उन्नीस सौ सत्तर का दशक।
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक दिन अजीब नज़ारा देखने को मिला। एक रहस्यमयी महिला स्टेशन के वीआईपी वेटिंग रूम में दाखिल हुई और देखते ही देखते उसने उस जगह को अपना स्थायी ठिकाना बना लिया। कहा जाता है कि यह वही वीआईपी कक्ष था, जिसे कभी भारत के आख़िरी वायसराय लॉर्ड माउंटबैटन के लिए तैयार किया गया था।
महिला का व्यक्तित्व असाधारण था। लंबी, मजबूत कद-काठी, चेहरा पत्थर की मूर्ति जैसा स्थिर और आँखें ऐसी कि बिना पलक झपकाए किसी को भी देखती रहें। वह भारी भरकम रेशमी साड़ियाँ पहनती थी और अफ़वाह थी कि साड़ी की सिलवटों में हमेशा एक पिस्तौल छिपा रहता था।
उसके साथ दो बच्चे थे, एक बेटा और एक बेटी। साथ में विदेशी कुत्ते और कुछ नेपाली नौकर थे।
कुछ ही दिनों में वीआईपी रूम का रूप बदल गया। फ़र्श पर फ़ारसी क़ालीन, दीवारों पर पेंटिंग्स,और शाही साज-सज्जा दिखाई देने लगी। महिला के लिए खाना चाँदी के बर्तनों में परोसा जाने लगा। पूरा माहौल किसी महल जैसा लगने लगा।
एक दिन स्टेशन मास्टर ने हस्तक्षेप करने की कोशिश की। लेकिन अंदर जाने से पहले ही वर्दीधारी नौकरों ने उन्हें रोक दिया।
“जानते हैं, अंदर कौन हैं?”
स्टेशन मास्टर ने सिर हिलाया नहीं।
जवाब मिला।
“मलिका-ए-अवध, बेगम विलायत महल।”
यह सुनते ही स्टेशन मास्टर चुपचाप लौट गए।
दिन बीतते गए कभी कोई बेगम से सीधे बात करने की कोशिश करता तो उसे टोक दिया जाता।
बेगम से संवाद का तरीका अनोखा था।
अपनी बात कागज़ पर लिखो, उसे चाँदी की थाली में रखो। नौकर वह पर्ची बेगम के सामने ले जाते, ज़ोर से पढ़ते और जवाब लेकर लौटते।
बच्चों के सामने भी बेगम का वही रुतबा था, वे अपनी माँ को “हर हाईनेस” कहकर संबोधित करते।
यह विचित्र शाही जीवन लगभग एक दशक तक चलता रहा। जब लखनऊ में खबर पहुँची कि अवध की बेगम दिल्ली में रहती हैं, तो मिलने वालों की भीड़ उमड़ने लगी। खासकर शिया मुसलमानों में उत्सुकता और भावनात्मक जुड़ाव दिखा। कई लोग उन्हें देखकर भावुक हो जाते।
धीरे-धीरे अख़बारों में सुर्खियाँ छपने लगीं।
“वाजिद अली शाह के वंशज रेलवे स्टेशन में रहते हैं।”
वाजिद अली शाह अवध के आख़िरी नवाब थे।
लोकप्रिय किस्सों के अनुसार, 1856 में अंग्रेजों ने कुशासन का आरोप लगाकर अवध का विलय कर लिया। 1857 की क्रांति के बाद परिस्थितियाँ और बदल गईं। नवाब की शेष ज़िंदगी कलकत्ता में गुज़री। हालाँकि उनके कई वंशज लखनऊ में ही रहे।
दिल्ली में बेगम विलायत महल का प्रकरण जब प्रशासन तक पहुँचा, तो हलचल मच गई। उस दौर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा थे। राज्य सरकार की ओर से बेगम को लखनऊ लौटकर रहने के प्रस्ताव दिए गए।
