चित्रकला की दुनिया में बीते 20 सालों में एक नाम कह लीजिए तो हौले कदमों से चहलकदमी कर रहा है, कह लीजिए तो उसका डंका बोल रहा है। हौले कदमों से इसलिए कि वे बड़ी शांति से अपना काम करते हैं, काम से काम रखते हैं और डंका यों कि इन सालों में देश की ऐसी कोई प्रतिष्ठित रंग कार्यशाला या चित्रकला प्रदर्शनी नहीं है जिसमें उनकी दस्तक न हो, जहाँगीर आर्ट गैलेरी से लेकर स्लो आर्ट गैलरी, न्यूयॉर्क (अमेरिका) तक ऐसी कोई आर्ट गैलेरी या कला दीर्घा नहीं है जहाँ उनके चित्र प्रदर्शित न हुए हों।

उनकी इन्हीं उपलब्धियों के लिए बीते माह डॉ. विजय ढोरे को ललित कला अकादमी, नई दिल्ली तथा संस्कृति मंत्रालय की ओर से इस साल का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। बैतूल जन्मस्थली होने से गोदना कला का ज्ञान उन्हें विरासत में मिला। गोदना कला का सम्प्रेषण जैसी कई किताबें उनके नाम दर्ज हैं। मध्यप्रदेश के साथ मध्यप्रदेश से सटे नागपुर के शासकीय कला एवं डिज़ाइन महाविद्यालय से वे ललित कला में स्नातक हैं।
हिंदी भाषी क्षेत्र में जीवन बिताने से उनकी हिंदी भाषा पर पकड़ है, मराठी उनकी मातृभाषा है। भोपाल के शासकीय हमीदिया कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय से ललित कला में स्नातकोत्तर की डिग्री लेने के बाद डॉ. भीम राव अंबेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से पीएचडी प्राप्त की है। स्पेन और यूरोप से उन्हें छात्रवृत्ति मिली है। उनका हैदराबाद में स्टूडियो है। विभिन्न भाषाओं में वे समरसता से संचार करते हुए भी कहते हैं कि मैं भाषा का नहीं रंगों का राही हूँ।

वे इन दिनों शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी संस्थान में कार्यरत हैं। उनसे बात करने पर ज्ञात होता है कि नामवर सिंह, दूधनाथ सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, राजेश जोशी जाने कितने साहित्यकारों की संजीदा बातों का उनके पास खजाना है। उन्होंने हिंदी के बहुतेरे साहित्यकारों को पढ़ा-गढ़ा है। पत्नी के गुज़र जाने के बाद बेटे को अकेले बड़ा करते हुए किताबें ही उनका सहारा बनी थीं। पत्नी के जल्दी चले जाने का आघात उनको आज भी भीतर तक गहरा सालता है पर वे इसे इस तरह लेते हैं कि गंगोत्री से आने वाले थपेड़े ही किसी शिला को शिवलिंग बना देते हैं। जो कुम्हार मिट्टी को रौंदता है, वही उसे आकार भी देता है। वे कहते हैं कि कला के लिए एकांत होना बहुत ज़रूरी है और इन सालों में एकांत ही उनका साथी बना। बस वे कूची को अपने हाथों में थामे रचते चले गए।
अकेले घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी सँभालते हुए, वे थके नहीं, सीखते और सीजते गये। वे कहते हैं कि मूंगफली के दानों का प्रयोग हम भोजन बनाते हुए बहुधा करते हैं। वह दाना बताता है कि उस एक बीज में कितनी मूंगफलियों के उगने की संभावना है। बीज श्रृंखला से उनके चित्र इन विचारों को मूर्त रूप देते हैं। वैसे वे अमूर्त चित्रकार हैं। उनके महत्वपूर्ण अमूर्त चित्रों के संग्रह में ज़्यादातर मिट्टी के रंगों का अद्भुत मिश्रण दिखता है जिनके विषय ज़मीन से जुड़े हैं। वे महानगरों में रहने वाले नीरस ज़िंदगी में जीने वालों की ज़रूरतों को समझते हैं, इसलिए उनकी कृतियाँ राहत का स्रोत बन जाती हैं।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं और सामाजिक व सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करती हैं)

