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यूपीआई से ठगी के जाल में फँस रहे हैं पढ़े -लिखे भी और सीधी सादे ग्रामीण भी

मोबाइल और यूपीआई गाँवों तक पहुँच गए हैं लेकिन समझ की कमी से लोग साइबर ठगी का शिकार हो रहे हैं. जानें कैसे कम डिजिटल साक्षरता, भाषा की बाधाएँ और कमज़ोर पुलिस ढांचा ग्रामीण साइबर अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं.

हाल के वर्षों में भारत का डिजिटल परिवर्तन अभूतपूर्व रहा है. देश में 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और 40 करोड़ से ज़्यादा सक्रिय यूपीआई खाते हैं. डिजिटल समावेशन का सपना अब देश के सबसे दूर-दराज़ इलाकों तक पहुंच चुका है लेकिन इस बड़ी उपलब्धि के साथ एक विरोधाभास भी सामने आया है- जो तकनीकें ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत को सशक्त बना रही हैं, वही लाखों लोगों को जटिल डिजिटल धोखाधड़ी के लिए असुरक्षित भी बना रही हैं.

प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, भारत में साइबर अपराध के मामलों में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. वर्ष 2025 में लगभग 25 लाख साइबर मामले दर्ज हुए जो 2024 में 22.68 लाख थे. राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के अनुसार, 2025 में साइबर अपराध से देश को लगभग ₹9,812.96 करोड़ का नुकसान हुआ. इनमें ज़्यादातर मामले ऑनलाइन सट्टेबाज़ी, गेमिंग घोटालों और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े थे.

डिजिटल समावेशन का सपना अब देश के सबसे दूर-दराज़ इलाकों तक पहुंच चुका है लेकिन इस बड़ी उपलब्धि के साथ एक विरोधाभास भी सामने आया है- जो तकनीकें ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत को सशक्त बना रही हैं.

गृह मंत्रालय (MHA) के अनुसार, 2021 के बाद से भारत में साइबर अपराध 400 प्रतिशत तक बढ़ गया है और अब ग्रामीण तथा अर्ध-शहरी क्षेत्र डिजिटल ठगी के नए केंद्र बनते जा रहे हैं. टियर-2 और टियर-3 शहरों में साइबर सुरक्षा व्यवस्था कमज़ोर होने के कारण वहाँ अपराध तेजी से बढ़े हैं. जो क्षेत्र पहले डिजिटल अर्थव्यवस्था से लगभग बाहर थे, वे अब साइबर अपराध के मुख्य केंद्र बन रहे हैं.

ग्रामीण साइबर अपराध
ग्रामीण इलाकों में साइबर अपराध का बढ़ना कोई संयोग नहीं है बल्कि यह सामाजिक और तकनीकी बदलाव का नतीजा है. बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सस्ते स्मार्टफोन और सस्ते इंटरनेट ने डिजिटल पहुँच तो बढ़ा दी है लेकिन डिजिटल समझ नहीं बढ़ी है. सट्टेबाजी और गेमिंग ऐप, जो मनोरंजन के रूप में पेश किए जाते हैं, साइबर ठगी के आसान ज़रिया बन गए हैं.

2025 में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, कम डिजिटल साक्षरता, भाषा की सीमाएँ और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन की जानकारी की कमी साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ी कमजोरी हैं. एक मामले में एक ऑटो चालक ने नकली क्रिकेट फैंटेसी ऐप के ज़रिये ₹20 लाख गंवा दिए जबकि दूसरे व्यक्ति को ऑनलाइन सट्टेबाज़ी में ₹75 लाख का नुकसान हुआ. ऐसी घटनाएँ हज़ारों गाँवों में दोहराई जा रही हैं.

ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में 2021 से 2024 के बीच साइबर अपराध 400 प्रतिशत तक बढ़ा है, जबकि महानगरों में यह बढ़ोतरी अपेक्षाकृत कम रही. इससे साफ है कि डिजिटल दूरी भले कम हो रही हो लेकिन कम जागरूक आबादी ज़्यादा असुरक्षित है. कुल मामलों में 70 प्रतिशत से अधिक वित्तीय धोखाधड़ी के हैं जिनमें फिशिंग, ओटीपी चोरी, यूपीआई फ्रॉड और नकली निवेश योजनाएं शामिल हैं.