कहानी के अनुसार, पहले नकद सहायता का प्रस्ताव आया, जिसे बेगम ने ठुकरा दिया। फिर मकान की पेशकश हुई, लेकिन उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
मामला तब और चर्चित हो गया जब विदेशी पत्रकार इसमें दिलचस्पी लेने लगे। अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने रेलवे स्टेशन पर रहने वाली रानी की कहानियाँ छापीं।
आख़िरकार केंद्र सरकार तक बात पहुँची। तत्कालीन इंदिरा सरकार ने हस्तक्षेप किया। सरकारी प्रक्रिया के तहत 1985 में बेगम विलायत महल और उनके परिवार को दिल्ली के मालचा महल में रहने की अनुमति दी गई।
मालचा महल तुगलक काल की एक शिकारगाह का ढाँचा था, जो घने जंगलों के बीच स्थित था।
मालचा महल कहने को तो महल था पर उसकी हालत जर्जर थी। वहाँ न बिजली थी, न पानी। पत्थर की ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ और ऊपर जंग लगा लोहे का गेट।
मालचा महल में आने के बाद विलायत के परिवार ने महल के चारों ओर कँटीले तार और चेतावनी-पट्ट लगाए।
“बिना अनुमति प्रवेश वर्जित।”
“कुत्तों से सावधान।”
“अंदर आना जानलेवा हो सकता है।”
अंदर का माहौल किसी विचित्र संग्रहालय जैसा बताया जाता है। दीवारों पर हथियार, पुराने फ़र्नीचर, अवध के नवाबों की तस्वीरें, तलवारें और दुर्लभ सिक्के।
बेगम और उनका परिवार शायद ही कभी दिन में बाहर दिखता। स्थानीय लोगों के बीच रहस्य, अफ़वाह और किंवदंतियाँ फैलती रहीं।
दिल्ली के बीचों-बीच, जंगल में छिपा एक महल और उसमें रहता एक नवाबी परिवार।
कई वर्षों तक मालचा महल खबरों से लगभग गायब रहा। फिर 1997 में टाइम मैगजीन ने इस परिवार का इंटरव्यू प्रकाशित किया तब पता चला कि बेगम विलायत महल की 1993 में मृत्यु हो चुकी थी। बच्चों ने दावा किया की “बेगम ने हीरा निगलकर आत्महत्या कर ली थी।
बेगम के बेटे प्रिंस साइरस ने बताया कि उनकी माँ को महल के पास ही दफनाया गया था।
समय के साथ मालचा महल अफ़वाहों का केंद्र बन गया। किसी के लिए वह भूतिया महल था, तो किसी के लिए वहां गड़ा हुआ शाही ख़ज़ाना मौजूद था।
1994 में कुछ लोग महल में घुस आए। साइरस और उनकी बहन सकीना को भय हुआ कि कहीं कोई उनकी माँ की कब्र न खोद दे। कथा के अनुसार, उन्होंने बाद में शव को निकालकर जला दिया। अब दोनों बिल्कुल अकेले थे।
न कोई आय का साधन, न कोई सामाजिक सहारा।
इसके बावजूद उन्होंने महल छोड़ने से साफ इन्कार कर दिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी कीमती वस्तुएँ बेचनी शुरू कीं। जीवन कठिन होता गया, पर व्यवहार अब भी शाही परिवार जैसा रहा।
कहा जाता है कि विलायत महल के निधन के बाद भी दोनों ऐसे बर्ताव करते रहे मानो वह जीवित हों।
समय बीतता गया। इक्कीसवीं सदी आ गई।
