भाव होता है।

उन्होंने इस बात पर दुःख व्यक्त किया कि हम अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, पैर छूने जैसे कार्य को अब घुटना छूने तक सीमित कर दिया गया है।

डॉ. कुमार विश्वास ने कहा कि रामचरित मानस प्रबंधन, राजनीति, कूटनीति से लेकर समाज व्यवस्था को चलाने और समझने का अद्भुत ग्रंथ है।

राम ने रावण से चर्चा करने अपने दूत के रूप में दोबारा हनुमान को नहीं भेजा क्योंकि ने लंका दहन कर चुके थे। दूसरी बार उन्होंने बाली के पुत्र अंगद को भेजा, क्योंकि बाली ने रावण को पराजित कर उसे अपनी बगल में दबाकर पृथ्वी का चक्कर लगाया था। इसका कारण था कि रावण को ये अहसास हो जाए कि राम के पास कितने शूरवीर योध्दा हैं। इसी तरह मेघनाथ के मरने के बाद ही उन्होंने विभीषण को युध्द में अपने साथ लिया, अगर वो पहले ही युध्द में विभीषण को अपने साथ ले लेते तो हो सकता है रावण व विभिषण भावुक हो कर युध्दभूमि में गले मिल लेते। लेकिन रावण को यह पता लग गया था कि मेघनाथ की मृत्यु का कारण विभिषण है, इसलिए वह विभिषण के प्रति भी क्रोध व बदले से भरा रहा।

रावण विद्वान होकर भी अनियंत्रित ज्ञान का प्रतीक था, जबकि राम नियंत्रित ज्ञान के प्रतीक थे। कुमार विश्वास ने कहा अकि उत्तम कुल में जन्म लेना इस बात की गारंटी नहीं है कि व्यक्ति संस्कारवान होगा। रावण तो ब्रह्मा का नाती और ऋषि पुलत्स्य का पुत्र था फिर भी वह अपने अहंकार की वजह से दुष्टता का प्रतीक बना।

उन्होंने कहा कि सफल व्यक्ति की सफलता उसका गुण नहीं बल्कि सफल होकर विनम्र बने रहना उसकी सफलता का शीर्ष है।

राम की पदयात्रा -पद की यात्रा नहीं थी जैसे कि आजकल के नेता पदयात्रा करते हैं।

हमने अपने दुश्मन देश से तीन युध्द लड़े, हम विजयी रहे मगर हमने उस पर कब्जा नहीं किया, जबकि युध्द हमने नहीं किया हम पर थोपा गया था।

राम ने वनवास के माध्यम से देश केछ वनवासी लोगों से मिलने, उनकी समस्याओँ को जानने और अपनी वनवासी संस्कृति को समझने का प्रयास किया। अगर राम चाहते तो अयोध्या के बाहर जंगल में कुटी बनाकर 14 वर्ष वहीं बिता देते।

नीति लोगों की राय से ज्यादा महत्व रखती है, राम ने अयोध्या नगरी के लोगों की इच्छा के विपरीत नीति का पालन करते हुए वनयात्रा स्वीकार की, अगर वे भीड़ और लोगों की मांग का अनुसरण करते तो कोई उनका विरोध भी नहीं करता। इसी तरह राजा को नीति का पालन करना चाहिए, भीड़ या जनता की राय का नहीं। नीति राष्ट्र हित में होती है, जबकि लोगों की मांग एक तरह से स्वार्थ का प्रतीक होती है।

रामचरित मानस के विविध प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कुमार विश्वास ने कहा कि शबरी के झूटे बेर राम को इसलिए स्वादिष्ट लगे कि उनकी माता कौशल्या स्वयं छत्तीसगढ की थी और वो बचपन में उन्हें वही बेर खिलाती थी। उन्होंने कहा कि हमारे परिवारों में यही समस्या है कि हर बेटे को माँ के हाथ का खाना ही अच्छा लगता है, पत्नी के हाथ का नहीं, क्योंकि पहली बार जो स्वाद मिलता है वह आजीवन याद रहता है।

शबरी की भक्ति को लेकर राम ने कहा कि शबरी ने विवाह करने से इसलिए इँकार कर दिया था क्योंकि विवाह के लिए हजारों भेड़ों और बकरियों की बलि दी जा रही थी। बाद में उसने युवावस्था में  मतंग ऋछि के आश्रम को संवारने की सेवा देती रही। जब ऋषि का अंतिम समय आया तो शबरी ने उनसे कहा कि आपके शिष्यों ने तो ज्ञान पाया है, यज्ञ किये हैं उनको तो भगवान मिल जाएंगे लेकिन मुझे कैसे मिलेंगे, तो मतंग ऋषि ने उसे वरदान दिया कि तुझसे मिलने तो भगवान खुद आएँगे और तू भगवान को राह दिखाएगी।

शबरी की भक्ति पर उन्होंने कवि रामप्रकाश आकुल की इस कविता से उन्होंने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया

पथरीली गीली आँखों में भावों की सरयू लहराई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

छोटा सा पलाश का दाेना

दोने में अधखाये फल हैं

खाने और खिलाने वाले

दोनों के ही नयन सजल हैं

मेवे पकवानों ने बेरों के जैसी किस्मत कब पाई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

आज ज़रा सी पर्णकुटी से

कंचन जड़े महल जलते हैं

जंगल के फूलों की माला

से सब नीलकमल जलते हैं

एक भीलनी की सेवा से भावविभोर हुयी ठकुराई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

सत्य सनातन समानता का

वैसा नाम नहीं हो पाया

और राम के बाद धरा पर

कोई राम नहीं हो पाया

किसने इतनी मर्यादा से ऊँच नीच की रेख मिटाई

जब शबरी की पर्णकुटी में अवधी में बोले रघुराई

हमका भूख लगी है माई !

वाल्मिकी रामायण में राम के वनवास से आने के बाद पूरी कथा का विराम हो जाता है, लेकिन कुछ लोगों ने षड़यंत्र करके रामकथा में सीता के परित्याग की झूठी कहानी चलाई  और हमने सच मान ली।

उन्होंने श्रोताओं द्वारा पूछे गए सवालों का स्वागत करते हुए कहा कि सवाल पूछना हमारी परंपरा  का गौरव रहा है, जबकि दूसरे धर्म के लोग सवाल पूछने पर सिर तन से जुदा करने की बात करते हैं।

एक श्रोता के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि बुराई पर नियंत्रण तभी हो सकता है जब आपको पता चल जाए कि आपके अंदर बुराई क्या है। बुराई को जान लेने के बाद भी उसके हिसाब से जीते रहे तो वही बुराई आपको नष्ट कर देगी, रावण इसका प्रत्.क्ष उदाहरण है।

उन्होंने रमेश सान के शेर की दो पंक्तियाँ प्रस्तुत की-

एक मुठ्टी राख में तब्दील होना है, किस करीने से चिता पर लाद दिया है।

उन्होंने कहा कि जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है। आत्मा से हमेशा सच निकलता है और मन भटकाता है, जो आत्मा की सुनता है वह कभी कोई गलत काम नहीं कर सकता। मन की इच्छा अनंत है, लेकिन शरीर की सीमा निश्चित है।

अपने व्याख्यान के दौरान उन्होंने गीता और रामचरित मानस के कई रोचक प्रसंगों के माध्यम से इन ग्रंथों की आज के दौर में उपयोगिता पर चर्चा की और नई पीढ़ी को इसको समझने पर जेर दिया।

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