Homeसोशल मीडिया सेक्या विलियम जोन्स ने मनुस्मृति के मुूल स्वरूप में हेरफेर करवाया?

क्या विलियम जोन्स ने मनुस्मृति के मुूल स्वरूप में हेरफेर करवाया?

मनु स्मृति कब लिखी गई से ज्यादा बड़ा सवाल है कि इसमें संशोधन या प्रक्षेपण कब-कब हुआ? षड्यंत्रकारी अंग्रेजों के संपादन से, उनकी प्रेस से छपकर जो देश भर में बांटा गया, वही असली मनु स्मृति है, इसे कैसे सत्य मान लें? भारत में प्रेस प्रौद्योगिकी के विकास के साथ इस ग्रंथ मनु स्मृति को ही सबसे पहले ब्रिटिश प्रेस ने क्यों प्रकाशित किया?
आंख मूंद कर, दिमाग बंदकर सब कुछ मानने का समय अब जा चुका है। अब तो हर मुद्दे पर सवाल उठकर ही रहेगा। कुछ बड़े लोग कुछ ज्यादा बोलने के आदी हो गए हैं, उनसे निवेदन है कि अब सावधान हो जाएं, बिना शोध और अनुसंधान के कुछ। भी बोलने से बचें। क्योंकि बोलेंगे तो सवाल भी उठेंगे। हर विषय को सवालों की तीखी बौछार से गुजरना होगा। सवाल उठाने से रोकना गैर-अकादमिक है।
सबसे बड़ा सवाल है कि मनु स्मृति के कथित विभेदकारी सूत्रों के बारे में अंग्रेजों के भारत आगमन के पूर्व के भारतीय बौद्धिक मन में कोई प्रश्न कभी भी क्यों नहीं उठा? क्यों भगवान बुद्ध से लेकर कामंदक, बाणभट्ट से लेकर रैदासजी, कबीर आदि तक किसी ने मनु स्मृति पर नाम लेकर कटाक्ष क्यों नहीं किए? आखिर मनु स्मृति के विभेदकारी सूत्रों पर भारतीय बौद्धिक मन का ध्यान अंग्रेजों के प्रकाशन के बाद ही क्यों गया? अंग्रेजों के पहले पूरे भारतीय भक्ति साहित्य या किसी अन्य साहित्य में बौद्ध-जैन आदि में मनु के विरूद्ध एक पंक्ति नहीं लिखी है तो क्यों नहीं लिखी है? क्या बुद्ध ने इसलिए मनु स्मृति के विरूद्ध बोलना उचित नहीं माना कि वह उन्हीं के कुल में जन्में थे? ध्यान रहे कि बुद्ध इक्ष्वाकु कुल के थे और इक्ष्वाकु कुल के मूल आदिपुरुष मनु महाराज ही बताए गए हैं।
तो इतना आसान नहीं है किसी निष्कर्ष पर पहुंचना।
सदैव ध्यान में रखिए कि मनु स्मृति का पहला प्रकाशन (लेखन नहीं) ब्रिटिश राज में प्रिंटिंग प्रेस आने के बाद 1776 में विलियम जोन्स ने कराया था। इसके पीछे बंगाल (ब्रिटिश इंडिया) के पहले गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स का सीधा निर्देश था।
कहते हैं कि इसके प्रकाशन के पहले विलियम जोन्स की सलाह से 11 बड़े पंडितों की कमेटी बनाई गई। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल ने एक बड़े प्रोजेक्ट के अंतर्गत देश में तब तक मनु स्मृति की प्राप्त कथित पांडुलिपियों को जो भोजपत्र पर या ताड़पत्र पर अंकित थीं, उनका संकलन इस कमेटी के सुपुर्द किया। कहा गया कि न्याय को मानने वाली ब्रिटिश राज की कोर्ट हिंदू प्रजा को उसकी विधि से न्याय देगी, इसलिए हिंदुओं की विधि का संकलन, प्रकाशन आवश्यक है। मुस्लिम प्रजा को मुस्लिम विधि से न्याय दिया जाएगा। इसी घोषणा के द्वारा विभाजन के विषबीज को ब्रिटिश हुकूमत ने भारत में रोप दिया।
इस समिति में पंडित तर्कवाचस्पति, तर्क पंचानन, न्याय पंचानन, बाणेश्वर विद्यालंकार (बर्दवान) आदि अनेक शाही संरक्षण में अथवा सरकारी धन पर आश्रित बंगाली पंडित सम्मिलित थे। इस कमेटी में काशी की विद्वत्त पंरपरा या काशी की वैदिक पंरपरा में शिक्षित कोई ब्राह्मण सम्मिलित नहीं किया गया। क्यों ऐसा किया गया? क्योंकि काशी गणराज्य में कभी भी कोई अछूत जाति इतिहास के किसी काल में नहीं रही। आज तो होने का कोई प्रश्न ही नहीं।
