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संघ की स्थापना का उद्देश्य स्वतंत्रता, समाज, परिवार, संस्कृति और राष्ट्र को दीर्घजीवी सोच के साथ बचाए रखना हैः श्री गुरुमूर्ति

मुंबई। देश के जाने माने अर्थशास्त्री व राष्ट्रवादी चिंतक श्री एस. गुरूमूर्ति को किसी भी विषय पर सुनना एक दुर्लभ, रोमांचक, अध्यात्मिक, प्रेरक व रोमांचकारी अनुभव होता है। वे अपनी बात जिन ऐतिहासिक तथ्यों वसामाजिक साराकारों के साथ रखते हैं तो ऐसा लगता है जैसे उनके व्याख्यान के साथ कोई फिल्म चल रही है।

मुंबई के नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज में एएनएमआई (एसोसिएशन ऑफ नेशनल स्टॉक एक्स्चेंज मेंबर ऑफ इंडिया) में श्री एस गुरुमूर्ति ने ‘आरएसएस@100: लॉंग टर्म मिशन इन ए शॉर्ट टर्मिस्ट वर्ल्ड’ पर अपने धाराप्रवाह भाषण में उपस्थित श्रोताओं को जैसे झकझोर दिया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की उपलब्धियों, चिंतन, समर्पण, दूरदृष्टि और सेवाकार्यों को उन्होंने ऐतिहासिक प्रमाणों, तथ्यों और उदाहरणों के साथ इतनी सहजता से प्रस्तुत किया कि कॉर्पोरेट जगत के श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हैं सवा घंटे तक लगातार सुनते रहे। उनका भाषण प्रारंभ होते ही एनएसई के पूरे हाल में निस्तब्धता छा गई, मानो कोई भी उनके कहे हुए एक भी शब्द से चूकना नहीं चाहता था।

श्री गुरुमूर्ति ने अपने भाषण का प्रारंभ करते हुए कहा  आप जानते हैं, हम आज एक अल्पकालिक (short-term) दुनिया में जी रहे हैं और हम सब अल्पकालिक मुद्दों में ही उलझे हुए हैं। मेरे पास लगभग 40-50 वर्षों का अनुभव है जिससे मैं देख सकता हूँ कि समाज किस प्रकार बदला है।

आज हम में से किसी के पास समय नहीं है। मुझे याद है जब मैंने अपने पेशे की शुरुआत एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में की थी, तब मेरे कुछ मित्र मेरे कार्यालय में आकर कहते थे—“गुरु, मुझे बोरियत हो रही थी, इसलिए सोचा तुम्हारे साथ थोड़ा समय बिताऊँ।”

 

लेकिन पिछले 25 वर्षों में मैंने यह वाक्य नहीं सुना कि “मुझे बोरियत हो रही है, इसलिए मैं तुम्हारे साथ समय बिताने आया हूँ।”

आज किसी के पास समय नहीं है।
हमारे पास दोस्तों के लिए समय नहीं है।
परिवार के लिए समय नहीं है।
बच्चों के लिए समय नहीं है।
पड़ोसियों के लिए समय नहीं है।

क्योंकि अल्पकालिक लाभ की दौड़ इतनी शक्तिशाली हो गई है कि हमने जीवन की बुनियादी बातों को लगभग खो दिया है।

उन्होंने कहा कि मैं मैं उन ठोस पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करूँगा जहाँ हम सभी अल्पकालिक सोच (short-termism) में फँसे हुए हैं।

उन्होंने कहा, आप जानते हैं, आधुनिक अर्थशास्त्र को आकार देने वाले महान अर्थशास्त्रियों में से एक थे लॉर्ड मेनार्ड कीन्स (Lord Maynard Keynes)। आपने उनका नाम अवश्य सुना होगा। वे अर्थशास्त्र के क्षेत्र के सबसे प्रतिभाशाली मस्तिष्कों में से एक थे और उन्होंने भारत की मुद्रा प्रणाली पर भी काम किया था।

लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान तब सामने आया जब वैश्विक अर्थव्यवस्था महामंदी (Great Depression) के दौर से गुजर रही थी। उन्होंने उस समय की प्रचलित आर्थिक सिद्धांत को संशोधित किया। पहले यह माना जाता था कि बाजार हमेशा कुशल होता है और स्वयं ही सब ठीक कर लेगा।

लेकिन कीन्स ने कहा कि बाजार भी थक सकता है

जैसे यदि आप अपने शरीर को रोज़ व्यायाम, अच्छा भोजन और पर्याप्त नींद से स्वस्थ रखते हैं तो वह कुशलता से काम करता है। लेकिन हम हमेशा ऐसा नहीं करते—कभी खराब खाना खाते हैं, कम सोते हैं, व्यायाम नहीं करते—तो शरीर थक जाता है।

ऐसे समय शरीर को एक उत्तेजना (stimulus) की आवश्यकता होती है।

इसी प्रकार कीन्स ने कहा कि जब बाजार थक जाए, तो सरकार को आर्थिक प्रोत्साहन (stimulus) देना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाजार लंबी अवधि में स्वयं को सुधार लेगा। लेकिन उन्होंने प्रसिद्ध वाक्य कहा—
लंबी अवधि में तो हम सब मर चुके होंगे।”

यानी केवल दीर्घकालिक सोच पर भरोसा करना पर्याप्त नहीं है।

इसी तरह विकास अर्थशास्त्र में भी अल्पकालिक बनाम दीर्घकालिक सोच का प्रश्न महत्वपूर्ण बन गया।

मुझे एक पुस्तक की प्रस्तावना याद आती है जिसे पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1956 में प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक के लिए लिखा था। दिनकर को “राष्ट्रकवि” कहा जाता था।

नेहरू ने उसमें लिखा कि आर्थिक विकास का अर्थ है अपनी परंपराओं से बाहर निकलना, एक नया समाज, नई अर्थव्यवस्था, नई सोच और नए दृष्टिकोण बनाना।

उन्होंने कहा कि विकास का अर्थ परंपराओं का त्याग करना है।

संयुक्त राष्ट्र ने 1951 में कहा था कि यदि किसी देश को विकास करना है तो उसे अपनी पुरानी दार्शनिकताओं को त्यागना होगा। जाति, पंथ और पुराने सामाजिक संबंधों को तोड़ना होगा।

एक संबंध आधारित समाज (relation-based society) को अनुबंध आधारित समाज (contract-based society) में बदलना होगा।

