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1915 में प्रकाशित प्राचीन भारत के वैज्ञानिक रहस्यों को सामने लानी वाली एक दुर्लभ पुस्तक

जब भी कभी भारतीय विज्ञान की चर्चा होती है, कुछेक संस्कृत ग्रंथों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उदाहरण के लिए वैशेषिक और सांख्य दर्शनों को विज्ञान विषय का प्रतिपादक बतलाया जाता है। परंतु आज का विज्ञान का कोई विद्यार्थी जब उन ग्रंथों को पढ़ता है तो उसे उनमें विज्ञान के स्फुट चिह्न ही मिलते हैं, व्यवस्थित विज्ञान नजर नहीं आता।

ऐसे में उन्हें लगता है कि ये ग्रंथ भले ही थोड़ा बहुत विज्ञान की जानकारी देते हों, परंतु उसके आधार पर विज्ञान की व्यवस्थित शिक्षा और तकनीक का विकास संभव नहीं है।

ऐसे में प्रख्यात विद्वान ब्रजेंद्रनाथ शील की पुस्तक Positive Sciences of the Hindus एक मार्गदर्शक पुस्तक साबित होती है।


आचार्य ब्रजेंद्रनाथ शील
बीसवीं शताब्दी के उद्भट भारतीय विद्वानों में से एक थे। वर्ष 1864 में कोलकाता में जन्मे श्री ब्रजेंद्रनाथ का बचपन काफी कठिनाइयों से भरा रहा। पहले माता, फिर पिता और अंत में अभिभावक रहे मामा के देहांत के कारण उनका प्रारंभिक जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा।

परंतु इसके बावजूद बड़े भाई के संरक्षण में उन्होंने पढ़ाई की। बचपन से ही वे गणित में काफी तेज थे। उनकी स्मरण शक्ति अद्भुत थी, बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण और विश्लेषण क्षमता अपूर्व।

उनके साथ स्वामी विवेकानंद ने भी पढ़ाई की थी। ब्रजेंद्रनाथ ने प्रथम श्रेणी से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की।

उनके अध्ययनकाल की एक रोचक घटना इस प्रकार है—उनके प्राध्यापक चाहते थे कि वे दर्शन से एम.ए. करें, परंतु उनके गणित शिक्षक उन्हें गणित से एम.ए. कराना चाहते थे।

इस बहस के दौरान स्वयं ब्रजेंद्रनाथ जीवविज्ञान और नृतत्वविज्ञान के अध्ययन में व्यस्त थे। अंत में उन्होंने दर्शन से एम.ए. किया।

केवल 20 वर्ष की आयु में वे अंग्रेजी के प्रोफेसर बने। बाद में वे नागपुर के एक कॉलेज के प्रिंसिपल हो गए। वर्ष 1912 तक वे विभिन्न कॉलेजों में प्राध्यापक रहे। वे मैसूर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे।

उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में भाग लिया और शोधपत्र पढ़े। वे हिब्रू, ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन सहित अनेक यूरोपीय भाषाओं के विद्वान थे।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Positive Sciences of the Hindus वर्ष 1915 में प्रकाशित हुई थी।

उन्होंने प्रसिद्ध रसायनशास्त्री प्रफुल्लचंद्र राय के साथ मिलकर भारतीय विज्ञान पर काफी काम किया था।

इन दोनों ही विद्वानों की प्रेरणा से भारत में विज्ञान के विकास पर काम करने के लिए बड़ी संख्या में लोगों को प्रेरित किया गया।

उनकी प्रेरणा से ही इंडियन नेशनल साइंस एकेडेमी की स्थापना की गई थी।

इस पुस्तक की भूमिका में ही ब्रजेंद्रनाथ शील ने लिखा है कि इस पुस्तक को लिखने का उनका सीधा उद्देश्य विशेष विज्ञान के इतिहासकारों को कुछ नई सामग्री प्रस्तुत करना है ताकि उनकी खोज का मार्ग और अधिक विस्तृत हो सके।

आचार्य शील ने यह काम बड़ी ही कुशलतापूर्वक संपादित किया है।

यहां ध्यान देने की बात यह है कि यही वह कालखंड था जब यूरोपीय विद्वान यह साबित करने में जुटे थे कि यूरोप स्थित ग्रीस ही दुनिया के सारे विज्ञान का मूल है।

ऐसे में ब्रजेंद्रनाथ शील का यह प्रयास अनूठा और मील का पत्थर है।

पुस्तक के अध्यायों को देखें तो इसकी विशालता का अनुभव होता है।

इस एक पुस्तक में उन्होंने विज्ञान की लगभग सभी धाराओं पर भारतीय ज्ञान-संदर्भों को प्रस्तुत किया है—गतिकी (मैकेनिक्स), ध्वनि-विज्ञान, जीवविज्ञान, पौधशास्त्र जैसे विषयों का भारतीय ग्रंथों के आधार पर अत्यंत प्रामाणिक और वैज्ञानिक विवरण इस पुस्तक में है।

आमतौर पर संस्कृत की भाषा को आधुनिक विज्ञान की भाषा में प्रस्तुत करना काफी कठिन प्रतीत होता है।

परंतु आचार्य ब्रजेंद्रनाथ ने इसे काफी सरल कर दिया है।

उदाहरण के लिए गतिकी के अध्याय में वैशेषिक के कर्म को उन्होंने कार्य और गति से व्याख्यायित किया है और इस आधार पर गतिकी के नियमों का निष्पादन किया है।

इस प्रकार आचार्य ब्रजेंद्रनाथ शील की यह पुस्तक भारतीय विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए काफी उपयोगी है।

भारतीय दर्शन के विद्यार्थियों के लिए भी यह पुस्तक काफी काम की साबित हो सकती है क्योंकि यह दर्शन के वैज्ञानिक पक्ष को बड़ी कुशलता से सामने रखती है।

यदि कभी भविष्य में भारतीय भौतिकी की पाठ्यपुस्तक कोई तैयार करे तो उसमें यह पुस्तक आधारभूत सामग्री का काम करेगी।

यह पुस्तक www.archive.org से डाउनलोड की जा सकती है।

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