मालचा महल अब और ज्यादा जर्जर हो चुका था। खबरें कभी-कभार अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखतीं, पर लोगों की दिलचस्पी घट चुकी थी।
फिर 2016 में कहानी ने एक दिलचस्प मोड़ लिया।
दिल्ली स्थित महिला पत्रकार एलेन बैरी के पास एक कॉल आया,बैरी उस समय द न्यूयॉर्क टाइम्स की साउथ एशिया ब्यूरो चीफ थीं।
कॉल करने वाले ने बताए कि उसका नाम प्रिंस साइरस है… और वो बैरी से मिलना चाहता था।
मुलाकात तय हुई और एक दिन जंगल के सुनसान रास्तों से गुजरते हुए वह मालचा महल पहुँचीं। ड्राइवर को बाहर रुकने को कहा और स्वयं अंदर चली गईं।
रिपोर्ट के अनुसार, अचानक झाड़ियों में हलचल हुई।
एक व्यक्ति सामने आया।
छोटा कद, बिखरे बाल, ऊँची कमर वाली जींस और चेहरे पर अजीब थकान।
उसने तेज़ आवाज़ में कहा।
मिस बैरी
ऐसा लगा मानो उसने बहुत समय से किसी से बातचीत न की हो।
वह बैरी को पत्थरों और काँटों से भरे रास्ते से महल के भीतर ले गया। ढीली कुंडी वाला लोहे का गेट खुला।
अंदर का दृश्य चौंकाने वाला था।
खाली पत्थर के कमरे,
फीके पड़े कालीन,
पीतल के गमलों में सूखे पौधे।
दीवार पर विलायत महल की एक तस्वीर टंगी थी
ध्यानमग्न, स्थिर, लगभग अलौकिक।
साइरस उन्हें छत पर ले गया।
वह किनारे खड़ा होकर नीचे फैले जंगल और दूर दिखते धूल भरे शहर को देखने लगा।
जब बैरी ने परिवार के बारे में पूछा, तो साइरस ने सरकारों द्वारा किए गए “अन्याय” की लंबी कहानी सुनाई।
जब बैरी ने इंटरव्यू प्रकाशित करने की अनुमति मांगी, तो साइरस ने मना कर दिया।
“इसके लिए मेरी बहन सकीना की अनुमति ज़रूरी है।”
मुलाकातों का सिलसिला महीनों चलता रहा। हर बार कोई नया कारण, नई शर्त।
फिर एक रात फोन आया।
साइरस रो रहा था।
उसने बताया
“मेरी बहन सकीना की कई महीने पहले मृत्यु हो चुकी है।”
2017 में बैरी और साइरस की आख़िरी मुलाकात हुई।
कुछ समय बाद वो लंदन चली गईं लंदन में एक दिन उन्हें खबर मिली की प्रिंस साइरस की मौत हो गई।
बताया गया कि उन्हें डेंगू हुआ था।
साइरस ने अस्पताल जाने से इंकार कर दिया और आठ दिन की बीमारी के बाद उसे महल के फर्श पर मृत पड़ा पाया गया।
दिल्ली गेट कब्रिस्तान में सायरस का अंतिम संस्कार किसी लावारिस की तरह किया गया।
कब्र पर कोई नाम नहीं लिखा गया बस एक नंबर था DB33B
प्रिंस साइरस की मौत के बाद बैरी ने फिर एक बार मालचा महल गई , इस बार उन्हें कुछ पुराने खत मिले। तलाशी के दौरान वेस्टर्न यूनियन की रसीदें भी मिलीं जिनसे पता चला कि इंग्लैंड के ब्रेडफोर्ड शहर से उन्हें पैसे भेजे जाते थे।
साथ में एक पुराना पत्र भी मिला
उसमें लिखा था।
“भगवान के लिए अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश करो। अगर मुझे कुछ हो गया, तो तुम्हारा क्या होगा?”