तभी विकास संभव होगा।

लेकिन नेहरू ने कहा—यदि हम परंपराओं को छोड़ देते हैं, तो हम अपने मूल्यों को भी खो देंगे।

इसलिए हम एक दुविधा में फँसे हैं—
एक ओर विकास की आकांक्षा है,
और दूसरी ओर परंपराओं को बचाए रखने की कठिनाई।

उन्होंने कहा कि इसी कारण समाज में चरित्र का संकट (crisis of character) उत्पन्न हो सकता है।

यही वह महत्वपूर्ण प्रश्न था जो भारत के विकास की नींव रखने वाले एक महान नेता के मन में था।

मैं इसका उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि विकास और हमारी जीवन-दृष्टि के बीच एक अंतर्निहित संघर्ष है

इसी पृष्ठभूमि के साथ अब मैं आपको एक नए दृष्टिकोण की ओर ले जाना चाहता हूँ—
अल्पकालिक सोच (Short-termism) और दीर्घकालिक सोच (Long-termism) के बीच के अंतर को समझने के लिए।

लेकिन उससे पहले हमें अपने मन को खाली करना होगा, क्योंकि यदि हमें ऐसी किसी चीज़ को समझना है जो वर्तमान में हो रही चीज़ों से बहुत अलग है, तो हमें अपने मन को खाली करना होगा।

महर्षि अरविंद के जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए श्री गुरुमूर्ति ने कहा,  अरविंद कोलकाता से पांडिचेरी आए थे। उन्होंने अपने क्रांतिकारी मार्ग को छोड़ दिया था और भारत के लिए एक दीर्घकालिक (long-term) मॉडल बनाने का प्रयास कर रहे थे।

जब वे पांडिचेरी आए, तो वे एक महान बुद्धिजीवी माने जाते थे। इसलिए सभी लोग उनसे उम्मीद कर रहे थे कि वे आगे का मार्ग दिखाएँगे। उस समय 1909 तक भारत का पूरा क्रांतिकारी आंदोलन लगभग समाप्त हो चुका था। 1915 तक लगभग सभी आंदोलन खत्म हो गए थे, जब तक कि महात्मा गांधी ने आकर कांग्रेस को फिर से जीवित नहीं किया।

लगभग दस वर्षों तक देश में एक तरह की शांति और ठहराव था। इसलिए सबकी निगाहें महर्षि अरविंद पर थीं कि वे मार्ग दिखाएँगे।

लेकिन महर्षि अरविंद एक रहस्यमय और पागल से दिखने वाले साधु कुलाचामी को देख रहे थे, जिनके बारे में सुब्रमण्यम भारती ने कविताएँ लिखी थीं। वह व्यक्ति कभी हँसता था, कभी रोता था, कभी सड़क की मिट्टी खा लेता था। लोगों को आश्चर्य था कि ऐसा व्यक्ति अरविंद को क्या मार्गदर्शन देगा। अरविंद के मित्र भी इस पर मुस्कुरा रहे थे। लेकिन अरविंद कहते थे—“वह मुझे रास्ता दिखाएगा।”

एक दिन अरविंद अपने मित्रों के साथ चाय पी रहे थे। तभी कुलाचामी आए और उन्होंने अरविंद के सामने रखा चाय का कप उठाया और उन्हें दिखाया।

कप चाय से भरा हुआ था।
फिर उन्होंने कप को खाली कर दिया और दोबारा दिखाया।

अरविंद ने कहा कि उन्हें वह मार्गदर्शन मिल गया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी।

उनके मित्रों ने कहा—“आपकी चाय तो चली गई, लेकिन हमें बताइए कि आपको क्या मार्गदर्शन मिला?”

अरविंद ने कहा—“उन्होंने मुझे कहा है कि अपने मन को खाली करो और फिर से नए सिरे से सोचना शुरू करो।”

आम तौर पर मैं यह बात अपने व्याख्यान के अंत में कहता हूँ, लेकिन इस विषय की प्रकृति ऐसी है कि मैं चाहता हूँ कि आप पहले ही अपने मन को खाली कर लें और नए सिरे से सोचें, ताकि आप समझ सकें कि मैं क्या कहना चाहता हूँ।

 

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि मैं सबसे पहले मैं अल्पकालिक सोच (short-termism) के ठोस पहलुओं को समझाऊँगा। दीर्घकालिक सोच (long-termism) थोड़ी अमूर्त अवधारणा है।

यदि आप यह समझना चाहते हैं कि अल्पकालिक दुनिया में दीर्घकालिक सोच क्या होती है, तो आपने शायद स्कूल में एक उदाहरण पढ़ा होगा—

एक बूढ़ा आदमी आम का पौधा लगा रहा है।
सब जानते हैं कि वह उस पेड़ का फल खुद नहीं खाएगा।
जब आम का पेड़ बड़ा होगा, शायद उसका पोता उसका फल खाएगा।

यही दीर्घकालिक दृष्टिकोण है।

आज हमें इसी दीर्घकालिक दृष्टिकोण और आज के अल्पकालिक दृष्टिकोण के बीच के अंतर को समझना होगा।

भारत एक ऐसा समाज है जिसकी हजारों वर्षों की निरंतरता है और जिसकी वह सांस्कृतिक “डीएनए” आज भी हमारे भीतर मौजूद है।

शायद यही एकमात्र समाज है जो आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी पारंपरिक अच्छाइयों को खोए बिना आगे बढ़ सकता है।

इसीलिए यह विषय हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

इसी कारण मैंने यह विषय चुना—कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) किस प्रकार एक दीर्घकालिक दृष्टि और मिशन का उदाहरण है, और कैसे उसने एक अल्पकालिक सोच वाले समाज में भी अपने दीर्घकालिक लक्ष्य के साथ काम किया और सफलता प्राप्त की।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि  उससे पहले मुझे अल्पकालिक सोच के आकर्षण को समझाना होगा।

उदाहरण के लिए, हम अभी नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में एकत्रित हुए हैं। मैं अपने जीवन का अधिकांश समय कॉरपोरेट सलाहकार के रूप में काम करता रहा हूँ और आज भी कुछ कंपनियों को सलाह देता हूँ।

मैं 1986-87 से शेयर बाजार का विश्लेषण कर रहा हूँ। उस समय शेयर बाजार में किस तरह हेरफेर होता था, यह भी मेरे अध्ययन का विषय रहा है।

