हो सकता आपमें से कईयों ने कभी वीको लैबोरेटरीज़ का कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल भी ना किया हो। लेकिन किसी ज़माने में टीवी पर वीको टरमरिक क्रीम या वीको वज्रदंती पाउडर के विज्ञापन आपने खूब देखे होंगे। और जिन लोगों ने देखे होंगे उनमें से अधिकतर के कानो में वो पुरानी आवाज़ इस वक्त गूंजने भी लगी होगी। वीको टरमरिक। नहीं कॉस्मैटिक। वीको टरमरिक आयुर्वेदिक क्रीम।
वीको टरमरिक क्रीम का ये जिंगल कभी लोगों की ज़ुबान पर चढ़ा हुआ था। हमारा बजाज, वॉशिंग पाउडर निरमा और फेना ही लेना की ही तरह वीको टरमरिक क्रीम के जिंगल भी ने भी इस ब्रांड को देश-विदेश में मशहूर कर दिया था। उस ज़माने में भी कई लोग थे जिन्होंने कभी वीको का कोई प्रोडक्ट इस्तेमाल नहीं किया था।
लेकिन इसका अनोखा सा जिंगल उन लोगों ने भी गुनगुनाया होगा। मुमकिन ही नहीं है कि ना गुनगुनाया हो। वीको लैबोरेटरीज़ के मुताबिकस एक चीज़ जिसने वीको को खास बनाया था वो था इसका आयुर्वेदिक फॉर्मुला। वीको उस वक्त डाबर व हिमालयाज़ जैसी आयुर्वेदीक प्रोडक्ट्स बेचने वाली कंपनियों की तगडी कॉम्पिटीटर बन गई थी।
फेयरनेस क्रीम में हल्दी का इस्तेमाल करके वीको ने खूब लोकप्रियता बटोरी। हल्दी तो वैसे भी भारत के हर घर की रसोई का अभिन्न इन्ग्रीडिएंट है। इसलिए जनता में इस क्रीम के प्रति बहुत उस्तुकता थी। वीको उन शुरुआती ब्रांड्स में से एक है जिसने ‘ये जो है ज़िंदगी’ व कई और दूरदर्शन के शोज़ स्पॉन्सर किए थे।
वो दौर जब टीवी भी हर घर में नहीं हुआ करते थे। स्मार्टफोन्स और इंटरनेट की कल्पना भी किसी ने नहीं की थी, उस दौर में वीको ने अपने जिंगल के सहारे शोहरत बटोरी थी। वीको की लोकप्रियता का अंदाज़ा ऐसे भी लगाया जा सकता है कि इसे कई अवॉर्ड्स मिले थे। 2017 में भी वीको को मार्केटिंग कैटेगरी में एबीपी ब्रांड एक्सलेंस अवॉर्ड मिला था। तो चलिए, जानते हैं कि वीको की शुरुआत कैसे हुई थी।
इस कंपनी की स्थापना की थी केशव विष्णू पेंढारकर ने साल 1952 में। उस वक्त कंपनी का नाम विष्णू इंडस्ट्रियल कैमिकल कंपनी था। बाद में वो वीको लैबोरेटरीज़ हो गया। कहा जाता है कि एक दिन केशव विष्णू पेंढारकर नागपुर की एक राशन की दुकान पर बैठे थे। तभी उनके ज़ेहन में ख्याल आया कि क्यों ना दांत साफ करने वाला एक ऐसा पाउडर बनाया जाए जो पूरी तरह से कैमिकल फ्री हो।
बस, लग गए केशव विष्णू पेेंढारकर मेहनत करने। और कुछ दिन बाद उन्होंने एक हर्बल टीथ क्लीनिंग पाउडर तैयार भी कर लिया। अपने उस हर्बल टीथ क्लीनिंग पाउडर को केशव जी घर-घर बेचने जाने लगे। उनके बेटे भी उनके साथ रहते थे। उनकी मेहनत रंग लाई। पाउडर की डिमांड बढ़ने लगी। और कुछ ही सालों में केशव जी ने नागपुर, गोवा व डोंबीवली में प्रोडक्शन यूनिट्स भी इस्टैब्लिश कर ली।
शुरुआत में तो वीको के प्रोडक्ट्स सस्ते दामों पर मिला करते थे। लेकिन डिमांड बढ़ने पर कीमत भी अच्छी-खासी बढ़ा दी गई। दूसरे ब्रांड्स की तुलना में 40 प्रतिशत तक वीको के प्रोडक्ट्स महंगे हो गए। आज भी महंगे ही हैं वैसे। लेकिन महंगे उत्पादों के बावजूद वीको लैबोरेटरीज़ ने खूब तरक्की की।
