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बस मनुस्मृति का विरोध करना है क्यों करना है किसी को पता नहीं

पितृसत्ता दिल्ली के कुछ शैक्षणिक परिसरों का प्रिय शब्द है। जैक डार्सी को भारत बुलाकर स्मैश ब्राह्मिनिकल पैट्रिआर्की का नारा लगाने वाले हमने देखे हैं। वह कुछ ऐसा था कि पितृसत्ता यदि ब्राह्मणिक हो तो ही आपत्ति है, किन्तु यदि वह शूद्रवादी हो या क्षत्रियवादी हो या वैश्यवादी हो तो उसे स्मैश नहीं करना है। कि यदि वह पितृसत्ता क्रिश्चियन हो या यहूदी हो या इस्लामी हो तो पाली पोसी जायेगी पर यदि वह ब्राह्मणिक है तो स्मैश करेंगे।
इस बुद्धि के लिए ऐसे परिसरों में शिक्षा सब्सिडाइज होती है। पर चलिए अब इसी बात को मनुस्मृति के दंडविधान की सापेक्ष तुलनाओं से समझें।
बाइबल यह कहती है कि Anyone who curses his father or mother must surely be put to death (Exodus 21:17; Leviticus 20:9). कि जो भी अपने पिता या माता को गाली देता है या कटु वचन कहता है, उसे मार ही डालना चाहिए। ध्यान दीजिए must शब्द पर। ध्यान दीजिए surely शब्द पर। बाद में जीसस भी एक प्रसंग में इस कमांड की पुष्टि करते हैं। तब प्रसंग ऐसे लोगों का है जो अपने पैरेंट्स का पोषण न करने के लिए रिलीजस परंपराओं का हवाला दे रहे थे।
आप देखिए अपराध और दंड के इस अनुपात को। पैरेंट्स को दुर्वचन कहे कि मरे।
इसकी तुलना में मनुस्मृति क्या कहती है? उसके अनुसार :
पिताऽचार्यः सुहृत्माता भार्या पुत्रः पुरोहितः ।
नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मे न तिष्ठति ॥
न तो पिता न आचार्य न मित्र न माता न पत्नी न पुरोहित राजा के लिए अदंड्य हैं जो स्वधर्म का पालन नहीं करते। पिता या माता यदि बच्चे के प्रति अपने कर्त्तव्य निर्वहन में लापरवाह है तो भी और आचार्य या पुरोहित यदि अपने कर्त्तव्य के प्रति असावधान है तो भी।
और यदि संतति गड़बड़ करे तो मनु कहते हैं कि
मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम् ।
आक्षारयंशतं दाप्यः पन्थानं चाददद् गुरोः॥
कि जो माता, पिता, पुत्री, भाई, पुत्र या गुरु में बिगाड़ पैदा करता है, उनके बीच दरार डालता है, उस पर सौ (पण) का दंड लगायें, उस पर भी जो गुरु की राह रोकता है। यानी एक तरह का आर्थिक दंड।
आक्षारयं का अर्थ मेधातिथि ने बदनाम करने या बिगाड़ पैदा करने से लिया है। गोविंदराज, कुल्लूक और राघवनंद ने किसी अपराध से लिया है और नंदन ने उन्हें क्रुद्ध करने से लिया है।

अब आप ही फ़ैसला करें कि किस व्यवस्था में पितृसत्ता रचने की ज्यादा संभावना है? पैट्रिआर्की का शब्दशः अर्थ होता है- द रूल ऑफ द फादर। अत: पिता को curse करने पर यदि मार ही डाला जाये तो कोई विद्रोह की गुंजाइश ही नहीं रहेगी।

वैसे दोनों के प्रति फेयर हों तो यह स्मरण करना जरूरी है कि बाइबिल ने सिर्फ पिता की बात नहीं, माता की बात भी की।उधर मनु सिर्फ माता पिता की बात नहीं करते, वे भार्या, आचार्य, पुरोहित, पुत्र, पुत्री, गुरु, पुरोहित, मित्र सबकी बात करते हैं। उधर मनु का कहना यह है कि : ब्राह्यस्य जन्मनः कर्त्ता स्वधर्मस्य च शासिता। बालोऽपि विप्रो वृद्धस्य पिता भवति धर्मतः॥ यानी यह कि विद्वान बालक वृद्ध का पिता होता है। यानी वर्ड्सवर्थ का वह Child is the father of man की बात मनु के यहाँ सिद्ध होती है पर मनु मनु हैं। वे जेनेरिक बात कहने की जगह क्वालिफ़ाइड बात करते हैं। ज्ञान उनके यहाँ आत्यन्तिक मूल्य है। वे अंगिरा वंश के ‘शिशु’ नामक मंत्रदृष्टा विद्वान् का उदाहरण देते हैं जिसने अपने पिता के समान चाचा आदि को पढ़ाया और उन्हें पुत्र कहकर सम्बोधित किया जिससे उन चाचा आदि पितरों ने गुस्से में उसके औचित्य के सम्बन्ध में अन्यों को पूछा तब सभी विद्वानों ने एकमत होकर उनसे कहा कि तत्त्वदर्शी शिशु ने न्यायोचित सम्बोधन किया है। मनु के यहाँ जन्म नहीं, ज्ञान तय करता है कि कौन पिता है कौन बालक।

अज्ञो भवति वै बालः पिता भवति मन्त्रदः ।
अज्ञं हि बालमित्याहुः पितेत्येव तु मन्त्रदम् ॥
न हायनैर्न पलितैर्न वित्तेन न च बन्धुभिः । ऋषयश्चक्रिरे धर्म योऽनूचानः स नो महान् ॥
क्योंकि जो विद्या- विज्ञान से रहित है वह बालक और जो विद्या-विज्ञान का दाता है उस बालक को भी पिता मानना चाहिए क्योंकि सब शास्त्रों और आप्त विद्वानों ने अज्ञानी को ‘बालक’ और ज्ञानदाता को ‘पिता’ कहा है ॥
न अधिक वर्षों का होने से, न श्वेत बाल के होने से, न अधिक धन से, न बड़े कुटुम्ब के होने से मनुष्य बड़ा होता है, किन्तु ऋषि-महात्माओं का यही नियम है कि जो हमारे बीच में वेद और विद्या-विज्ञान में अधिक है, वही बड़ा अर्थात् वृद्ध पुरुष है।
ब्राह्मणिक पैट्रिआर्की की ज्ञानमूलक प्रकृति मूर्खों को समझ कभी न आएगी। वे तो बिब्लिकल ट्रीटमेंट को ही डिजर्व करते हैं।

(लेखक मध्य प्रदेश के सेवा निवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)
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