अंग्रेजी राज की पहली संपादन समिति विलियम जोन्स की अध्यक्षता में गठित की गई। इसमें जो 11 विद्वान थे, सभी बंगला भाषी, संस्कृत परंपरा से लिए गए। विधि के जानकार थे। सभी अंग्रेजों द्वारा उपकृत जमींदारों, राजपरिवारों की परंपरा से शिक्षा सेवा में जुटे थे, अनेक नए सरकारी स्कूलों में पद प्रतिष्ठित हो गए थे।
इस कमेटी के सभी विद्वानों को बड़ी भारी स्कॉलरशिप या फेलोशिप दी गई। मुंहमांगी कीमत दी गई। विलियम जोन्स ने इनके सामने एक समग्र विधि संग्रह और विशेष रूप से मनुस्मृति के प्रकाशन की अवधारणा प्रस्तुत की।
इसके नोट्स रॉयल एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की जिल्दों में मिल सकते हैं, काफी सामग्री लंदन स्थित ऑफिस से मिल सकती है, जैसा कि मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने मुझे बताया था कि मेधातिथि, कुल्लुक भट्ट की टीका या उनके भाष्य के साथ की कथित मनु स्मृति की पांडुलिपि की अनेक जीर्ण प्रतियां समिति को दे दी गईं। उनकी जांच परम आवश्यक है कि क्या वह सचमुच मनु स्मृति थी? वह प्रतियां विलियम जोन्स को सबसे पहले मिली तो कहां से मिली? किसने दी? उन प्रतियों का मिलान क्या दूसरी पांडुलिपियों से किया गया? केरल, कश्मीर, कोलकाता, काशी, जयपुर, पुणे, भुवनेश्वर, कांची, बदरीनाथ मठ, केदारनाथ, द्वारिका, उज्जैन से कौन कौन सी पांडुलिपियां मिलीं और क्या उनका भी मिलान किया गया? इन प्राचीन स्थानों से यदि मनु स्मृति की पांडुलिपि नहीं मिली तो क्यों नहीं मिली, और यदि मिली हैं तो वह कहां कहां सुरक्षित और संरक्षित हैं, आदि अनेक सवालों का उत्तर आज की नई पीढ़ी मांग रही है।
इस आरोप के संदर्भ में अनेक तथ्य प्रकाश में हैं कि इस संपादन प्रक्रिया में कालांतर में मनचाहे तरीके से भोजपत्रों के जीर्ण पन्ने इधर-उधर से लाकर मनु स्मृति के नाम पर घुसा दिए गए। और इसके लिए भी भारी षड्यंत्र सोसायटी के अंग्रेज अफसरों ने पहले ही रच रखा था।
पहला प्रकाशन 1776 में ही हो गया। किंतु बाद में ध्यान में आया कि बहुत कुछ नया कूट रचित श्लोक तो इसमें डाला ही नहीं जा सका। तो पुनः 1886 में, 1894 में मनु स्मृति का नए सिरे से ब्रिटिश प्रेस ने प्रकाशन किया।
यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों ने इस बीच मुंह मांगी कीमत पर देश के प्रत्येक राजमहल के पुस्तकालयों को खंगाल डाला और जहां भी पांडुलिपियां थीं, उन्हें संरक्षण देने के नाम पर रॉयल एशियाटिक सोसायटी के दफ्तर में अनिवार्य रूप से जमा कराने का आदेश सभी जिलाधिकारियों, ऑर्कियालॉजी या प्राचीन इतिहास पर काम कर रहे अंग्रेज विद्वानों को जारी कर दिया।
यह भी कहा गया कि सभी का प्रकाशन सजिल्द सोसायटी के द्वारा करवाकर सभी को संरक्षित और सुरक्षित कर दिया जाएगा। देश के अनेक भोले विद्वानों ने, अंग्रेजी कृपा और धन से संरक्षित लोगों ने पांडुलिपि की प्रतियां अंग्रेजों के हवाल कर दीं।
इस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक प्रथम संपादक विलियम जोन्स जो कि उस समय की सर्वोच्च ब्रिटिश अदालत का जज था, उसने मनु स्मृति का प्रकाशन कराया। नियमानुसार वही इसका प्रथम लेखक और संपादक हुआ, इस मनु स्मृति की प्रथम प्रकाशक ब्रिटिश हुकूमत है।
इसमें जितनी मिलावटें की गईं, इनके विरोधाभासी श्लोक मनु स्मृति में मिलते हैं तो यही कारण है कि मिलावट की गई, जिसमें विलियम जोन्स ने संपादन किया।
मुझे मेरे गुरुदेव ने बताया था कि पूरे भारतीय वांग्मय में मनु स्मृति के भेदभाव परक श्लोक अन्य नीतिग्रंथों में या प्रमुख नीतिकारों के ध्यान में क्यों नहीं आए?