पत्र के अंत में हस्ताक्षर थे
शाहिद।
वैसे भी प्रिंस साइरस की मौत के बाद मामल और रहस्यमय हो गया था। सच्चाई को जानने की उत्सुकता बैरी को लखनऊ खींच गई। वहाँ बुज़ुर्गों से बातचीत में एक अलग ही तस्वीर उभरी।
कई लोगों ने बताया कि 1970 के दशक में भी विलायत महल के “शाही दावों” पर संदेह था।
“हमने सबूत मांगे थे। उन्होंने पुराने बर्तन और सामान दिखाए, लेकिन कोई आधिकारिक दस्तावेज़ नहीं था”
लखनऊ से ठोस जानकारी न मिलने पर बैरी ने इंग्लैंड के ब्रेडफोर्ड का रुख किया और पत्र पर लिखे पते के आधार पर एक साधारण से घर तक पहुँचीं।
दरवाज़ा खुला सामने खड़ा था वही शख्स
शाहिद बट विलायत बेगम का सबसे बड़ा बेटा।
उसके चेहरे की बनावट साइरस से मिलती-जुलती।
घर की एक दीवार पर विलायत महल की तस्वीर टंगी हुई थी।
पहली बार कहानी ने निर्णायक मोड़ लिया।
बेगम विलायत महल का असली नाम था विलायत बट और पति का नाम था इनायतुल्लाह बट। इनायतुल्लाह बट लखनऊ यूनिवर्सिटी में रजिस्ट्रार थे।
1947 विभाजन का उथल-पुथल भरा दौर था इसी दौरान साइकिल से घर वापिस लौट रहे इनायतुल्लाह बट पर हमला हुआ था, इस घटना के बाद परिवार ने पाकिस्तान जाने का निर्णय लिया और विलायत पाकिस्तान चली गईं। जहां उसके पति इनायतुल्लाह बट को पाकिस्तान एविएशन में कोई बड़े से पद की नौकरी मिल गई थी।लेकिन भारत और खासकर लखनऊ उनके मन से कभी नहीं निकले।
फिर विलायत को एक और झटका लगा 1951 में उनके पति की अचानक मौत हो गई,इसके बाद कारणों का तो पता नहीं है लेकिन पाकिस्तान सरकार ने उनकी संपत्ति जब्त कर ली थी।
1954 में कराची में एक सनसनीखेज घटना का उल्लेख मिलता है जहाँ संपत्ति की जप्त करने से नाराज विलायत महल ने पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा को सार्वजनिक रूप से थप्पड़ जड़ दिया था।
इसके बाद उन्हें कुछ समय के लिए लाहौर के एक मेंटल अस्पताल में रखा गया और “इलाज” के नाम पर इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी दी गई।
अस्पताल से निकलने के बाद विलायत अपने छोटे बच्चों के साथ भारत लौट आईं और सीधे श्रीनगर पहुँचीं, जहाँ उसके काफी रिश्तेदार पहले से बसे हुए थे आवास मिलने वजह नहीं पता लेकिन श्रीनगर में उन्हें एक सरकारी आवास मिला, एड्रेस था जवाहर नगर, क्वार्टर नंबर 24 . यहीं से विलायत ने स्वयं को “अवध की रानी” बताना शुरू किया।
पड़ोसियों के अनुसार, वह अक्सर कहा करतीं: “हम अवध के शाही वारिस हैं।” न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जवाहर नगर के बुज़ुर्ग बताते थे कि कैसे विलायत ने घर के अंदर की दीवारें तुड़वा दीं।
कारण?“शाही बच्चे बाहर नहीं खेलते…
वे घर के अंदर क्रिकेट खेलेंगे।”
विलायत का व्यवहार अक्सर अजीब और कभी-कभी अपमानजनक माना जाता था। वे अपने बच्चों को आसपास के लोगों से बातचीत करने से रोकतीं और कहतीं
“ये मामूली लोग हैं… तुम शाही हो।”
दिल्ली आने के बाद विलायत ने अपने बच्चों की पहचान भी बदल दी। प्रिंस साइरस और प्रिंसेस सकीना
लेकि उनके असली नाम थे मिकी बट और फरहान या फरहाद बट लेकिन वो किसी नवाबी वंश के राजकुमार-राजकुमारी नहीं थे।
बैरी की पड़ताल में एक और दर्दनाक सच सामने आया। विलायत बट के वास्तव में तीन नहीं कुल चार या पांच बच्चे थे। तीसरे बेटे का नाम था असद बट, जब विलायत अपने दो छोटे बच्चों के साथ श्रीनगर छोड़कर चली गईं, असद वहीं रह गया, क्योंकि वह अपनी माँ की “शाही कल्पनाओं” का हिस्सा नहीं बनना चाहता था।
असद उसी खाली सरकारी क्वार्टर में अकेला रहने लगा।
न कोई देखभाल, न आमदनी, न सहारा। धीरे-धीरे उसका मानसिक संतुलन बिगड़ता गया। और फिर एक दिन…उसी घर में उसकी लाश मिली। यह इस परिवार का सबसे त्रासद अध्याय बन गया।
कश्मीर में रहते हुए विलायत ने अपने “शाही अधिकारों” को मान्यता दिलाने की कोशिश की।
वे सरकारी अधिकारियों से मिलीं और माँग रखी…
“डल झील के किनारे मेरे लिए एक महल बनवाया जाए।”
अधिकारियों ने विनम्रता से कहा कि
“अगर आप सच में अवध की रानी हैं, तो आपको लखनऊ जाना चाहिए।”
यह सुनकर विलायत क्रोधित हो उठीं।
“मैं जहाँ चाहूँ रह सकती हूँ।
मेरा परिवार भारत का सबसे अमीर शाही परिवार है!”
