मराठी के शौकिया रंगमंच पर एकदम नया-नया नाटक आया है- ‘शॉर्टकट लाँंगकट’। नया इन अर्थों में कि उसका पुणे के ‘श्रीराम लागू रंग-अवकाश केंद्र’ पर हालिया प्रयोग पाँचवाँ ही था। पुणे की ‘व्यक्ति’ संस्था ने इसे प्रस्तुत किया, उसे बने भी एक दशक ही हुआ है और जहाँ हुआ वह केंद्र भी लगभग इतना ही पुराना है। सभागार में 150 लोग बैठ सकते हैं और लगभग सभागार पूरी तरह भरा था तो इसे युवा टीम के उत्साह का प्रतिफल कह सकते हैं कि उनकी सराहना करने इतने लोग टिकट खरीदकर आए थे। लेखक-निर्देशक भी अभी चार-पाँच साल पहले ही स्नातक हुए युवा हैं और काम करने वालों की टीम भी एकदम युवा। नए प्रयोग करते हुए नाटक की भाषा त्रिवेणी है मतलब हिंदी के कुछ मौलिक गीत, कुछ मराठी गीत, कुछ अंग्रेज़ी संवाद लेकिन मूलतः इसे मराठी नाटक ही कह सकते हैं क्योंकि बहुतायत में मराठी भाषा में नाटक चल रहा था। एक पंक्ति में इस नाटक को देखें तो कह सकते हैं कि इसका थीम था- कोई शॉर्टकट ले या लॉन्गकट सच्चा प्रेम ईश्वर तक ही पहुँचाता है।
मंच पर केवल दो कलाकार थे। मंच से परे पूरी टीम थी। संगीत भी लाइव था, जिसमें पखावज से लेकर कीबोर्ड तक सब था। इस नाटक की जान कह सकते हैं तो वह था इसकी प्रकाश योजना। निखिल मारणे और प्रथमेश जाधव की प्रकाश व्यवस्था उनके भावी कार्यक्षेत्र के उजास को दर्शाती है। पूरा खेल रोशनी का ही था। उस रोशनी के सहारे दो युवा सिंहगढ़ पहाड़ी चढ़ने निकलते हैं। लड़की को अपने प्रेमी के साथ उस पहाड़ी से सूर्योदय देखना है। प्रेमी उसे पहले गर्ल फ्रैंड कहता था लेकिन अब केवल फ्रैंड मतलब सहेली मानता है। पहाड़ी की लंबी चढ़ाई कई पथरीले रास्तों, ऊँचे-नीचे धरातल से गुज़रती है, जैसे उन दोनों का अब तक का जीवन रहा है। चढ़ाई के दौरान दोनों संवाद-विसंवाद, प्रेम-झगड़ा, मस्ती-मजाक करते हैं और अपने दुःखों-परेशानियों, अपनी हौसलों-लक्ष्यों को भी दर्शकों से साझा करते हैं। प्रकृति के चित्र बनाने वाले ख़्यात यूरोपियन लैंडस्केप चित्रकार कैस्पर फ्रेडरिक से लेकर महाराष्ट्र के आराध्य विठोबा (पांडुरंग) और रखुमाई (रुक्मिणी) तक के दर्शन इस यात्रा के दौरान होते हैं।
शार्दुल निंबालकर के लेखन और सुयश झुंजरके के नेपथ्य व निर्देशन में यह नाटक खड़ा था। लगभग दो घंटे के नाटक को थोड़ा संपादित किया जा सकता था तो और कसा हुआ प्रयोग होता। नेपथ्य में कुछ लकड़ी के बक्से, कुछ प्लास्टिक शीट्स, साइड विंग ड्रॉप, विंडचाइम का प्रयोग बड़ा अच्छा किया गया था। पूरी कहानी इन चीज़ों में समाहित हो रही थी। शार्दुल के साथ अस्मि देवकुले, हर्ष भोसले, अथर्व बर्दाडे, आदित्य अलोने, अक्षय कुलकर्णी और साईराज पतंगराय ने नेपथ्य को संभाला है, इन्हें वास्तव में परदे के पीछे के कलाकार कह सकते हैं।
इस नाटक को चित्रकला, कथा-कविता, संगीत और नाट्य का मेल कहा जा सकता है। साइड विंग ड्रॉप और लकड़ी के बक्से के साथ जिस तरह चित्रों को दिखाया गया वह निर्देशक की कल्पना की उड़ान को दर्शाता है। लक्ष्मण ठाकुर के रंगचित्र कथ्य के साथ एकदम सटीक बैठ रहे थे। इसका दूसरा दमदार पक्ष था यशराज आवेकर का संगीत निर्देशन। वाद्य वृंद में यशराज के साथ हृषिकेश आवेकर व रुतुजा थिटे थीं। गायन समूह में भी यशराज थे और साथ थे रेवा घुले, लक्ष्मण, संस्कृति काडादी।
बात करते हैं अभिनय की। साक्षी दिघे के लंबे संवाद, उसकी भूमिका के विभिन्न पहलू और उसे पूरी ताकत से पेश करने का उसका हुनर रेखांकित करने योग्य है। हृषिकेश म्हेत्रे ने भी अपने चरित्र की कशमकश और हताशा को उकेरा है। रेवा घुले और लक्ष्मण अंतिम कुछ दृश्यों में मंच पर आते और अपनी छाप छोड़ जाते हैं। निर्माता किरण ढमाले और महेंद्र मारणे हैं।
लेखिका परिचयः

(स्वरांगी साने एक स्वतंत्र हिंदी अनुवादक, लेखिका और पत्रकार हैं, , उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं की फिल्मों, वैज्ञानिक दस्तावेजों और पुस्तकों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया है। वह समाचार पत्रों में संपादकीय जिम्मेदारी भी वहन कर चुकी है और वर्तमान में कला, साहित्य व संस्कृति पर स्वतंत्र लेखन कर रही हैं)