एक शोध के अनुसार, कम डिजिटल साक्षरता, भाषा की सीमाएँ और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन की जानकारी की कमी साइबर अपराधियों के लिए सबसे बड़ी कमजोरी हैं. एक मामले में एक ऑटो चालक ने नकली क्रिकेट फैंटेसी ऐप के ज़रिये ₹20 लाख गंवा दिए जबकि दूसरे व्यक्ति को ऑनलाइन सट्टेबाज़ी में ₹75 लाख का नुकसान हुआ.

ठग अक्सर केवाईसी अपडेट या लोन दिलाने के नाम पर नए डिजिटल उपयोगकर्ताओं को फँसाते हैं. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों में ग्रामीण साइबर ठगी के मामले सबसे तेज़ी से बढ़े हैं जिसका सीधा संबंध मोबाइल इंटरनेट की तेज़ पहुँच से है.

अपराध की जड़ें और जोखिम

ग्रामीण भारत की साइबर असुरक्षा की जड़ें गहरी और आपस में जुड़ी हुई हैं. सबसे बड़ा कारण डिजिटल ढांचे और डिजिटल साक्षरता के बीच असंतुलन है. डिजिटल इंडिया और भारतनेट जैसी योजनाओं से 2.5 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों तक इंटरनेट पहुँचा है लेकिन साइबर सुरक्षा जागरूकता अभी पीछे है. ग्रामीण इलाकों में पहली बार डिजिटल सेवाओं का उपयोग करने वाले लोग-जैसे छोटे व्यापारी, किसान और स्वयं सहायता समूहों के सदस्य-जल्दी मुनाफे के लालच में फर्जी योजनाओं का शिकार बन जाते हैं.

इसके अलावा, अंग्रेज़ी आधारित साइबर इंटरफेस और स्थानीय भाषाओं के बीच की दूरी जोखिम को और बढ़ाती है. ठग स्थानीय बोली और सामाजिक संदर्भों का इस्तेमाल कर भरोसा जीत लेते हैं. झारखंड के जामताड़ा और हरियाणा के मेवात जैसे इलाकों में संगठित साइबर गिरोह सक्रिय हैं जिन्होंने धोखाधड़ी को एक तरह की ग्रामीण ‘अर्थव्यवस्था’ बना दिया है.

ग्रामीण पुलिस ढांचे की कमज़ोरी भी एक बड़ी समस्या है. कई थानों में न तो साइबर सेल हैं और न ही फॉरेंसिक सॉफ़्टवेयर. तकनीकी रूप से प्रशिक्षित पुलिसकर्मियों की भारी कमी है, जिससे ऐसे मामलों की जाँच और न्याय प्रक्रिया दोनों प्रभावित होती हैं.

ग्रामीण साइबर सुरक्षा के लिए नई योजनाएं

खतरे की गंभीरता को देखते हुए भारत सरकार ने नीति, तकनीक और सामुदायिक भागीदारी को जोड़ते हुए कई पहल शुरू की हैं. गृह मंत्रालय के तहत भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) अब एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में काम कर रहा है, जो राज्यों को डिजिटल फॉरेंसिक, डेटा विश्लेषण और जागरूकता अभियानों में मदद करता है.

झारखंड के जामताड़ा और हरियाणा के मेवात जैसे इलाकों में संगठित साइबर गिरोह सक्रिय हैं जिन्होंने धोखाधड़ी को एक तरह की ग्रामीण ‘अर्थव्यवस्था’ बना दिया है.

दिसंबर 2025 में शुरू की गई महाराष्ट्र पुलिस–माइक्रोसॉफ्ट को-पायलट पहल भारत की साइबर सुरक्षा रणनीति में एक अहम कदम है. MahaCrimeOS एआई पुलिस को मामलों को तेज़ी से सुलझाने में मदद करता है. 2024 में शुरू हुआ साइबर सुरक्षित भारत 2.0 कार्यक्रम राज्यों और ज़िलों में साइबर क्षमता निर्माण पर ज़ोर देता है. इसके साथ ही, भारतीय रिज़र्व बैंक ने MuleHunter.AI लॉन्च किया है, जो खासतौर पर ग्रामीण इलाकों से होने वाले संदिग्ध लेनदेन की पहचान करता है.

