Homeदुनिया मेरे आगेआजादी के बाद अयोध्या की राजशाही

आजादी के बाद अयोध्या की राजशाही

विमला देवी “बच्ची साहिबा”अयोध्या की राजमाता

राजा जगदम्बिका प्रताप नारायण सिंह को 12 फरवरी, 1909 को अयोध्या का राजा घोषित किया गया था, और उन्होंने 1955 में उन्मूलन अधिनियम लागू होने तक अयोध्या राज पर शासन किया था। उनका शासन काल 1909 से 1955 तक रहा। राजा जगदंबिका प्रताप की एक ही ही बेटी थीं विमला। उनके पुत्र नहीं था। विमला की शादी डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र से हुई थी। बाद में जगदंबिका प्रताप सिंह ने विमला देवी बच्ची साहिबा को ही अपना उत्तराधिकारी बनाया।अपने दामाद डॉ रमेंद्र मोहन मिश्र बच्चा साहब को गोद लिया था। जिन्होंने स्वतंत्र भारत में अयोध्या राज की कमान संभाली और विधान परिषद के लिए चुने गए। दामाद जी का परिवार भी ब्राम्हण रहा। गोद लेने के बाद ही इस राजपरिवार के सदस्यों के नाम के आगे मिश्रा उपनाम जुड़ा।

 

विमलेंद्र मिश्र ‘पप्पू भइया’ राजसदन के मुखिया

महारानी विमला देवी बच्ची साहिबा के दो पुत्र विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राजा साहब और शैलेन्द्र मोहन प्रताप मिश्र हुए, जिसमें विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के बड़े होने के कारण उन्हें इस राजवंश का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला और उन्हें राजा अयोध्या के रूप में जाना जाने लगा। वे अयोध्या के राज परिवार के मुखिया के रूप में उभरे।

 

राजकुमारी विमला देवी एवं डॉ. रमेन्द्र मोहन मिश्र की तीसरी और चौथी संतान के बारे में जानकारी उपलब्ध नहीं है। पाँचवीं सन्तान के रूप में डॉ. अपर्णा मिश्र का 12 सितम्बर, 1970 को अयोध्या में जन्म हुआ। हिन्दी साहित्य में डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के उपरान्त उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से ‘हिन्दी रीतिकाव्य का विकास और महाराजा मानसिंह ‘द्विजदेव’ की काव्य-साधना’ विषय पर शोध उपाधि प्राप्त की। आजकल कामता प्रसाद सुन्दरलाल साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय, अयोध्या में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर कार्यरत हैं।

 

 

पूर्व उत्तराधिकारी राजा विमलेंद्र मोहन मिश्रा जी को श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट का भारत सरकार द्वारा ट्रस्टी और रिसीवर नियुक्त किया गया है। इन्होने इसके लिए पूर्व में श्री रामजन्म भूमि निर्माण ट्रस्ट को दस एकड़ जमीन दान दी।

 

विमलेंद्र अयोध्या राजवंश में कई पीड़ियों के बाद जन्म लेने वाले पुरुष उत्तराधिकारी थे। उनसे पहले तक गोद लिए हुए बेटों को ही राजवंश की विरासत सौंपी जाती रही। यही कारण था कि विमलेंद्र का बचपन कड़ी सुरक्षा में गुजरा। महारानी विमला देवी ने उन्हें बाहर पढ़ाने नहीं भेजा, इसकी बजाए स्थानीय स्कूल में ही उनकी शिक्षा हुई। 14 वर्ष की उम्र तक उन्हें अपनी हम उम्र लड़के साथ खेलने तक की इजाजत नहीं थी।

 

शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा योगदान

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए. उन्होंने कई डिग्री कॉलेज और इंटर कॉलेजों की अध्यक्षता की और शिक्षा कोबढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास किए. महाराजा इंटर कॉलेज, महाराजा पब्लिक स्कूल और साकेत महा विद्यालय जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में उनका विशेष योगदान रहा. उन्होंने अयोध्या में शिक्षा की अलख जगाई और विद्यार्थियों को बेहतर भविष्य देने के लिए महत्व पूर्ण पहल की।

