खानपान के विकल्प केवल थाली में परोसे जाने वाले भोजन को ही नहीं गढ़ते। भारत में, वे तेजी से यह भी दर्शाते हैं कि शेफ और उपभोक्ता रसोई में विश्वसनीयता, स्रोत और प्रदर्शन के बारे में कैसे सोचते हैं। सामग्री कहाँ से आती है, पकने पर उनका व्यवहार कैसा होता है, और क्या वे भरोसेमंद परिणाम देती हैं—ये प्रश्न रोज़मर्रा के निर्णयों को आकार दे रहे हैं।
यह बदलाव भारतीय रसोईघरों में दिखाई देता है, जहाँ परिचित तकनीकों के साथ अब नए स्वाद जुड़ रहे हैं। लंबे समय से भारतीय बाज़ारों में मौजूद अमेरिकी सामग्री को अब नए नज़रिये से देखा जा रहा है। क्रैनबेरी संतरे के रस में पकती हैं। पेकान आसानी से पनीर में मिल जाते हैं। बतख अपनी ही चर्बी में धीरे-धीरे कुरकुरी होती है। मिलकर, ये संयोजन एक व्यापक कहानी की ओर इशारा करते हैं—ऐसी कहानी जिसमें खानपान विकल्प बाज़ारों और व्यापारिक संबंधों को भी आकार देते हैं।
दो खानपान पहलियों के माध्यम से—अमेरिकन कम्युनिटी सपोर्ट एसोसिएशन (अक्सा) में ‘टेस्ट ऑफ़ अमेरिका’ सामग्री प्रशिक्षण और नई दिल्ली के एक रिटेल आउटलेट ‘फ़ूड स्टोरीज़’ में आयोजित अमेरिकी खाद्य कुक-ऑफ़—अमेरिकी दूतावास ने दिखाया कि अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय रसोईघरों में स्वाभाविक रूप से कैसे फिट होते हैं। अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के नेतृत्व में, इन पहलों का उद्देश्य केवल रेसिपी से प्रेरित करना नहीं था। उनका ध्यान बाज़ारों के विस्तार, पेशेवर आत्मविश्वास के निर्माण और अमेरिकी किसानों व निर्यातकों के लिए दीर्घकालिक आर्थिक विकास के समर्थन पर था।
उत्पादों का प्रशिक्षण
‘टेस्ट ऑफ़ अमेरिका’ सामग्री प्रशिक्षण ने अक्सा के सदस्यों, हॉस्पिटैलिटी विद्यार्थियों, और खाद्य एवं पेय पेशेवरों को एक साथ लाया, जहाँ सोर्सिंग, भंडारण और तैयारी पर मार्गदर्शन के साथ व्यावहारिक कुकिंग कराई गई। प्रशिक्षण का नेतृत्व करने वाली शेफ नेहा दीपक शाह कहती हैं कि सत्र को रेसिपी से आगे ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया था, जिसमें दिल्ली-एनसीआर में पहले से उपलब्ध अमेरिकी कृषि उत्पादों का उपयोग किया गया।
वह कहती हैं, “सत्र का ध्यान इन सामग्रियों, उनकी विशिष्ट विशेषताओं, और उन्हें रोज़मर्रा तथा पेशेवर रसोई अनुप्रयोगों में सोच-समझकर शामिल करने की गहरी समझ विकसित करने पर था।”
मेन्यू में परिचित भारतीय प्रारूपों को अमेरिकी उत्पादों के साथ जोड़ा गया। उदाहरण के लिए, पनीर टिक्का को अमेरिकी क्रैनबेरी और पेकान के साथ नए रूप में प्रस्तुत किया गया। समोसों में ओरेगन हेज़लनट शामिल थे। बतख और टर्की को भारतीय रसोईघरों में प्रचलित तकनीकों के साथ प्रस्तुत किया गया।
शाह जोड़ती हैं, “जो बात वास्तव में उभरकर सामने आई, वह हर सामग्री में गुणवत्ता की उल्लेखनीय स्थिरता और विश्वसनीयता थी। ये शेफ और घरेलू रसोइयों को प्रयोग और नवाचार का आत्मविश्वास देते हैं, साथ ही निरंतर उच्च-गुणवत्ता के परिणाम सुनिश्चित करते हैं।”
