दुनिया में शायद ही कोई सरकार होगी जो हर रोज अपने ही नागरिकों, सैनिकों और बुजुर्गों को इस तरह ज़लील करती होगी ……
जब भी आप यात्रा करने के लिए रेलवे का कोई टिकट खरीदते हैं तो टिकट पर लिखा हुआ आता है – IR recovers only 57% of cost of travel on an average.
इसका मतलब शुद्ध रूप से यह होता है कि (सालो, हरामखोरो), भारतीय रेल इस यात्रा के खर्चे की लागत का केवल 57 प्रतिशत ही वसूल कर पाता है।

सवाल यह है कि फिर यह बचा हुआ 43 % क्या वडनगर वाले मामा चुकाते हैं या रेल मंत्री जी के ससुराल से आता है? जाहिर है वह कमाई माल भाड़े से होती है? माल भाड़ा किससे वसूला जाता है, किसकी जेब से आता है? बताना ज़रा?
– क्या रेल मंत्री की रेल यात्रा के विशेष डिब्बे यानी सैलून पर लिखा है कि रेल मंत्री की इस यात्रा का 100 प्रतिशत खर्च भारत की जनता वहन करती है?
– क्या 8500 करोड़ के उस विशेष हवाई जहाज पर लिखा है कि इस विमान का 100 प्रतिशत खर्च भारत की जनता वहन करती है?
– इसी हिसाब से क्या मंत्रियों के बंगलों की दीवार पर नहीं लिखा जाना चाहिए कि यह बंगला, इसमें सुख सुविधा और विलासिता का सारा का सारा खर्च भारत की जनता वहन करती है?
-क्या माननीयों की कारों पर भी ऐसा नहीं लिखना चाहिए?
मंत्रियों, सांसदों, विधायकों को टोल टैक्स नहीं देना पड़ता, लेकिन सेना के अफसरों और जवानों के वाहन केवल तभी टोल से छूट पाते हैं, जब वे सरकारी ड्यूटी पर हों। नेताओं को यह विशेष राहत क्यों? क्या उनका आना जाना सैनिकों से ज्यादा महत्वपूर्ण है?
सड़क परिवहन मंत्री कहते हैं कि टोल टैक्स सभी को देना चाहिए। आप और आपकी जमात क्यों नहीं देते श्रीमान?
दुनियाभर के सभ्य देशों में बुजुर्गों को विमान और रेल यात्रा में छूट मिलती है, कई देशों में तो उनसे पार्किंग और टोल टैक्स भी नहीं लिया जाता।
यहां सरकार कहती है कि बुड्ढे हो गए तो क्या एहसान कर रहे हो? पैसे नहीं हैं तो घर बैठो!
कभी किसी पैसेंजर ट्रेन में साधारण सेकण्ड क्लास के डिब्बे में चढ़कर तो देखिए, किसी कस्बे के अस्पताल में इलाज के बहाने घूमकर आइये, फेरी लगाकर सामान बेचनेवाले किसी आदमी या औरत से बात करके तो देखिये, किसी कम्पोजिट दुकान पर पव्वा खरीदने वाले से बात तो कीजिए , आम आदमी की बेइज्जती, उत्पीड़न, और कुंठा की फाइलें खुलती जाएंगी।
बाकी तो सब कुछ चंगा है जी !
(डॉ. प्रकाश हिंदुस्तानी एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, वेब पत्रकारिता के अग्रणी रहे हैं, लेखक और फिल्म समीक्षक हैं, जिन्हें हिंदी इंटरनेट पत्रकारिता में पीएचडी करने वाले पहले पत्रकार के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 40 वर्षों तक नईदुनिया, नवभारत टाइम्स (8 वर्ष संपादक) और सहारा टीवी जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों में कार्य किया और वे webdunia.com के संस्थापक संपादक भी रहे हैं। इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं)