जब उनसे दस्तावेज़ माँगे गए, तो वे नाराज़ हो गईं।
उस दिन के बाद उन्होंने सरकारी अफसरों से मिलना लगभग बंद कर दिया।
यहीं से विलायत बेगम ने मीडिया का सहारा लेना शुरू किया।
स्थानीय अख़बारों में खबरें छपने लगीं
“अवध की आख़िरी बेगम”
इंटरव्यू में विलायत हमेशा दावा करतीं की
“अंग्रेजों ने 1856 में हमारा राज्य छीना।
लेकिन हमारा ख़ज़ाना, हमारे हीरे-जवाहरात सुरक्षित हैं।”
जब पत्रकार सबूत माँगते, जवाब मिलता
“हमारे दस्तावेज़ इतने कीमती हैं कि मामूली लोगों को नहीं दिखाए जा सकते।”
उन्नीस सौ सत्तर के दशक की शुरुआत में विलायत अपने दो बच्चों के साथ लखनऊ पहुँचीं।
चौक क्षेत्र में उन्होंने घोषणा की
“मैं बेगम विलायत महल हूँ।
अवध की आख़िरी रानी।
मेरा महल और जागीरें लौटाई जाएँ।”
लखनऊ स्तब्ध था।
कुछ लोग भावुक हुए।
कुछ संदेह में रहे।
इतिहासकारों और अवध के पुराने खानदानों से जुड़े लोगों ने स्पष्ट कहा
“अवध के इतिहास में इस नाम की कोई बेगम दर्ज नहीं है।”
जब अधिकारियों ने प्रमाण माँगे, विलायत ने पुराने बर्तन और तलवारें दिखाईं
लेकिन कोई आधिकारिक दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं कर सकी और विलायत के दावे खारिज कर दिए गए।
लखनऊ में असफल होने के बाद विलायत नई दिल्ली पहुँचीं।
और वहीं…
रेलवे स्टेशन के वीआईपी वेटिंग रूम में उन्होंने डेरा डाल दिया।
यहीं से शुरू हुआ था विलायत। महल का “रेलवे-स्टेशन दरबार”
जिसकी कहानी हम पहले देख चुके हैं।
क्यों एक महिला ने अपनी और अपने बच्चों की ज़िंदगी को इतने बड़े भ्रम में ढाल दिया?
शाहिद बट ने बाद में बताया की “यह विभाजन का गहरा आघात था। पाकिस्तान में भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिला पति की मृत्यु और मेंटल अस्पताल का अनुभव…एक के बाद एक झटकों ने उसे ऐसी मानसिक अवस्था में पहुँचा दिया,जहाँ उसने विलायत महल के रूप में अपना एक नया व्यक्तित्व गढ़ लिया।
यह लेख सत्य घटनाओं पर आधारित है। यह कहानी कोई ‘शाही स्कैम’ की नहीं, बल्कि एक ऐसी महिला की है जो विभाजन के सदमे, व्यक्तिगत नुकसान और मानसिक बीमारी के कारण खुद को एक काल्पनिक शाही पहचान में पूरी तरह समाहित कर चुकी थी।
“यह विवरण अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स और उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों पर आधारित है। विभिन्न रिपोर्ट्स में कुछ घटनाओं, तिथियों या परिस्थितियों को लेकर मामूली अंतर देखने को मिलता है, इसलिए कुछ बिंदुओं में विवरण ऊपर-नीचे हो सकते हैं। हमारा उद्देश्य किसी भी प्रकार की झूठी या भ्रामक जानकारी साझा करना नहीं है, बल्कि इतिहास, सामाजिक परिस्थितियों और इस प्रकरण से जुड़ी मानवीय व मानसिक पहलुओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।”
साभार- https://www.facebook.com/