आखिर मनु स्मृति के श्लोकों पर महात्मा बुद्ध का ध्यान क्यों नहीं गया? क्यों कौटिल्य के ग्रंथ में भेदभाव का मनु स्मृति आधारित उल्लेख उद्धृत नहीं है? क्यों नीति मयूख में या कामंदकीय नीतिसार में जो पांचवीं सदी का नीति ग्रंथ है, या उसके बाद के नीतिकार सोमदेव सूरि के ग्रंथ में, वीर मित्रोदय में, मानसोल्लास में मनु स्मृति के भेदभावपरक श्लोक का कोई उल्लेख नहीं है?
क्योंकि अनेक नीति ग्रंथ अंग्रेजों का हाथ नहीं लग सके। कौटिल्य अर्थशास्त्र का प्रकाशन तो गणपति शास्त्री और शाम शास्त्री ने 1904-05 में किया। अंग्रेज खोजते रह गए लेकिन कौटिल्य अर्थशास्त्र उन्हें नहीं मिला।
वो उसे लेकर उसमें मिलावट कर पाते, उसके पहले ही मैसूर के महाराज ने उसे छाप दिया। अंग्रेज को काटो तो खून नहीं। इसलिए तब के अंग्रेज विद्वानों ने इस कौटिल्य अर्थशास्त्र को सच मानने से इंकार किया। ये तो बाद में एक पांडुलिपि बाली से मिल गई, कुछ मूल बौद्ध पांडुलिपियां श्रीलंका से मिलीं जिसमें कौटिल्य का जिक्र था, और इनका मूल से मिलान हुआ तब पता चला कि कौटिल्य अर्थशास्त्र सत्य है।
आज इन मौलिक प्रश्नों का उत्तर खोजा जाना अनिवार्य है कि
1-यदि मौजूदा मनु स्मृति सत्य है और इसमें मिलावट नहीं है तो इस तथ्य का स्पष्टीकरण दें कि आखिर बुद्ध, कौटिल्य, कामंदक, सोमदेवसूरि, बाण भट्ट, रामानुज, रामानंद, रैदास, कबीर आदि ने क्यों  कभी मनु स्मृति पर प्रश्न नहीं उठाए? इसके उलट सभी ने मनु का नाम जब भी लिया है, आदर से लिया है। रैदास जी की वाणी में भी मनु का नाम आदर से लिया गया है।
2-यदि मिलावट नहीं है तो रॉयल एशियाटिक सोसायटी का मौजूदा ऑफिस सन् 1776 में प्रकाशित मनु स्मृति की मूल कॉपी को सार्वजनिक क्यों नहीं करता? क्यों पहली प्रति आउट ऑफ प्रिंट बताकर फिर से 1786, 1794 में मनु स्मृति का प्रकाशन किया गया?
3-और जिन पांडुलिपियों के आधार पर मनु स्मृति प्रकाशित की गई, वह पांडुलिपियां आखिर रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने क्यों जला दीं?