हॉस्पिटैलिटी के सायन डोवारी ने इस सत्र को “आँखें खोलने वाला” बताया। वह कहते हैं, “मुझे विभिन्न अमेरिकी स्वादों, मेवों और बेरीज़ के बारे में जानने को मिला। मैं उन बेरीज़ को इन्फ़्यूज़न के रूप में भी इस्तेमाल कर सकता हूँ।”
एक अन्य प्रतिभागी, मंसंजम सिंह भाटिया—जो बारटेंडर हैं और सीआईआई इंस्टीट्यूट ऑफ़ हॉस्पिटैलिटी में विद्यार्थी हैं—ने विश्वसनीयता पर ज़ोर दिया। वह बताते हैं, “मेरे लिए जो मायने रखता है वह है निरंतरता। अमेरिकी सामग्री का मतलब है कि हमें पूरे साल एक ही आकार, एक ही आकृति और एक ही स्वाद मिलता है। गुणवत्ता और निरंतरता हमारे काम को बहुत आसान बना देती है।”
उपभोक्ताओं के लिए पकाना
फ़ूड स्टोरीज़ में आयोजित रिटेल कुक-ऑफ़ में, चार प्रतिभागियों ने शेफ, ख़रीदारों और उपभोक्ताओं की मौजूदगी में अमेरिकी सामग्रियों का उपयोग करते हुए मौलिक व्यंजन तैयार किए। इस प्रारूप ने उन्हें यह परखने का अवसर दिया कि ये सामग्री भारतीय-प्रेरित पकवानों में कैसे प्रदर्शन करती हैं।
ओशीन बंसल ने अपने ‘नूर-ए-कश्मीर ज़ाफ़रानी पुलाव’ के लिए कश्मीरी स्वादों से प्रेरणा ली, जिसमें अमेरिकी क्रैनबेरी को केंद्रीय तत्व के रूप में इस्तेमाल किया गया। वह कहती हैं, “आज से पहले, मैं क्रैनबेरी से कुछ हद तक परिचित थी, लेकिन उन्हें ज़्यादातर मिठाइयों और पेयों में ही इस्तेमाल होते देखा था।”
मल्लिका बनाती की विजेता रचना—क्रैनबेरी-ग्लेज़्ड टर्की विद पेकान पुलाव एंड पिस्ता बटर—में अमेरिकी पेकान को पकवान के केंद्र में रखा गया। उनके लिए अमेरिकी पेकान की लचीलेपन की विशेषता सबसे अलग थी। वह कहती हैं, “वे कितने बहुपयोगी हैं—करी से लेकर पाई तक, मीठे और नमकीन दोनों प्रकार की तैयारियों में आसानी से ढल जाते हैं,” और जोड़ती हैं कि अमेरिकी क्रैनबेरी “वह प्रमुख सामग्री थीं जो उस अतिरिक्त जान को जोड़ती हैं।”
मेहक आसिफ़ के लिए, कुक-ऑफ़ में टर्की पकाने का यह उनका पहला अनुभव था। उनका व्यंजन—पेकान-वॉलनट सॉस और क्रैनबेरी के साथ भरी हुई टर्की रूलाड—अमेरिकी पोल्ट्री को मेवों और फलों के साथ जोड़ता है।
दीपशी सलूजा ने चना कबाब के साथ प्लांट फ़ारवर्ड दृष्टिकोण अपनाया, जिसमें अमेरिकी चनों के साथ पिस्ता, अखरोट, ब्लूबेरी और क्रैनबेरी का उपयोग किया गया। वह कहती हैं, “मुझे सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात की हुई कि बेरीज़ कितनी बहुपयोगी हैं।” भारतीय मसालों के साथ जोड़े जाने पर, वह बताती हैं, वे “आम तौर पर मीठी मानी जाने वाली सामग्री से बदलकर तीखी, नमकीन और गहराई से स्वादिष्ट बन गईं।” सलूजा जोड़ती हैं कि बेरी जेल “इमली की चटनी के आधुनिक विकल्प के रूप में बेहद खूबसूरती से काम करता है।”
कुक-ऑफ़ का संचालन करने वाले शेफ अजय चोपड़ा बताते हैं कि अमेरिकी उत्पाद भारत में क्यों अच्छी तरह काम करते हैं। वह कहते हैं, “अमेरिकी सामग्रियों के साथ काम करने का रोमांचक पहलू उनकी बहुपयोगिता, काउंटर-सीज़नैलिटी और उच्च गुणवत्ता है।”
“अगर मैं एक क्लासिक लाल स्वादिष्ट सेब काटता हूँ, तो वह रसदार होता है, कुरकुरा होता है, और अपने वादे पर खरा उतरता है। अगर वह अमेरिकी पिस्ता है, तो उसकी ग्रेडिंग इतनी परफ़ेक्ट होती है कि हर पिस्ता लगभग एक ही आकार का होता है।”
मात्रा क्यों मायने रखती है