लेकिन समय के साथ बहुत बड़ा बदलाव आया है।

1980 के दशक में जब हम कंपनियों को सलाह देते थे, तो हम 10 साल की दृष्टि से योजना बनाते थे—
10 साल बाद अर्थव्यवस्था कैसी होगी, उद्योग कैसा होगा, कंपनी की स्थिति क्या होगी।

फिर हमारे पास वार्षिक बैलेंस शीट होती थी।
लेकिन बाद में वार्षिक रिपोर्ट घटकर त्रैमासिक परिणाम (quarterly results) तक सीमित हो गई। इस तरह कॉरपोरेट प्रबंधन की सोच ही अल्पकालिक हो गई।

जब डोनाल्ड ट्रम्प 2016 में सत्ता में आए, तब इस विषय पर बहुत चर्चा हुई। इंद्रा नूयी ने उनसे मुलाकात की और यहाँ तक सुझाव दिया गया कि त्रैमासिक परिणामों को ही बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इससे शेयर बाजार में भारी हेरफेर होने लगा है।

इस तरह हमारी दृष्टि लगातार छोटी होती जा रही है।

पहले हम शेयरों में निवेश करते थे, फिर इंडेक्स ट्रेडिंग आई और फिर डेरिवेटिव्स आए।

यह भी एक प्रकार की गिरावट है। क्योंकि शेयर वास्तव में कंपनी और शेयरधारक के बीच संबंध का प्रतीक होता है। लेकिन जब इंडेक्स ट्रेडिंग आई तो शेयरधारक और कंपनी के बीच दूरी बढ़ गई। और डेरिवेटिव्स के आने से यह दूरी और बढ़ गई।

अब स्थिति यह हो गई है कि मालिकाना (ownership) की अवधारणा ही लगभग समाप्त हो गई है। भारत में अभी भी कंपनियों में “प्रमोटर” की अवधारणा है। लेकिन हम अमेरिका के प्रमोटर-रहित कॉरपोरेट मॉडल के आधार पर भारतीय कंपनियों का मूल्यांकन करते हैं।

भारत में 97% कंपनियाँ परिवार के स्वामित्व और प्रबंधन में हैं। इसलिए उनमें अभी भी दीर्घकालिक दृष्टि मौजूद है, क्योंकि परिवार का दृष्टिकोण लंबा होता है।

लेकिन हम पश्चिम के अल्पकालिक मॉडल का अनुसरण कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि हमारे देश में पहले ब्याज दरें वार्षिक आधार पर तय होती थीं। फिर वे त्रैमासिक हो गईं। अब तो ओवरनाइट ब्याज दरें ही पूरे राष्ट्र का माहौल तय कर देती हैं। यह भी अल्पकालिक सोच का उदाहरण है।

यहाँ तक कि इंट्राडे ट्रेडिंग—यानी एक ही दिन के छह घंटों में होने वाले उतार-चढ़ाव—भी लोगों की चिंता का कारण बन जाते हैं। इस प्रकार अल्पकालिक सोच हमें नियंत्रित कर रही है।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि बहुत कम लोगों ने यह चर्चा की है कि 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी क्यों आई। अमेरिका की फेडरल डिपॉजिट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन की अध्यक्ष शीला ब्लेयर ने इस संकट के कारणों पर एक भाषण दिया।

उन्होंने कहा कि इस संकट का सबसे बड़ा कारण अल्पकालिक सोच थी।

अल्पकालिक सोच व्यापार और सरकार—दोनों में एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बन चुकी है।

आज लगभग सभी लोकतांत्रिक सरकारें अल्पकालिक सोच में फँसी हुई हैं।

लोकतंत्र में सबसे बड़ा लक्ष्य यह हो जाता है कि मतदाताओं को कैसे आकर्षित किया जाए।

यह केवल भारत की समस्या नहीं है।

उदाहरण के लिए, अमेरिका की सोशल सिक्योरिटी प्रणाली—जो आज उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर रही है—भी इसी अल्पकालिक राजनीति का परिणाम है।

राजनेताओं ने लोगों से कहा—“आप अपने परिवार की चिंता मत करें, हम आपकी देखभाल करेंगे।” और इसी तरह सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली शुरू हुई, जो आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बन चुकी है।

उन्होंने कहा कि  लोकतंत्र में लगभग हर जगह यही स्थिति है।

लेकिन चीन एक अलग उदाहरण है। देंग शियाओपिंग ने कहा था—“अपनी क्षमता छिपाओ और समय का इंतज़ार करो।” चीन ने 30 वर्षों तक दीर्घकालिक दृष्टि के साथ काम किया। इसका मतलब यह है कि अल्पकालिक दुनिया में भी कुछ लोग दीर्घकालिक दृष्टि अपनाते हैं।

लेकिन भारत में हमने शायद ही कभी यह स्पष्ट रूप से चर्चा की है कि दीर्घकालिक और अल्पकालिक सोच के बीच सीमा कहाँ है।

उन्होंने बताया कि BBC के मैनेजिंग एडिटर रिचर्ड फिशर ने “Perils of Short-termism” नाम से एक लेख लिखा है। उसमें वे एक समाजशास्त्री का उद्धरण देते हुए कहते हैः

यदि मनुष्य हमेशा वर्तमान से जूझते-जूझते मानसिक रूप से थक जाता है, तो उसके पास भविष्य की कल्पना करने की ऊर्जा ही नहीं बचती।

यही अल्पकालिक सोच का सबसे बड़ा खतरा है।

यह हमारी अर्थव्यवस्था, राजनीति और पूरे सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहा है।

 

उन्होंने कहा कि मैं आपको स्वतंत्रता से पहले के भारत की ओर ले चलता हूँ। हम पर 200-300 वर्षों तक विदेशी शासन रहा। उस समय स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए तीन प्रकार के प्रयास हुए।

पहला था क्रांतिकारियों का प्रयास।

वे तुरंत स्वतंत्रता चाहते थे।
उन्होंने हिंसा का रास्ता अपनाया।

वे सभी महान देशभक्त थे।
उन्होंने अपने बारे में कभी नहीं सोचा, केवल देश के बारे में सोचा।

लेकिन उनका दृष्टिकोण अल्पकालिक था।

इसलिए वह आंदोलन सफल नहीं हुआ, क्योंकि वह जनता के बीच गहराई से जुड़ा नहीं था।

क्रांतिकारी समाज से अलग रहकर काम करते थे।

दूसरा प्रयास था राजनीतिक आंदोलन, जिसे पहले बाल गंगाधर तिलक ने आगे बढ़ाया और बाद में महात्मा गांधी ने नेतृत्व किया।

