मुंबई। मुंबई शहर ऐसे तो आयोजनों का शहर है प्रतिदिन यहाँ सैकड़ों आयोजन होते हैं, जिनमें कॉर्पोरेट से लेकर फिल्म, साहित्य और संस्कृति से जुड़े आयोजन सब शामिल हैं। लेकिन कुछ ही आयोजन ऐसे होते हैं जो हर दृष्टि से यादगार रह जाते हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश प्रभु पर मराठी में लिखी गई पुस्तक ध्येयधुंद (धुन के पक्के) के विमोचन का कार्यक्रम ऐसा ही एक यादगार रोमांचक और भावनाओं से भरा हुआ आयोजन था।
विशेष उल्लेखनीय रहा कि समारोह के केंद्रबिंदु होते हुए भी सुरेश प्रभु मंच पर न बैठकर श्रोताओं के बीच शांतिपूर्वक कार्यक्रम सुनते रहे, जबकि हाल में बैटे श्रोता श्री सुरेश प्रभु को मंच पर ना पाकर हैरान थे कि प्रभुजी मंच पर नहीं हैं तो कहाँ हैं।
श्री सुरेश प्रभु के बारे में कुछ रोचक लेख

दादर स्थित सावरकर सभागृह के खचाखच भरे हाल में ये कार्यक्रम संपन्न हुआ और लगातार तीन घंटे तक चला।
द इनविज़िबल रूट्स: एक मालवणी आत्मा, वैश्विक व्यक्तित्व में – श्री सुरेश प्रभुइस समारोह में रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग का कोकण कोहिनूर सावरकर स्मारक में आलोकित हो उठा हो। हमारे प्रभु-प्रेमी मित्र नकुल पार्सेकर ने “ध्येयधुंद” पुस्तक तो लिखी, पर विषय कौन? हमारे ही सुरेश प्रभु साहब।
प्रभु का जीवन मानो दौड़ती लोकल ट्रेन का डिब्बा हो।
और भला कालनिर्णय के कर्ता-धर्ता जयराज साळगावकर वहाँ उपस्थित न होते, यह कैसे संभव था? साळगावकर के ‘कालनिर्णय’ ने हमें उपवास का दिन बताकर भोजन से दूर रखा, लेकिन जब प्रभु और साळगावकर साथ बैठते हैं, तो मालवणी अंदाज़ में जो बातचीत की चटपटी फुहार उड़ती है, उसका कोई मुकाबला नहीं।
साळगावकर द्वारा सुनाया गया मच्छिंद्र कांबली का किस्सा सुनकर तो हँसी के मारे पेट में बल पड़ गए। श्री साळगावकर ने बताया—एक बार प्रभु ने मच्छिंद्र कांबली से कहा, “अरे मच्छिंद्र, कभी गाँव में घर पर खाने आना।” इस पर मच्छिंद्र ने तुरंत जवाब दिया, “अरे सुरेश, पहले तुम चार दिन अपने ही घर पर खाना खा लो, तब पाँचवें दिन मैं तुम्हारे घर खाने आऊँगा!”
वास्तव में, प्रभु के घर भोजन के लिए जाना मानो मृगतृष्णा के पीछे दौड़ने जैसा है। जिस व्यक्ति का घर ही मानो भारतीय रेल या एयर इंडिया बन गया हो, वह स्वयं घर पर कब भोजन करेगा और अतिथियों को कब बुलाएगा? देशसेवा में स्वयं को समर्पित कर देना ही उनका सबसे बड़ा ‘व्यसन’ है—और जब वह व्यक्ति मालवणी हो, तो बात वहीं समाप्त हो जाती है।
आप एक मालवणी व्यक्ति को सिंधुदुर्ग से बाहर ले जा सकते हैं, लेकिन मालवणी आभा को उस व्यक्ति से कभी अलग नहीं कर सकते।
पर आश्चर्य इस बात का है कि इतना बड़ा वैश्विक व्यक्तित्व होने के बावजूद उनका स्वभाव बिल्कुल अपने मोहल्ले के भजी की दुकान पर बैठकर सहज गपशप करने वाले किसी अपने जैसे ही सरल व्यक्ति जैसा है। सावरकर स्मारक के उस गरिमामय वातावरण में, दिग्गजों की उपस्थिति के बीच, सावंतवाड़ी के एक सामान्य लेखक द्वारा एक असाधारण व्यक्तित्व पर पुस्तक लिखना—यह अपने आप में “सादा जीवन, उच्च विचार” का सजीव उदाहरण है।
मानो स्वयं सरस्वती ने व्यास से कहा हो—“अब आप थोड़ा विश्राम कीजिए, अगला अध्याय मैं लिखती हूँ।” और दृश्य भी कितना अनोखा—मंच पर सभी मान्यवर विराजमान, “सत्कार मूर्ति” के रूप में सुरेश प्रभु का सम्मान, लेकिन स्वयं प्रभु साहब मंच पर न बैठकर सामने दर्शकों की कुर्सी पर शांतिपूर्वक बैठे हुए! यह लेखक और जिस पर लिखा गया है—दोनों के ही सादगी के भाव का सीमोल्लंघन था।
अब नकुल से बस एक ही कहना है—पार्सेकर जी, दूसरा खंड जल्द प्रकाशित कीजिए। नहीं तो ऐसा न हो कि तब तक सुरेश प्रभु किसी दूसरे ग्रह पर “इंटर-गैलेक्टिक कमिटी” बनाने निकल जाएँ और आपको जानकारी जुटाने के लिए सीधे इसरो के चक्कर लगाने पड़ें!