पर्दे के पीछे, मात्रा और सुरक्षा सोर्सिंग के निर्णयों को संचालित करते हैं। भारत में अमेरिकी खाद्य उत्पादों के लंबे समय से प्रचारक सुमित सरन बताते हैं कि शेफ अमेरिकी उत्पादों पर भरोसा क्यों करते हैं।
वह कहते हैं, “तीन बड़े स्तंभ हैं: गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति की निरंतरता। अमेरिकी उत्पाद यूएसडीए प्रमाणित होते हैं। अमेरिका में जो किसी ग्राहक के लिए उपलब्ध है, वही बिल्कुल भारत में ग्राहक तक पहुँचता है।”
यह एक बड़े बाज़ार में मायने रखता है। वह जोड़ते हैं, “हम छोटे स्तर से शुरुआत कर सकते हैं। लेकिन जैसे ही मांग बढ़ती है, अमेरिका के पास उस मांग को पूरा करने की क्षमता और निरंतरता होती है।”
ये आँकड़े पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। सरन कहते हैं, “पाँच साल पहले क्रैनबेरी आयात लगभग 60 से 70 टन था। 2025 में, हम 5,000 टन तक पहुँच गए।” वह जोड़ते हैं, “वॉशिंगटन सेब स्वर्ण मानक हैं। आज आयात लगभग 5,00,000 टन के क़रीब है।”
रिटेल प्रमाण
उच्च-गुणवत्ता वाली उपज की इस मांग पर भारतीय ब्रांड भी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। स्नैकिंग ब्रांड नटी ग्रिटीज़ की संस्थापक दिनिका भाटिया बताती हैं कि अमेरिकी सामग्री कैसे विकास को गति देती हैं। वह कहती हैं, “हम जो उपभोग करते हैं, उसमें से लगभग 35 से 40 टन प्रति माह अमेरिकी सामग्री होती है। अमेरिकी सामग्री की वृद्धि 40 प्रतिशत है।”
वह इसे सीधे मानकों से जोड़ती हैं, और “गुणवत्ता, निरंतरता, कुरकुरापन और स्वाद” की ओर इशारा करती हैं। अमेरिका में प्रोसेसिंग प्लांट का अध्ययन और दौरा करने का उनका अनुभव उस भरोसे को और मज़बूत करता है। भाटिया बताती हैं, “मानकीकरण, मशीनीकरण, गुणवत्ता नियंत्रण और स्वच्छता—ये सब मैंने सबसे बेहतरीन देखे हैं।”
यह भरोसा मांग में तब्दील हो रहा है। पेकान, जो कभी अपरिचित थे, अब उनके सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले उत्पादों में शामिल हैं। वह कहती हैं, “पिछले महीने हमने पेकान में 100 प्रतिशत की वृद्धि देखी।”
जैसे-जैसे अधिक शेफ, रिटेलर और उपभोक्ता इन सामग्रियों के साथ काम कर रहे हैं, परिचय आत्मविश्वास में बदल रहा है। जो रसोईघरों में प्रयोग के रूप में शुरू होता है, वह स्थिर मांग, भरोसेमंद आपूर्ति शृंखलाओं और दीर्घकालिक व्यावसायिक संबंधों में तब्दील हो रहा है। इस अर्थ में, भारत में अमेरिकी सामग्रियों की कहानी केवल स्वाद या तकनीक की नहीं है, बल्कि इस बात की है कि रोज़मर्रा के खाद्य विकल्प कैसे चुपचाप व्यापार, विकास और साझा आर्थिक हितों का समर्थन करते हैं।
सामग्री के बारे में प्रशिक्षण से लेकर रिटेल शेल्फ़ तक, अमेरिकी कृषि उत्पाद भारतीय रसोईघरों और बाज़ारों में नई भूमिकाएँ निभा रहे हैं।
Photo: (फूड स्टोरीज के रिटेल कुक ऑफ़ में चार प्रतिभागियों ने अमेरिकी उत्पादों का इस्तेमाल करते हुए मौलिक डिश तैयार कीं और यह दिखाया कि किस तरह से अमेरिकी कृषि उत्पाद स्वाभाविक तौर पर भारतीय रसोईघरों का हिस्सा बन जाते हैं। (फोटोग्राफ: इम्तियाज़ इमाम))
साभार: https://spanmag.state.gov/hi/ से