यह एक मध्यम अवधि का दृष्टिकोण था—
स्वतंत्रता प्राप्त करना और उसके लिए संगठित तरीके से संघर्ष करना।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, इन दोनों आंदोलनों में शामिल रहे। उन्होंने पहले क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने नागपुर में पढ़ाई की और फिर क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल होने के लिए कोलकाता गए।

लेकिन उन्होंने देखा कि क्रांतिकारी आंदोलन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह समाज से जुड़ा नहीं है। फिर उन्होंने कांग्रेस के राजनीतिक आंदोलन में भाग लिया।

1921 में वे सत्याग्रह के कारण एक वर्ष के लिए जेल गए। 1930 में वे फिर जेल गए।

जब वे जेल से बाहर आए तो उनका स्वागत हुआ और उस सभा की अध्यक्षता मोतीलाल नेहरू ने की।

लेकिन डॉ. हेडगेवार के मन में एक प्रश्न लगातार उठ रहा था—

स्वतंत्रता तो मिल जाएगी, लेकिन उसे बनाए कैसे रखेंगे?

समाज में वह ऊर्जा, वह राष्ट्रीय भावना, वह ईमानदारी और वह समर्पण कैसे पैदा होगा जो केवल नारों से नहीं आता?

उसके लिए लोगों को तैयार करना होगा।

इसलिए उन्हें लगा कि कांग्रेस आंदोलन में कुछ गंभीर कमी है। इसके पीछे उस समय का जो सामाजिक-राजनीतिक माहौल था, उसका कारण मैं आपको बताने जा रहा हूँ।

दरअसल 1919 में ऑटोमन साम्राज्य (Ottoman Empire) का पतन हो गया। यह लगभग 800 वर्षों तक चलने वाला एक इस्लामी साम्राज्य था, जिसने बीजान्टिन साम्राज्य के बाद सत्ता संभाली थी और विश्व के बड़े हिस्से पर शासन किया था। पहले विश्व युद्ध में हार के बाद यह साम्राज्य टूट गया।

इसके बाद भारत के मुसलमानों में बहुत असंतोष फैल गया, क्योंकि ऑटोमन साम्राज्य एक तुर्की इस्लामी साम्राज्य था। भारत के मुसलमान इसके पतन के विरोध में आंदोलन करने लगे। यदि वे केवल आंदोलन करते, तो ब्रिटिश सरकार उससे निपट लेती।

लेकिन एक ऐतिहासिक गलती तब हुई जब महात्मा गांधी ने यह निर्णय लिया कि मुसलमानों को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल करने के लिए कांग्रेस को खिलाफत आंदोलन का समर्थन करना चाहिए। इससे भारत के मुसलमानों का ध्यान भारत से बाहर की ओर जाने लगा। वे प्रेरणा भारत के भीतर से नहीं बल्कि वैश्विक इस्लाम से लेने लगे।

यही पहली बात थी जो डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नोटिस की। उन्होंने देखा कि राजनीतिक आंदोलन अक्सर देश के दीर्घकालिक हितों के बजाय तत्काल राजनीतिक लाभ के आधार पर निर्णय लेते हैं।

उस समय बाल गंगाधर तिलक का जुलाई 1919 में निधन हो गया था।
1919 के अंत में नागपुर में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था और माना जा रहा था कि महात्मा गांधी अब कांग्रेस के नेता बनेंगे।

डॉ. हेडगेवार को लगा कि मुसलमानों को आंदोलन में शामिल करने के लिए उनकी सोच को भारत से बाहर की ओर मोड़ना भारत के लिए खतरनाक होगा।

वे कांग्रेस के कार्यकर्ता थे। इसलिए वे डॉ. बी.एस. मुंजे के साथ पांडिचेरी गए और महर्षि अरविंद से अनुरोध किया कि वे फिर से राजनीति में लौट आएँ।

उन्होंने कहा कि तिलक की मृत्यु के बाद नेतृत्व में खालीपन आ गया है और नया नेतृत्व अल्पकालिक लाभ के लिए मुसलमानों को इस तरह शामिल कर रहा है, जिससे भविष्य में देश को नुकसान हो सकता है।

लेकिन अरविंद ने कहा: “मेरा मन अब राजनीति से हट चुका है। मैं भी एक दीर्घकालिक कार्य पर काम कर रहा हूँ, लेकिन मेरे लिए राजनीति में लौटना संभव नहीं है।”

इसके बाद डॉ. हेडगेवार वापस लौट आए। उन्होंने न तो राजनीति छोड़ी और न ही कांग्रेस आंदोलन। 1921 में वे स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण जेल भी गए। क्योंकि उनका मानना था कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए राजनीतिक आंदोलन आवश्यक है।

लेकिन उनके मन में यह स्पष्ट था कि यह केवल अल्पकालिक लक्ष्य है। भारत को स्वतंत्रता मिलना तय है। ब्रिटिश लंबे समय तक स्वतंत्रता को रोक नहीं पाएँगे।

लेकिन सवाल यह था—स्वतंत्रता मिलने के बाद उसे बनाए कैसे रखा जाएगा?

उन्होंने इतिहास की ओर देखा। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर लगभग नौवीं शताब्दी तक भारत एक शक्तिशाली साम्राज्य था। अफगानिस्तान से लेकर श्रीलंका और बर्मा तक भारत का प्रभाव था। मौर्यगुप्त और कुषाण जैसे साम्राज्य थे। फिर भी हम अपनी स्वतंत्रता खो बैठे।

क्यों? क्योंकि हमारे भीतर एकता की कमी थीसाहस की कमी थी, और पूरे देश को एक मानकर काम करने की भावना कमजोर थी। लोग छोटे-छोटे क्षेत्रों और हितों में बँट गए थे।

हालाँकि भारत की जीवनशैली, संस्कृति और दर्शन पूरे देश में समान थे। लोग देश के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्रा करते थे।

महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिंद स्वराज” में इस बात को समझाया है।

उन्होंने यह पुस्तक तब लिखी थी जब वे केप टाउन से लंदन जा रहे थे।
उन्होंने इसे गुजराती में लिखा और अत्यंत तेजी से लिखा—इतना कि जब उनका दाहिना हाथ थक गया तो उन्होंने बाएँ हाथ से लिखना शुरू कर दिया। इस पुस्तक में गांधीजी ने उस समय भारतीयों के मन में उठने वाले सवालों का उत्तर दिया।

लोग कहते थे:

  • केवल अंग्रेजों की वजह से हम विकसित हो सकते हैं
  • तकनीक उन्हीं के पास है
  • हम बिखरा हुआ समाज थे, उन्होंने हमें एक राष्ट्र बनाया
  • रेल और डाक व्यवस्था ने हमें जोड़ा

गांधीजी ने इन सभी सवालों का जवाब संवाद के रूप में दिया।
पुस्तक में “पाठक” सवाल पूछता है और “संपादक” जवाब देता है—और दोनों ही भूमिकाएँ गांधीजी निभाते हैं।

एक सवाल पूछा जाता है:
हम कैसे कह सकते हैं कि हम एक राष्ट्र हैं?

