Homeभारत गौरवअंग्रेजी राज में मुंबई की शान थे नाना शंकर शेठ

अंग्रेजी राज में मुंबई की शान थे नाना शंकर शेठ

मुंबई में कुछ नाम ऐसे हैं जो हर रोज़ हमारी ज़िंदगी में शामिल हैं, लेकिन हम यह नहीं जानते कि उनके पीछे कितनी बड़ी कहानी छिपी है। सड़कों पर चलते हुए, स्टेशनों से गुज़रते हुए, चौकों पर रुकते हुए हम जिन नामों को पढ़ते हैं, उनमें नाना शंकरशेठ भी शामिल हैं। उनकी मूर्ति है, स्कूल है, सड़क है, चौक है। अब एक स्मारक भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब उनके कद के बराबर है। और उससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या मुंबई ने सच में उन्हें वह जगह दी, जिसके वे हकदार थे।

नाना शंकरशेठ, जिन्हें लोग प्यार से नाना कहते थे, दक्षिण मुंबई में रहते थे, वहीं काम करते थे, और वहीं उन्होंने अपने जीवन की सबसे बड़ी पूंजी इस शहर को सौंप दी। गिरगांव से लेकर मरीन लाइंस और बॉम्बे सेंट्रल तक का इलाका उनकी कर्मभूमि था। इसके बावजूद उनका स्मारक एंटॉप हिल जैसे इलाके में बनाया जाना कई सवाल खड़े करता है। क्या यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक फैसला था या फिर इतिहास को हाशिये पर धकेलने की एक और मिसाल।

स्मारक और स्मृति के बीच का फर्क
अक्सर स्मारक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बनकर रह जाते हैं। पत्थर और कांसे की संरचनाएँ खड़ी कर दी जाती हैं, लेकिन उनके पीछे की आत्मा कहीं खो जाती है। नाना शंकरशेठ के लिए यदि दक्षिण मुंबई में एक स्मारक बनता, तो वह किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं होता, बल्कि एक कृतज्ञ शहर की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होता। लेकिन शायद शहर के निर्णयकर्ताओं को लगा कि यह स्थान किसी और के लिए ज़्यादा ज़रूरी है।
यह विडंबना ही है कि जिन लोगों ने मुंबई की नींव रखी, वही आज सबसे कम याद किए जाते हैं। नाना शंकरशेठ शिक्षा सुधारक थे, समाज सुधारक थे, दानवीर थे, और ब्रिटिश भारत में भारतीयों की आवाज़ भी। इसके बावजूद उनका नाम आज की सार्वजनिक चर्चा में शायद ही आता है।
पारसी योगदान और एक भूली हुई समानांतर कहानी
उन्नीसवीं सदी की मुंबई को आकार देने में पारसी समुदाय का योगदान सर्वमान्य है। जमशेदजी जीजीभॉय, कावसजी जहांगीर, दादाभाई नौरोजी और फिरोज़शाह मेहता जैसे नाम आज भी सम्मान के साथ लिए जाते हैं। डेविड ससून जैसे यहूदी उद्योगपति भी इस सूची में शामिल हैं। लेकिन इसी दौर में नाना शंकरशेठ भी इन्हीं क़दमों से क़दम मिलाकर चल रहे थे।

जीजीभॉय के साथ मिलकर उन्होंने शहर के पहले बड़े शहरी परिवर्तन की नींव रखी। फर्क सिर्फ़ इतना रहा कि पारसी योगदान को समय के साथ याद रखा गया, जबकि नाना शंकरशेठ का नाम धीरे-धीरे समकालीन स्मृति से फिसलता चला गया।
एक बरसी, जो बिना शोर के गुज़र गई
31 जुलाई 2025 को नाना शंकरशेठ की 150वीं पुण्यतिथि आई और चली गई। उस शहर में, जिसे उन्होंने दिल खोलकर दिया, कोई बड़ी हलचल नहीं हुई। कुछ अख़बारों में महाराष्ट्र के राज्यपाल द्वारा उनके स्मारक स्थल पर प्रतिमा का अनावरण करते हुए तस्वीरें छपीं। साथ में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भी मौजूद थे, लेकिन स्मारक के स्थान पर शायद किसी ने सवाल उठाना ज़रूरी नहीं समझा।
कभी शिवाजी पार्क के पास इंदु मिल की ज़मीन पर उनके स्मारक की बात चली थी। फिर अचानक वह चर्चा ख़ामोश हो गई। जैसे शहर ने तय कर लिया हो कि नाना को बस नामों तक सीमित रखना है, उनकी कहानी को नहीं।