हालाँकि साइबर सेल बनाए गए हैं, लेकिन अब भी प्रशिक्षित कर्मियों, एआई आधारित टूल्स और I4C व CERT-In के साथ डेटा साझा करने की व्यवस्था की कमी बनी हुई है. MeitY के सहयोग से Kyndryl द्वारा शुरू किया गया ‘Cyber Rakshak’ कार्यक्रम ग्रामीण महिलाओं को साइबर सुरक्षा कौशल सिखा रहा है. वहीं, “Protecting Our Villages” जैसी पहलें एआई को ज़मीनी पुलिसिंग से जोड़ रही हैं. इससे जांच की जगह पहले से सतर्क रहने की संस्कृति विकसित हो रही है.

महत्वाकांक्षा और ज़मीनी हकीकत के बीच सेतु

अब तक हुई प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए भारत को केवल घटनाओं के बाद कार्रवाई करने वाली रणनीतियों से आगे बढ़कर पहले से सतर्क शासन व्यवस्था अपनानी होगी. इसके लिए तीन प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताएँ स्पष्ट रूप से सामने आती हैं.

पहला, साइबर साक्षरता को नागरिक अधिकार के रूप में स्थापित करना होगा. इसे स्कूलों के पाठ्यक्रम और वयस्क शिक्षा कार्यक्रमों में शामिल किया जाना चाहिए. स्थानीय भाषाओं में तैयार डिजिटल सुरक्षा मॉड्यूल, जो सामुदायिक सेवा केंद्रों और स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से पहुँचाए जाएं, आम लोगों के लिए साइबर सुरक्षा को सरल और समझने योग्य बना सकते हैं.

जब साइबर अपराधी एल्गोरिद्म और सामाजिक मनोविज्ञान का इस्तेमाल हथियार के रूप में कर रहे हैं, तो भारत की जवाबी रणनीतियाँ भी उतनी ही स्मार्ट और समावेशी होनी चाहिए.

दूसरा, कानून प्रवर्तन संस्थाओं की क्षमता बढ़ाना बेहद आवश्यक है. हालांकि भारत ने केंद्र, राज्य और ज़िला स्तर पर साइबर सेल स्थापित करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, फिर भी इन इकाइयों को प्रशिक्षित मानव संसाधन और बुनियादी साइबर फॉरेंसिक क्षमताओं की कमी का सामना करना पड़ रहा है. इसमें एआई आधारित विश्लेषण उपकरण, मानकीकृत प्रशिक्षण मॉड्यूल और I4C तथा CERT-In के साथ पारदर्शी डेटा साझा करने की व्यवस्था शामिल है.

तीसरा, जन जवाबदेही और निजता की सुरक्षा को तकनीकी प्रगति के साथ-साथ मजबूत करना होगा. भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (2023) एक ठोस आधार देता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इसका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी असमान है.

एआई से मजबूत डिजिटल गाँव

ग्रामीण भारत अपनी डिजिटल यात्रा के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है. तकनीक के लोकतंत्रीकरण ने शिक्षा, वित्त और शासन के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इसके साथ ही शोषण के नए खतरे भी पैदा हुए हैं. जब साइबर अपराधी एल्गोरिद्म और सामाजिक मनोविज्ञान का इस्तेमाल हथियार के रूप में कर रहे हैं, तो भारत की जवाबी रणनीतियाँ भी उतनी ही स्मार्ट और समावेशी होनी चाहिए.

नैतिक एआई डिज़ाइन, सामुदायिक भागीदारी और सतत सार्वजनिक–निजी सहयोग के ज़रिये भारत साइबर सुरक्षा को डिजिटल नागरिकता का एक मूल स्तंभ बना सकता है.

महाराष्ट्र पुलिस–माइक्रोसॉफ्ट को-पायलट पहल और इससे जुड़ी एआई आधारित योजनाएं केवल तकनीकी उपलब्धियाँ नहीं हैं, बल्कि ये डिजिटल क्षेत्र को असुरक्षा के स्थान से सतर्कता और सुरक्षा के क्षेत्र में बदलने का प्रयास हैं. आखिरकार, ग्रामीण साइबर अपराध के खिलाफ़ लड़ाई केवल डेटा की सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विश्वास को बचाने की लड़ाई है-और तेज़ी से डिजिटल होती लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा ही सबसे मूल्यवान पूंजी है.


सौम्या अवस्थी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजी एंड टेक्नोलॉजी में फेलो हैं।
साभार- https://www.orfonline.org/ से 

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