गांधीजी जवाब देते हैं: हमारे तीर्थस्थान, हमारी नदियाँ और पवित्र स्थल लोगों को देश के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्रा करने के लिए प्रेरित करते थे।

इस तरह हमारी सांस्कृतिक परंपरा ने हमें एक राष्ट्र बनाया।

उन्होंने कहा: अंग्रेजों को राज्य (state) ने जोड़ा है, लेकिन भारत को संस्कृति ने जोड़ा है।भारत में विविधता भी है और गहरी एकता भी। दुनिया में शायद ही कोई देश ऐसा हो जहाँ इतनी विविधता और इतनी एकता दोनों साथ-साथ मौजूद हों।

लेकिन फिर भी यह देश कमजोर कैसे हो गया?

इस पर कार्य किया डॉ. हेडगेवार ने।

डॉ. हेडगेवार ने सोचा कि हमें

चरित्र निर्माण करना होगा
एकता पैदा करनी होगी
मजबूत और समर्पित व्यक्तियों का निर्माण करना होगा

यह केवल नारों या प्रचार से संभव नहीं है। यह केवल व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क से ही हो सकता है। इसके लिए एक ऐसी पद्धति, एक मिशन और एक व्यवस्था चाहिए जो लगातार लोगों को जोड़ती रहे और शिक्षा का एक सतत प्रक्रिया चलाती रहे।

इसी विचार से उन्होंने “शाखा” की शुरुआत की।1925 में विजयादशमी के दिन उन्होंने केवल पाँच लोगों के साथ इसकी शुरुआत की।

उनके पास

पैसा नहीं था
प्रभाव नहीं था
कोई बड़ा संपर्क नहीं था

फिर भी उन्होंने कहा:
“यह हिंदू राष्ट्र है और हम पूरे देश को एक करेंगे।”

उस समय जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में एक विशाल स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, तब पाँच लोगों के साथ इतना बड़ा लक्ष्य सोचना किसी पागलपन जैसा लगता था।

लेकिन डॉ. हेडगेवार ने तय कर लिया था कि यही रास्ता है।

यह लंबा रास्ता है—
कोई शॉर्टकट नहीं है,
कोई तात्कालिक तरीका नहीं है।

वे स्कूलों में जाते थे और प्रतिभाशाली बच्चों को पहचानते थे—
जो अच्छा गाते थे, अच्छा खेलते थे, अच्छा बोलते थे।

फिर वे उनसे संपर्क करते थे और उनके परिवारों से कहते थे कि बच्चों को पढ़ाई के लिए अलग-अलग शहरों में भेजें—जैसे मुंबई, लखनऊ, कोलकाता, चेन्नई।

उनका उद्देश्य था कि वहाँ RSS की शाखाएँ शुरू हों।

इस तरह बिना पैसे के केवल शाखाओं के माध्यम से संगठन फैलने लगा।

इसका आधार था-भारत माता के प्रति समर्पण की भावना।

उन्होंने कहा: भारत सांस्कृतिक रूप से हिंदू है, हालाँकि धार्मिक और भाषाई रूप से इसमें विविधता है।जब डॉ. हेडगेवार ने 1925 में यह बात कही तो बहुत लोगों ने विश्वास नहीं किया।

लेकिन 1995-96 में सुप्रीम कोर्ट के “हिंदुत्व” संबंधी फैसले में कहा गया कि हिंदुत्व केवल धर्म नहीं है, बल्कि भारत की संस्कृति और जीवन-पद्धति है।

डॉ. हेडगेवार धीरे-धीरे युवाओं को जोड़ते रहे—16, 17, 18, 20 वर्ष के युवा।

1940 तक उन्होंने बिना पैसे के एक ऐसा संगठन बना दिया जो पूरे देश से जुड़ा हुआ था।

उन्होंने यह भी तय किया कि संगठन को कोई व्यक्ति पैसे से नियंत्रित न कर सके।

जब पंडित मदन मोहन मालवीय ने उनसे पूछा कि RSS बनाने के लिए कितना पैसा चाहिए, तो उन्होंने कहा: “मुझे पैसा नहीं चाहिए, मुझे लोग चाहिए।”

आज भी RSS की पूरी व्यवस्था गुरु दक्षिणा के छोटे-छोटे योगदान से चलती है।

कोई भी व्यक्ति चेक देकर RSS को खरीद नहीं सकता।
आप BJP या कांग्रेस को दान दे सकते हैं, लेकिन RSS को नहीं।

यह संगठन बाहरी प्रभावों से बचाने के लिए बनाया गया था।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि डॉ. हेडगेवार हमेशा प्रतिभाशाली लोगों की तलाश में रहते थे।

उन्हें पता चला कि काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एक अत्यंत प्रतिभाशाली व्यक्ति हैं—एम.एस. गोलवलकर। वे उन्हें RSS में लाना चाहते थे। जबकि गोलवलकर संन्यासी बनना चाहते थे और रामकृष्ण मिशन के स्वामी अखंडानंद के संपर्क में थे। लेकिन स्वामी अखंडानंद ने उनसे कहा कि उनका जीवन एक बड़े मिशन के लिए बना है। इसके बाद डॉ. हेडगेवार ने उन्हें RSS में शामिल किया।

डॉ. हेडगेवार स्वयं महान वक्ता नहीं थे, लेकिन उनमें एक चुंबकीय व्यक्तित्व था।

एक घटना का उल्लेख करते हुए श्री गुरुमूर्ति ने कहा, एक बार उन्हें नागपुर में सुबह 7 बजे एक कार्यक्रम में पहुँचना था। रात में बस खराब हो गई। उन्होंने पूरी रात 30 किलोमीटर पैदल चलकर सुबह 7 बजे कार्यक्रम में पहुँचकर भाग लिया।