हालांकि तरक्की यूं ही नहीं मिल गई। वीको लैबोरेटरीज़ को भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। जब वीको टरमरिक क्रीम लॉन्च हुई थी तब अनेकों कस्टमर्स ने शिकायत की थी कि क्रीम का इस्तेमाल करने के बाद चेहरे पर पीले निशान रह जाते हैं। कस्टमर्स की उन शिकायतों की वजह से वीको टरमरिक क्रीम का मार्केट बुरी तरह प्रभावित हुआ।
इस चुनौती से निपटने के लिए कंपनी की तरफ से डोर टू डोर सेल्समैन भेजे जाने लगे। वो सेल्समैन लोगों के सामने अपने चेहरे पर क्रीम रगड़ते थे। ये दिखाने के लिए कि वीको टरमरिक क्रीम लगाने से चेहरे पर पीले निशान नहीं रहते हैं। साल 1978 में भी वीको लैबोरेटरीज़ को एक तगड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा था।
तत्कालीन केंद्र सरकार की इस कंपनी पर टेढ़ी नज़र थी। तब सेंट्रल एक्साइज़ डिपार्टमेंट ने वीको वज्रदंती पाउडर और वीको टरमरिक क्रीम को कॉस्मैटिक प्रोडक्ट्स की कैटेगरी में डाल दिया था। जबकी वीको हमेशा से दावा करती है कि उसके प्रोडक्ट्स पूरी तरह से हर्बल हैं।
लेकिन सेंट्रल एक्साइज़ डिपार्टमेंट के उस फैसले की वजह से अब कंपनी पर कॉस्मैटिक टैक्स भरने का दबाव पड़ने लगा था। 1985 में सेंट्रल एक्साइज़ डिपार्टमेंट ने कंपनी पर एक मुकदमा भी दर्ज कराया था। उस मुकदमे का फैसला आया था साल 2007 में। वीको लैबोरेटरीज़ मुकदमा जीत गई। और उसे कोई कॉस्मैटिक टैक्स नहीं भरना पड़ा।
साल 1971 में केशव विष्णू पेंढारकर के पुत्र गजानन पेंढारकर वीको लैबोरेटरीज़ के चेयरमैन बने। उस वक्त कंपनी का टर्नओवर सालाना 1 लाख करोड़ रुपए था। और जब 2015 में गजानन पेंढारकर की मृत्यु हुई थी तब कंपनी का टर्नओवर 350 करोड़ सालाना था। और आज ये टर्नओवर 500 करोड़ रुपए सालाना है। वीको लैबोरेटरीज़ आज देश की अग्रणी आयुर्वेदिक उत्पादों की कंपनी है। तीस से अधिक देशों में वीको का बिजनेस फैला हुआ है।
बदलते वक्त के साथ वीको ने अपनी मार्केटिंग स्ट्रैटेज़ीस में भी तमाम बदलाव किए। नए ज़माने के विज्ञापन तैयार कराए गए। टीम इंडिया के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली को ब्रांंड एंबेसडर बनाया गया। जब सौरव गांगुली को कंपनी का ब्रांड एंबेसडर चुना गया था तब उन्होंने कहा था कि ये उनके लिए एक फैन मोमेंट है। क्योंकि एक वक्त था जब वो खुद टीवी पर वीको के जिंगल्स देखते थे और गुनगुनाते भी थे। वै
से, गांगुली को एक रणनीति के तहत ब्रांड एंबेसडर बनाया गया था। कंपनी की प्लानिंग थी कि उन लोगों तक पहुंच बनाई जाए जो गांगुली को क्रिकेट खेलते देख बड़े हुए हैं। आलिया भट्ट भी एक वक्त पर वीको की ब्रांड एंबेसडर रह चुकी हैं। जबकी 90s में हमने और आपने एक्ट्रेस मृणाल कुलकर्णी को वीको के विज्ञापनों में देखा था।
बदलते दौर में वीको ने अपना जिंगल भी बदल दिया। जैसे ‘ये है वोही वज्रतंदी।’ और सोशल मीडिया के दौर में अपनी प्रज़ेंस बनाए रखने के लिए कुछ साल पहले वीको ने 20 लाख रुपए इन्फ्लूएंसर मार्केट पर खर्च किए थे। वीको के नए फेशवॉस को इंट्रोड्यूज़ करने के लिए इंस्टाग्राम का सहारा लिया गया। कुछ इन्फ्लुएंसर्स से फेशवॉश के बारे में वीडियो बनवाए गए। साथ ही हैशटैग्स भी चलाए गए।