— अनिकेत रविंद्र वालावलकरी
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाराष्ट्र प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने की। विशेष अतिथि के रूप में एबीपी माझा के कार्यकारी संपादक राजीव खांडेकर उपस्थित थे।
पुस्तक के लेखक अधिवक्ता नकुल पार्सेकर का कहना था कि सुरेश प्रभु के व्यक्तित्व, उनके राष्ट्रनिर्माण के प्रति समर्पण, सकारात्मक ऊर्जा और समाजाभिमुख कार्यशैली ने उन्हें सदैव प्रेरित किया। श्रीमती उमा प्रभु के मार्गदर्शन ने भी इस पुस्तक की संकल्पना को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा, “सुरेश प्रभु जैसे बहुआयामी व्यक्तित्व पर लिखना हिमालय पर एक झाड़ी के बोलने जैसा साहस है,” फिर भी आठ महीनों के अथक परिश्रम से यह पुस्तक तैयार की गई।
बेहद अनुशासन व गरिमामयी ढंग से संपन्न इस आयोजन में उपस्थित वक्ताओं ने श्री सुरेश प्रभु को लेकर ऐसे ऐसे संस्मरण प्रस्तुत किए कि उनको बरसों से जानने वाले लोग भी रोमांचित हो गए। कई बार तो ऐसा लगा जैसे परीकथा के किसी सर्वशक्तिमान नायक की कोई कथा कही जा रही है या किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में बात हो रही है जो इस समाज की दुनिया से एक अलग तल पर जीता है।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने सुरेश प्रभु के बहुआयामी व्यक्तित्व, उनके दूरदर्शी नेतृत्व और राष्ट्रसेवा के प्रति उनके समर्पण की प्रशंसा की। लेखक नकुल पार्सेकर ने अपने प्रास्ताविक में पुस्तक लेखन के पीछे की प्रेरणा और अनुभव साझा किए।
समारोह में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों सहित राज्य के बाहर से भी बड़ी संख्या में नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में आभार प्रदर्शन के साथ राष्ट्रगान किया गया।
अपने संबोधन में विशेष अतिथि के रूप में एबीपी माझा के कार्यकारी संपादक राजीव खांडेकर ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सुरेश प्रभु की विशिष्ट कार्यशैली पर प्रकाश डाला तथा पुस्तक के द्वितीय संस्करण की आवश्यकता व्यक्त की। श्री राजीव खांडेकर ने कहा—जब भी मैं सुरेश प्रभु से मिलता हूँ, वे या तो किसी वैश्विक बैठक से लौट रहे होते हैं या किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए रवाना हो रहे होते हैं। उनके पासपोर्ट पर लगे मुहरों की गिनती करनी हो तो शायद एक स्थायी टैली ऑपरेटर रखना पड़े।
वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेटं सतीश मराठे ने भारत सरकार की नई राष्ट्रीय सहकार नीति समिति के अध्यक्ष के रूप में सुरेश प्रभु के कार्यों की सराहना की।सारस्वत बैंक के चेयरमैन गौतम ठाकुर ने बताया कि मात्र 37 वर्ष की आयु में बैंक की जिम्मेदारी संभालते हुए प्रभु ने संस्थान की मजबूत नींव रखी।
काल निर्णय कैलेंडेर के संस्थापक श्री जयराम साळगावकर ने अपने पिताश्री स्व. जयंत साळगावकर के साथ प्रभु के आत्मीय संबंधों का उल्लेख किया। वरिष्ठ चार्टर्ड एकाउंटेट श्री प्रफुल्ल छाजेड ने उन्हें अद्वितीय दूरदर्शी नेता बताया और उपस्थित जनसमूह से खड़े होकर सम्मान व्यक्त करने का आग्रह किया, जिस पर सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