दौलत, भरोसा और गिरगांव का वाड़ा
1803 में जन्मे नाना शंकरशेठ मुरकुटे परिवार से थे, जो सोने-चाँदी और आभूषणों के व्यापार में प्रसिद्ध था। उनका कारोबार इतना भरोसेमंद था कि अरब और अफ़ग़ान व्यापारी अपने धन और कीमती सामान बैंकों के बजाय नाना के पास रखवाना ज़्यादा सुरक्षित समझते थे। गिरगांव में उनका विशाल वाड़ा था, जो हाल के वर्षों में एक ऊँची इमारत के लिए ढहा दिया गया। एक और निशानी, जो समय के साथ मिट गई।

शिक्षा, समाज और भविष्य की नींव
नाना शंकरशेठ ने अपनी ज़मीन और धन को निजी सुख के लिए नहीं, बल्कि सार्वजनिक हित के लिए दिया। उन्होंने ऐसे संस्थानों की स्थापना की, जिनकी सूची मीलों लंबी हो सकती है। बॉम्बे का नेटिव स्कूल, जो आगे चलकर बोर्ड ऑफ़ एजुकेशन बना और फिर एल्फ़िंस्टन कॉलेज के रूप में पहचाना गया। अंग्रेज़ी स्कूल, बालिका विद्यालय, संस्कृत पुस्तकालय, विश्वविद्यालय की स्थापना में सहयोग—यह सब उस दौर में हुआ जब शिक्षा को अब भी एक सीमित वर्ग का अधिकार माना जाता था।
उन्होंने व्यापारियों और उद्योगपतियों की आवाज़ को संगठित करने के लिए बॉम्बे एसोसिएशन की सह-स्थापना की। संग्रहालयों और बाग़ों के निर्माण में दान दिया। जीजीभॉय के साथ मिलकर इंडियन रेलवे एसोसिएशन बनाई, जो आगे चलकर ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे बनी—आज की सेंट्रल रेलवे।

रेलवे और इतिहास की पहली सवारी
भारतीय रेल के इतिहास में नाना शंकरशेठ का नाम एक मील का पत्थर है। 16 अप्रैल 1853 को बॉम्बे से ठाणे के बीच चली पहली यात्री ट्रेन में वे स्वयं मौजूद थे। उस समय ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे के दस निदेशकों में सिर्फ़ दो भारतीय थे—सर जमशेदजी जीजीभॉय और नाना शंकरशेठ। यही वजह है कि मुंबई सेंट्रल स्टेशन का नाम उनके नाम पर रखने की मांग आज फिर उठ रही है।

समाज सुधार और राजनीतिक भूमिका
नाना केवल दानवीर नहीं थे। वे समाज सुधारक भी थे। सती प्रथा के उन्मूलन में ब्रिटिश सरकार ने उनके प्रभाव का सहारा लिया। वे बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के पहले भारतीय सदस्य बने। एशियाटिक सोसाइटी के सदस्य बने, जब भारतीयों का वहाँ प्रवेश भी आसान नहीं था। डॉ. भाऊ दाजी लाड और सर जॉर्ज बर्डवुड के साथ मिलकर उन्होंने मुंबई को तंग गलियों वाले कस्बे से खुली सड़कों और पेड़ों से सजे शहर में बदलने की योजना पर काम किया।

क्यों नहीं बने वे ‘आइकन’
शायद इसलिए कि नाना शंकरशेठ ने कभी खुद को राजनीतिक प्रतीक नहीं बनाया। उन्होंने सत्ता के बजाय सेवा को चुना। और शायद यही वजह है कि आज उन्हें सिर्फ़ नामों और मूर्तियों में समेट दिया गया है। लेकिन अगर महाराष्ट्र को एक आदर्श नागरिक का उदाहरण देना हो, तो नाना शंकरशेठ से बेहतर नाम शायद ही कोई हो।
मुंबई आज भी उनके योगदान को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाई है। लेकिन अगर आप ध्यान से देखें, तो शहर के हर कोने में उनकी छाया मौजूद है—स्टेशन में, कॉलेज में, सड़कों में और उस सोच में, जिसने मुंबई को सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि एक विचार बनाया।

साभार- https://www.facebook.com/share/p/1Dj56LfKgS/ से

Nana Shankar Sheth, Jagannath Shankarseth, Architect of Mumbai, Mumbai History, Indian Railways History, Great Indian Peninsula Railway, Elphinstone College, Bombay Association, 19th Century Bombay, Philanthropist of India

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