इससे उनकी निष्ठा, समयपालन और विश्वसनीयता स्पष्ट होती है।

उन्होंने RSS में गुरु के रूप में किसी व्यक्ति को नहीं रखा। उन्होंने कहा कि व्यक्ति में कमियाँ हो सकती हैं। इसलिए उन्होंने भगवा ध्वज को RSS का गुरु बनाया—जो त्याग और आदर्श का प्रतीक है।

उनकी दृष्टि बहुत दूर की थी। वे जानते थे कि स्वतंत्रता आंदोलन अंत नहीं है।

स्वतंत्रता केवल एक साधन है। उसके बाद भी राष्ट्र को मजबूत बनाने का काम जारी रहना चाहिए।

डॉ. गोलवलकर ने सोचा कि इन सभी अल्पकालिक दृष्टिकोणों ने भारत के अंदर और बाहर दोनों जगह बड़ी चुनौतियाँ पैदा कर दीं। इसलिए RSS ने तय किया कि उसे इन सभी चुनौतियों का सामना करना होगा।

जो लोग 1920 और 1930 के दशक में RSS में काम कर रहे थे, क्या उन्होंने कभी सोचा था कि एक दिन यह देश इस स्थिति में पहुँचेगा? उन्होंने केवल काम किया।  डॉ. हेडगेवार को इस बात का विश्वास था कि यह देश महान बनेगा और यह संगठन उस लक्ष्य को प्राप्त करेगा। भले ही यह मेरे जीवनकाल में न हो, लेकिन एक दिन यह अवश्य होगा।

इसी विश्वास के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी हजारों-हजार RSS कार्यकर्ता काम करते रहे।

 श्री गुरूमूर्ति ने अपना अनुभव बताते हुए कहा,  आपातकाल (Emergency) के समय हम सभी भूमिगत होकर काम कर रहे थे। मैं भी भूमिगत रहा। उस समय जिन कार्यकर्ताओं ने मेरे साथ काम किया, उनमें से कुछ के बारे में मैंने ऑर्गेनाइज़र में लिखा भी है।

आज भी उनमें से कई लोग साइकिल से ही चलते हैं।
कुछ लोग मोटरसाइकिल से जाते हैं।

उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हमने देश के लिए काम किया है और अब जब BJP सत्ता में आ गई है, तो हमें भी उसका कुछ लाभ मिलना चाहिए।

यह RSS की सोच नहीं है। यह दीर्घकालिक दृष्टि है—आपका काम है भारत का निर्माण करना, भारत को महान और शक्तिशाली बनाना।

उन्होंने कहा कि मुझे यहाँ भारतीय रिज़र्व बैंक के स्वतंत्र निदेशक के रूप में परिचित कराया गया। यह एक ऐसा पद था जिसे मैं वास्तव में स्वीकार नहीं करना चाहता था।

लेकिन 2017 की परिस्थितियों के कारण मुझ पर बहुत दबाव डाला गया और मुझे इसे स्वीकार करना पड़ा।

मेरे गुरु कांची के महा स्वामी ने मुझे कहा था कि मुझे कभी सरकारी पद नहीं लेना चाहिए।

हम सभी को इसी प्रकार प्रशिक्षित किया गया है—
आपका काम केवल सेवा करना है।
आपको केवल यह देखना है कि देश महान बने।

उस मिशन के फलों का आनंद लेने के लिए आप नहीं हैं।

यही  भगवद गीता के कर्मयोग का वास्तविक अर्थ है।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि RSS ने अपने जीवन में बहुत बड़ी-बड़ी चुनौतियों का सामना किया।

देश का विभाजन (Partition) हुआ। लाखों-करोड़ों हिंदू मारे गए। उन लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाना, उनकी सेवा करना, उन्हें रहने की व्यवस्था देना—यह सब काम स्वयंसेवकों ने किया। उस समय सरकार कमजोर थी और उसके पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं थे।

यदि आप उस समय के साहित्य को पढ़ें, तो रात में नींद नहीं आएगी।

इसके बावजूद RSS पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाकर प्रतिबंध लगा दिया गया।

बाद में कपूर आयोग (Justice Kapoor Commission) ने स्पष्ट कहा कि RSS का गांधी हत्या से कोई संबंध नहीं है।

लेकिन आज भी राहुल गांधी जैसे नेता यह कहते हैं कि गांधी हत्या के लिए RSS जिम्मेदार है।

जबकि अदालत की चार्जशीट और पूरी जांच में साफ लिखा है कि RSS का इससे कोई संबंध नहीं था। फिर भी आज तक उस पर आरोप लगाए जाते हैं।

इतनी आलोचना, प्रतिबंध और आरोपों के बावजूद RSS चुपचाप अपना काम करता रहा।

यह मातृभूमि की सेवा का मिशन है।

दरअसल इसे सेवा भी नहीं कहा जाता।

1971 के युद्ध के बाद किसी व्यक्ति ने RSS स्वयंसेवकों की सेवा पर एक किताब लिखी और वह किताब गुरुजी गोलवलकर को दिखाई।

गुरुजी ने वह किताब फेंक दी और कहा: “तुमने अपनी माँ की सेवा की है और उस पर किताब लिखना चाहते हो?
क्या यह तुम्हारा कर्तव्य नहीं है?”

यही RSS का दृष्टिकोण है।

RSS को बहुत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा—
प्रतिबंध, विरोध, आलोचना।

जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि “मैं इस देश में भगवा झंडे को एक इंच जमीन भी नहीं दूँगा।”

लेकिन आज भगवा ध्वज पूरे देश में लहराता है।

उस समय 90,000 स्वयंसेवक जेल गए। उनमें से 40,000 युवा थे जिन्होंने अपनी पढ़ाई और परीक्षाएँ तक छोड़ दीं। सरकार को उन्हें बाद में परीक्षा देने के लिए विशेष अनुमति देनी पड़ी।

उस समय RSS एक युवा संगठन था। गोलवलकर जी केवल 37 वर्ष के थे और वे देश के सबसे बड़े नेताओं का सामना कर रहे थे। फिर भी संगठन बढ़ता गया।

क्यों? क्योंकि उसमें

  • ईमानदारी
  • समर्पण
  • देशभक्ति
  • सादगी
  • मूल्य

ये सब मौजूद थे।

1990 के दशक तक चेन्नई में RSS कार्यालय में मैंने कभी कार नहीं देखी।

जब गुरुजी गोलवलकर 1973 में चेन्नई आए, तो उन्हें एयरपोर्ट से कार्यालय तक साधारण टैक्सी में लाया गया। सबसे बड़ा साधन मोटरसाइकिल था, और अधिकांश लोग साइकिल से यात्रा करते थे।