4-जिन पांडुलिपियों को संरक्षित करने के नाम पर लिया गया था, वह पांडुलिपियां यदि आज भी सुरक्षित हैं तो कहां हैं, और उन्हें क्योें कभी विद्वानों के लिए दोबारा सार्वजनिक नहीं किया गया? केवल अंग्रेजों द्वारा संकलित प्रति ही क्यों देश भर में बांटी जाने लगी या वितरित कराई गई, फिर जलाने और उसे लेकर सरकारी संरक्षण में गुलामी के समय में बहस आदि का प्रबंध कराया जाने लगा।
जबकि देश जानता है कि परंपरा से किसी हिंदू घर में कभी मनु स्मृति रखने का ही विधान नहीं रहा।
3-यह प्रश्न इसलिए क्योेंकि मेरे गुरुदेव् प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने अनेक अवसरों पर रॉयल सोसायटी के दफ्तर जाकर मूल पांडुलिपियों को देखने और पढ़ने की इच्छा प्रकट की थी जिनके आधार पर आज की मनु स्मृति विलियम जोन्स के संपादन और स्वामित्व में प्रकाशित की गई थी। लेकिन कभी मूल पांडुलिपि की प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।
4-संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार Narendra Modi PMO India Gajendra Singh Shekhawat और आईसीएचआर-भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद और आईसीएसएसआर- भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद से मेरा विनम्र निवेदन है कि
-तत्काल अंग्रेजों के आगमन के पूर्व की मनु स्मृति की पांडुलिपि की खोज के लिए देश भर के समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना चाहिए।
-जिस पांडुलिपि के आधार पर संपादक विलियम जोन्स ने मनु स्मृति का पहला प्रकाशन कराया, उन पांडुलिपियों का पता लगाकर उन्हें सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
-इस शोध आधारित अध्ययन के लिए वरिष्ठ विद्वानों की देख-रेख में समिति बनाकर इस कार्य के लिए सुदीर्घ प्रोजेक्ट स्वीकृत किए जाने चाहिए।
-शोध पूर्वक इनमें देखा जाना चाहिए कि ये पांडुलिपि मनु स्मृति की हैं भी या नहीं है? या बनावटी और जाली, फर्जी पांडुलिपियों के जरिए भारत में बंटवारे की राजनीति को ही पुस्तक के रूप में प्रथम प्रकाशित किया गया।
आईसीएचआर और आईसीएसएसआर में बैठे हुए बड़े विद्वान प्रोफेसरों से मेरा आग्रह है कि यदि उन्हें कठिनाई है तो मैं स्वयं इस कार्य में समय देने को तैयार हूं। और भी लोग हो सकते हैं जिनके संपर्क में विद्वान प्रोफेसरों की बड़ी टोली रहती है। उनमें से भी नाम लिए जा सकते हैं, क्योंकि यह राष्ट्रीय महत्व का कार्य है। जो इस कार्य को बड़े पवित्र रूप से, बिना किसी पूर्वाग्रह के करने को तैयार हैं और सारी शोध प्रक्रिया को पारदर्शी ढंग से करना जानते हैं, उन्हें इस कार्य में शीघ्र लगाया जाना चाहिए।
मनु स्मृति की वह मूल पांडुलिपि खोजने का यही सही समय है। वह पांडुलिपि जो कम से कम किसी इंग्लिश विद्वान के हाथ न लगी हो और कम से कम 300-400 साल पुरानी हो, तभी दूध का दूध पानी का पानी हो सकता है।
निवेदन है कि जब तक यह शोध कार्य समाप्त न हो जाए तब तक मनु के नाम से किसी भी पुस्तक को गलत तरीके से उद्धृत करने पर रोक लगाई जानी चाहिए। यदि ऐसा संभव नहीं है तो जो पुस्तक अंग्रेजी राज में षड्यंत्रपूर्वक संपादित, प्रकाशित है, उसे मनु स्मृति का नाम देने की बजाए विलियम जोन्स द्वारा संपादित कथित मनु स्मृति ही कहा और लिखा जाना चाहिए।
मेरे गुरुदेव प्रो. कमलेश  दत्त त्रिपाठी का निष्कर्ष था कि वर्तमान मनु स्मृति में बहुत से प्रक्षिप्त अंश संपादक विलियम जोन्स और वॉरेन हेस्टिंग्स के षडयंत्र का परिणाम है। रॉयल एशियाटिक सोसायटी ने अनेक पौराणिक ग्रंथ की पांडुलिपि जुटाकर उसमें गड़बड़ी पैदा की थी।
(लेखक शिक्षाशास्त्री व पत्रकार हैं और ज़ी न्यूज़ आजतक न्यूज़ 24 और लाईव इंडिया में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं)
साभार-https://www.facebook.com/share/1AQ52iBqPT/   से
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