वरिष्ठ चार्टर्डएकाउंटेंट श्री शैलेष हरिभक्ति व नाबार्ड के अध्यक्ष व रिज़र्व बैंक के निदेशक मंडल के सदस्य केवी शिवाजी ने श्री सुरेश प्रभु के साथ की बरसों की यात्रा के रोचक संस्मरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनके जैसा दूरदृष्टि वाला राजनीतिक व्यक्ति आज के दौर में दुर्लभ है। श्री केवी शिवाजी ने कहा कि अगर सुरेश प्रबुजी पर अंग्रेजी में पुस्तक प्रकाशित हुई तो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष इस कार्यक्रम में आएँगे और म्ंच से लेकर श्रोताओं की जगह राष्ट्राध्यक्षों से ही भर जाएगी। उन्हौंने कहा कि पूरी दुनिया के तमाम राष्ट्रपतियों और प्रधान मंत्रियों से लेकर हर राजनीतिज्ञ से श्री सुरेश प्रभु ने जो रिश्ते बनाए उसीका नतीजा था कि प्रधान मंत्री के शेरपा के रूप में उन्होंने जी-जैसे विराट आयोजन में पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष भारत आए।
अपने संक्षिप्त उद्बोधन में श्री सुरेश प्रभु ने विनम्रतापूर्वक कहा कि जीवित रहते उन पर पुस्तक लिखे जाने से उन्हें यह जानने का अवसर मिला कि लोग उनके कार्यों के बारे में क्या सोचते हैं। उन्होंने कहा कि मेरा ध्येय रहा है कि बिना किसी लाभ की अपेक्षा निरंतर कार्य करते रहना, और मैं सतत् इसी भाव से जीता हूँ। इस पुस्तक को उन्होंने अपने सामाजिक व सार्वजनिक जीवन की पूँजी बताया।
समारोह में महाराष्ट्र सहित कोलकाता, पटना, गोवा और सिंधुदुर्ग से अनेक गणमान्य व्यक्ति, सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति, शिक्षाविद, पत्रकार एवं विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधि उपस्थित रहे। पूरे समय सभागार पूर्णतः भरा रहा और अंत में पुस्तक पर हस्ताक्षर एवं छायाचित्रों के लिए उत्साहपूर्ण प्रतिसाद देखने को मिला।
कार्यक्रम के मुख्य संयोजक डॉ. अमेय देसाई एवं श्री रविंद्र वाडेकर सहित आयोजन समिति के सभी सदस्यों के प्रयासों से यह समारोह सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। सुप्रसिद्ध मंच संचालक स्मिता गावाणकर के प्रभावी संचालन ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।
इस आयोजन में वक्ताओं ने तो अपनी बात मन से कही, लेकिन श्रोताओं में बैठे लोगों में एक एक व्यक्ति ऐसा था जो सुरश प्रभुजी के बारे में कुछ न कुछ कहना चाहता था, जिनमें कॉर्पोरेट से लेकर बैंकिंग, राजनीति, सामाजिक व साहित्यिक जगत के जाने माने लोग शामिल थे ।
एक श्रोता का कहना था,कई फूलों की मिठास और फूलों की महक से सराबोर है श्री सुरेश प्रभु का व्यक्तित्व, वो अकेले एक ऐसे बगीचो के समान हैं कि आप उनके बारे में जितना जानो और जितना कहो वह आधा अधूरा रहेगा।
एक अन्य श्रोता ने कहा कि अगर हाल में बैठे सब लोगों को बोलने का मौका दिया जाता तो ये कार्यक्रम की दिन चलता और लोग हिलते भी नहीं । राजनीति के क्षेत्र में सक्रिय रहते हु़ए किसी व्यक्ति के बारे में किसी आम आदमी का ये सोचना ही इस बात का प्रमाण है कि सुरेश प्रभु जैसे लोग जिस क्षेत्र में रहेंगे अपने कार्यों से उस क्षेत्र की प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बढ़ा देंगे ।
पुस्तक का प्रकाशन स्वामीराज प्रकाशन के श्री रजनीश राणे तथा वर्धमान श्रुतगंगा ट्रस्ट के श्री संजय शहा के सहयोग से समय पर संपन्न हुआ।