1991 के चुनाव का एक उदाहरण देते हुए श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि एक उम्मीदवार ने अपने रिश्तेदार से पूछा कि चुनाव लड़ने में कितना पैसा लगेगा।

उसने कहा— कम से कम 30-40 लाख रुपये।

लेकिन जब वह BJP के कार्यकर्ताओं की बैठक में गया, तो उसने देखा कि वहाँ 800-900 साइकिलें खड़ी थीं। सब कार्यकर्ता अपने घर से खाना लेकर आए थे और उन्हें केवल एक कप चाय दी गई थी।

जब उसने पूछा कि चुनाव में कितना खर्च होगा, तो उत्तर मिला—
लगभग 8 लाख रुपये।

यही वह आधार है जिस पर राष्ट्र बनते हैं।

1975 में जब आपातकाल लगा, तब इंदिरा गांधी ने RSS और लोकतंत्र दोनों को दबाने की कोशिश की।

सभी नेताओं को जेल में डाल दिया गया।

लेकिन RSS ने भूमिगत रहकर पर्चों और संदेशों के माध्यम से सच्ची खबरें फैलाना शुरू किया

देश में एक ऐसा वातावरण बन गया कि अंततः 1977 में सत्ता बदल गई।

इसके बाद राम जन्मभूमि आंदोलन आया।

उसने यह विचार स्थापित किया कि भारत मूल रूप से एक दार्शनिक रूप से हिंदू देश है।

यह कोई विचारधारा (ideology) नहीं है।

क्योंकि विचारधारा कहती है—
“मैं सही हूँ और तुम गलत हो।”

लेकिन हिंदू दर्शन कहता है—
“मैं सही हो सकता हूँ, और शायद तुम भी सही हो।”

यह दृष्टिकोण दुनिया में कहीं और नहीं मिलता।

आज भी हम वैश्विक स्तर पर कई शक्तियों और विरोधों का सामना कर रहे हैं।

लेकिन हमारे पास एक चीज़ है—
समर्पण

  • भारत माता के प्रति समर्पण
  • अपने पूर्वजों के प्रति समर्पण
  • अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति समर्पण

इसी समर्पण के कारण हजारों-हजार कार्यकर्ताओं ने अपना जीवन समर्पित कर दिया।

कई परिवारों ने कठिनाइयाँ झेली, लेकिन उन्हें विश्वास था कि एक दिन यह देश महान बनेगा।

आज हम उस परिणाम को देख रहे हैं।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का 100 वर्षों का यह कार्य दुनिया के समाजशास्त्रियों के लिए अध्ययन का विषय होना चाहिए।

दुनिया में शायद ही कहीं ऐसा उदाहरण मिलेगा।

आज पूरे भारत में एक लाख से अधिक एकल शिक्षक विद्यालय चल रहे हैं।

एक व्यक्ति ही शिक्षक, मार्गदर्शक और समाजसेवक की भूमिका निभाता है।

वह बच्चों को पढ़ाता है, स्वच्छता सिखाता है, चरित्र निर्माण करता है।

इसके अलावा संघ के माध्यम से  लगभग लाख सामाजिक और सेवा गतिविधियाँ चल रही हैं।

यह सब लोगों के चरित्र, मूल्य और समर्पण को विकसित करके किया गया है।

आज की दुनिया अल्पकालिक परिणाम चाहती है—
“कल ही परिणाम मिलना चाहिए।”लेकिन RSS कहता है— “परिणाम 100 साल बाद भी आएँ तो भी चलेगा, लेकिन परिणाम स्थायी होना चाहिए।”

राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं। सरकारें बनती और टूटती रहती हैं।

लेकिन राष्ट्र बना रहना चाहिए। यही RSS का मिशन है।

श्री गुरूमूर्ति ने इस प्रेरक और धारदार वक्तव्य के बाद श्रोताओं के सवालों के जवाब भी दिए।

पहला प्रश्न था:

“पिछले एक सदी में RSS जैसे संगठनों ने जमीनी स्तर पर काम किया है। किसी देश की आर्थिक वृद्धि और वित्तीय समावेशन को मजबूत करने में सामाजिक पूंजी (Social Capital) और समुदाय की भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है?”

इस पर श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि सामाजिक पूंजी का विचार 1990 के दशक में प्रमुख रूप से सामने आया। प्रसिद्ध विचारक फ्रांसिस फुकुयामा ने “Trust” नामक पुस्तक में इस अवधारणा पर विस्तार से लिखा।

सामाजिक पूंजी (Social Capital) समाज की संपत्ति होती है।
वित्तीय पूंजी (Financial capital) आपकी व्यक्तिगत संपत्ति होती है।
बौद्धिक पूंजी (Intellectual capital) भी आपकी व्यक्तिगत होती है।
लेकिन सामाजिक पूंजी पूरे समाज की होती है

समाज कैसे काम करता है—यह पूरे भारतीय इतिहास, अर्थव्यवस्था और राजनीति में सामाजिक पूंजी के माध्यम से दिखाई देता है।

इसी कारण भारत लगभग 1700 वर्षों तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा।

अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता कि Paul Bairoch और Angus Maddison के शोध के अनुसार ईसा की पहली शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक भारत दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति था

1934 की Bank for International Settlements की रिपोर्ट के अनुसार 14वीं से 19वीं शताब्दी के बीच दुनिया में जितना सोना पैदा हुआ, उसका लगभग 15% भारत के निर्यात अधिशेष (export surplus) के रूप में आया था।

इतिहास बताता है कि पहली शताब्दी में ही भारत ने इतना सोना एकत्र कर लिया था।

ग्रीक-मिस्री इतिहास में लिखा है कि प्लिनी (Pliny) जो ग्रीक-रोमन साम्राज्य के वित्त मंत्री थे, उन्होंने कहा था:

“भारतीय हमारा सोना लूट रहे हैं। मुझे हर जगह केवल भारतीय जहाज ही दिखाई देते हैं।”

यह सब सामाजिक पूंजी की वजह से संभव हुआ था।

 

श्री गुरूमूर्ति ने कहा, मैंने इसे अपनी आँखों से भी देखा जब मैंने वैश्वीकरण (Globalization) के समय भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की ताकत का अध्ययन करने के लिए यात्रा शुरू की।

जब वैश्वीकरण आया, तो जिन व्यापारियों को मैं सलाह देता था, वे पूछते थे:
“यह एक नया जानवर है, इससे कैसे मुकाबला करें?”

