Homeसोशल मीडिया सेभारतीय परिवारों को विभाजित करने का खेल ऐसे हो रहा है

भारतीय परिवारों को विभाजित करने का खेल ऐसे हो रहा है

अपने पुरुषों के बिना एक महिला को नियंत्रित करना आसान होता है।
जो पिता होता है,वो अपनी बेटी की सुरक्षा और देखभाल चाहता है।
जो पति होता है वो अपनी पत्नी की सुरक्षा और देखभाल करना चाहता है।
एक बेटा भी अपनी माँ की रक्षा और देखभाल करना चाहता है।
ये तीनों ही पुरुष,एक महिला के जीवन में भावनात्मक रूप से सबसे अधिक जुड़े हुए लोग हैं। उन्हें उस महिला के नुकसान से कुछ भी फायदा नहीं होता, बल्कि उस महिला की भलाई से सब कुछ लाभ होता है।

इसलिए स्वाभाविक है कि उन्हें हटाना आवश्यक बन जाता है ।

सबसे पहले, पिता।
अपनी बेटी के लिए उसकी चिंता को नियंत्रण के रूप में देखा जाता है।
उसका अनुशासन,दमन बन जाता है।
दुनिया के पुरुषों के साथ उसका अनुभव… अचानक अप्रासंगिक हो जाता है।
अगर वो जानना चाहता है कि उसकी बेटी किससे शादी करती है तो उसे अत्याचारी कहा जाता है । वो यह जानना इसलिए नहीं चाहता कि वह अपनी बेटी की स्वतंत्रता से नफरत करता है… बल्कि इसलिए कि वह अच्छी तरह जानता है कि पुरुष एक महिला का जीवन कैसे बर्बाद कर सकते हैं।
पिता के इन पहलुओं पर कभी चर्चा नहीं होती।
केवल एक ही शब्द की अनुमति है: पितृसत्ता।

अब बारी है पति की।
अगर वह परिवार को महत्व देता है, तो वह नियंत्रणकारी है।
अगर वह तुम्हारे मातृत्व को महत्व देता है, तो वह तुम्हें केवल एक गर्भ मानता है जो उसके बच्चे पैदा करेगा।
अगर वह घर के कामों में तुम्हारे योगदान की उम्मीद करता है, तो वह तुम्हारा शोषण कर रहा है।
अगर वह तुम्हारी सुरक्षा को लेकर चिंतित है, तो वह तुम्हारी स्वतंत्रता पर शिकंजे कस रहा है।

याने,सभी निष्कर्ष पहले से ही तय है:
पति को एक अत्याचारी माना जाना चाहिए।
डाइवोर्स को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
परिवार को कमजोर किया जाना चाहिए।

चलिये,दो महत्व के पुरुष याने पिता और पति तो निपटा दिये।
अब सिर्फ बेटा बचा है। लेकिन वह भी तो एक समस्या ही है।
तो तुम्हें बताया जाता है कि कम बच्चे होना प्रगति है।
तुम्हें बताया जाता है कि अगर बेटा न हो कर बेटी ही हो तो उसे गर्व होना चाहिए।
अगर बेटा हो भी जाये तो तो… वह भविष्य में एक तानाशाह बन सकता है।
इसलिए उसकी मर्दानगी को बेअसर किया जाना चाहिए। यह उसको सुधारना है। ऐसा करोगी तो तुम समाज को बेहतर बनाओगी।
उसे उस तरह का पुरुष नहीं बनना चाहिए जो रक्षा करता हो।

और बस ऐसे ही… पिता हाशिए पर। पति त्याग दिया गया। बेटे का व्यवहार बदल दिया गया।

वे तीन पुरुष जो तुम्हारी भलाई के लिए अपनी जान दे सकते थे, अब तुम्हारी जिंदगी से बाहर हो गए हैं।
तो बचा क्या और कौन :
राज्य।
कोरपोरेट्स ।
एनजीओज ।
और एलिट याने अभिजात वर्ग।
ये सभी वही हैं जिनका तुम्हारे जीवन से कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं है… लेकिन तुम्हारे जीवन पर पूर्ण कंट्रोल है।

असल में जिंदगी एक बड़ी सच्चाई है जिसे वे बोलना नहीं चाहते:
प्रेम के बिना कोई वास्तविक सुरक्षा नहीं है।
भावनात्मक जुड़ाव के बिना किसी को किसी की कोई सच्ची चिंता नहीं है।

और जो महिला अपने सबसे प्रिय लोगों से अलग-थलग पड़ जाती है, उसे नियंत्रित करना कहीं अधिक आसान हो जाता है।
और ऐसी महिलाओं को इसे मुक्ति कहना सिखाया जाता है। यह मुक्ति नहीं है।
यह परित्याग है… जिसे नारीवाद का नाम दे कर सजा कर बेचा जा रहा है।

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