उस समय केवल रतन टाटा ने सकारात्मक बात कही।
उन्होंने मुझसे कहा: “गुरु, हमें लगभग 30 साल इंतजार करना होगा, तब हम इसे पार कर पाएँगे। फिलहाल हमें धैर्य रखना होगा।”

उन्होंने कहा, मैं लुधियाना, बटाला, राजकोट जैसे शहरों में गया। मुझे मुंबई और कोलकाता में आत्मविश्वास की कमी दिखी, लेकिन इन औद्योगिक क्लस्टरों में जबरदस्त आत्मविश्वास दिखाई दिया।

जब मैं जालंधर गया, तो मैं एक RSS नेता के घर ठहरा।
उन्होंने कहा: “सर, क्या आप मेरे क्रिकेट बैट के कारखाने को देखना चाहेंगे?”

मैं वहाँ गया। उन्होंने कहा: “पूरा ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड अपना ऑर्डर मुझे देता है।”

1994 में उस ऑर्डर की सालाना कीमत लगभग करोड़ रुपये थी।

उन्होंने मुझे एक बढ़ई दिखाया और कहा: “देखिए, यह बढ़ई अपने मूड के अनुसार रोज़ 20, 30 या 40 बल्ले बना लेता है।”

और बाहर उसकी मारुति कार खड़ी थी।
उस समय मारुति कार होना बहुत बड़ी बात थी।

जालंधर में एक बढ़ई के पास मारुति कार देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया।

मैंने इन औद्योगिक क्षेत्रों में कड़ी मेहनत और समृद्धि देखी।

यह सब इसलिए संभव था क्योंकि यह समुदाय-आधारित (community-driven) व्यवस्था थी।

 

उन्होंने  कहा कि मैंने इस पूरी बात को एक सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया और अटल बिहारी वाजपेयी को बताया।

उसके बाद उनकी सरकार ने Industrial Cluster Policy बनाई।

श्री गुरूमूर्ति ने कहा कि RSS वास्तव में सामाजिक पूंजी की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है

अमेरिका और पश्चिमी देशों ने अपनी सामाजिक पूंजी को नष्ट कर दिया है।

सामाजिक पूंजी की नींव होती है:

  • परिवार
  • समुदाय
  • संबंध आधारित समाज

इसलिए भारत की सामाजिक पूंजी मजबूत है और RSS उसे और मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।

 

जब उनसे पूछा गया कि आज के युवाओं को RSS से क्या सीखना चाहिए?

उन्होंने कहा, हमारा जीवन केवल साधारण जीवन जीने के लिए नहीं है। सिर्फ पैसा कमाना और जीवन का आनंद लेना ही जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। यह सब होना चाहिए, लेकिन जीवन केवल इसी तक सीमित नहीं होना चाहिए।

RSS आपको एक ऊँचा दृष्टिकोण (higher vision) देता है—
कि केवल यह देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को हमारे जीवन-दर्शन की आवश्यकता है।

हमारे समाज में सिखाया जाता है:

  • माता-पिता का सम्मान
  • शिक्षकों का सम्मान
  • बड़ों का सम्मान
  • महिलाओं का सम्मान

उन्होंने कहा कि पश्चिमी देश महिलाओं को अधिकार (rights) देते हैं, जबकि भारतीय संस्कृति उन्हें सम्मान (respect) देती है।

कानून अधिकार दे सकता है, लेकिन सम्मान नहीं दे सकता।

सम्मान एक सभ्यता का गुण (civilizational virtue) है।

आप कानून बनाकर यह नहीं कह सकते कि हर कोई अपने माता-पिता का सम्मान करे या हर कोई अपने शिक्षकों का सम्मान करे।

ये गुण समाज में स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं।

 

उन्होंने कहा कि भारत में लगभग 6,68,000 गाँव और कस्बे हैं।

लेकिन पूरे देश में केवल लगभग 14,800 पुलिस स्टेशन हैं।

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार हत्या, डकैती, चोरी और बलात्कार जैसे अपराधों के मामले में भारत दुनिया के सबसे कम अपराध वाले देशों में शामिल है।

तो समाज को नियंत्रित कौन करता है?

समाज स्वयं।

यही सामाजिक पूंजी है।

यह एक सभ्यतागत गुण है जो हजारों वर्षों की निरंतरता से बना है।

इसलिए हमें अपने युवाओं को यह समझाना होगा कि ऐसे समाज की नकल अचानक नहीं की जा सकती।

हमें युवाओं, महिलाओं, राजनेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को यह समझाना होगा।

RSS का काम है लोगों की चेतना को ऊँचा उठाना और यह कार्य आगे भी चलता रहेगा।

 

कार्यक्रम में आए कई लोगों ने कहा कि यह उनके जीवन का एक ऐसा भाषण था जिससे उन्हें अपने राष्ट्र के बारे में, स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में, संघ के कार्यों के बारे में जो जानने व समझने को मिला वो कई पुस्तकों में भी नहीं मिल सकता था।

 

कार्यक्रम के आयोजन के लिए श्री गुरूमूर्ति ने श्री कमलेश श्रॉफ, श्री सुरेश, और श्री आशीष चौहान—को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने एक अलग और शायद अधिक महत्वपूर्ण विषय पर मुझे बोलने का मौका दिया। उन्होंने कहा कि इतने बड़े और विचारशील श्रोताओं को एकत्र करना आसान नहीं होता। वक्ता को बुलाना तो आसान है, लेकिन ऐसा श्रोता समूह इकट्ठा करना जो वक्ता को सच में प्रसन्न करे—यह आसान काम नहीं है। मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ कि आयोजकों ने ऐसा उत्कृष्ट श्रोता वर्ग यहाँ एकत्र किया है और मुझे इस मंच पर बोलने का अवसर मिला है।

 

कार्यक्रम के प्रारंभ में एएऩएमआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री के सुरेश ने स्वागत भाषण दिया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन संस्था के अल्टरनेटिव अध्यक्ष श्री कमलेश श्रॉफ ने किया।

 

श्री गुरूमूर्ति के भाषण का वीडियो लिंक- https://youtu.be/5DnY-AVHTZE

 Link of https://www.nseindia.com/

Link of https://anmi.in/

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