 

चुनावी राजनीति में असफल रहे

वैसे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने 2009 के लोकसभा चुनाव में फैजाबाद संसदीय सीट से बसपा के टिकट पर भाग्य आजमाया था। लेकिन वह यहां जीत हासिल नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से दूरी बना ली। बताया जाता है कि महारानी विमला देवी विमलेंद्र के बसपा से चुनाव लड़ने के निर्णय के खिलाफ थीं।हालांकि उन्हें जीत नहीं मिली और कांग्रेस प्रत्याशी निर्मल खत्री ने हराया। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से दूरी बना ली। प्राचीन दौर में अयोध्या का ये राजपरिवार कांग्रेस पार्टी का करीबी माना जाता था। विमलेंद्र प्रताप मिश्र डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित रहे हैं. वह उत्तर प्रदेश की हेरिटेज योजना की कार्यकारिणी के सदस्य चुने जा चुके थे।

 

राम मंदिर ट्रस्ट के अहम सदस्य

अयोध्या राजा विमल मोहन प्रताप मिश्रा आरंभ से ही राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे। रामघाट स्थित न्यास कार्यशाला में राम मंदिर के लिए पत्थर की तराशी उन्हीं की जमीन पर हुई। जिसे बाद में उन्होंने राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दे दिया है।

 

1992 में विवादित ढांचा टूटने के बाद उन्होंने रामलला के विराजमान होने के लिए चांदी का सिंहासन दिया। इसके बाद 5 फरवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ तो राजा विमलेंद्र मोहन को इसका वरिष्ठ सदस्य बनाया गया। 5 फरवरी 2020 को भूमि पूजन के दौरान राम लला सहित चारों भाइयों के विराजमान होने के लिए उन्होंने पुनः भव्य चांदी का सिंहासन राम मंदिर ट्रस्ट को दान में दिया। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय उन्होंने अयोध्या के वरिष्ठ संतो के साथ अयोध्या की विवाद के समाधान का प्रयास किया।

 

राममंदिर आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका

जब राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया, उसके बाद ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी की ओर से सबसे पहले जिस वरिष्ठ सदस्य को चुना गया, वे थे राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र। तब तक श्रीराम जन्मभूमि परिसर के रिसीवर की जिम्मेदारी अयोध्या के कमिश्नर के पास थी, लेकिन जैसे ही ट्रस्ट अस्तित्व में आया, पहला चार्ज औपचारिक रूप से मिश्र को सौंपा गया। इससे पहले यह प्रभार अयोध्या केआयुक्त के पास था।

 

धार्मिक और सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित जीवन

उनका जीवन धार्मिक और सामाजिक कार्यों को समर्पित रहा। राजा विमलेन्द्र प्रताप मोहन मिश्र को लोग प्यारसे ‘पप्पू भैया जी’ भी कहते थे। लोग उन्हें अयोध्या का राजा कहकर पुकारने लगे। वहअयोध्या रामायण मेला संरक्षक समिति के सदस्य भी थे। वैसे विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र राम मंदिर ट्रस्ट के सदस्य अकेले ऐसे सदस्य रहे, जिन्हें पक्ष और विपक्ष सभी नेताओं से सम्मान मिलता था। परिवार भले ही राम जन्मभूमि के करीब था लेकिन वह तटस्थ ही रहते थे। यही कारण था कि राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में दोनों ही पक्षों से उन्हें सम्मान मिलता था। राम मंदिर आंदोलन के दौरान जब विवादित ढांचा गिरा तब विमलेंद्र प्रताप मिश्र के घर से ही रामलला की प्रतिमा स्थल पर पहुंचाई गई। ये प्रतिमा उनके घर में बने अस्थायी मंदिर में विराजमान थी।

 

जनता के बीच लोकप्रिय व्यक्तित्व

राजा विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र हमेशा अयोध्या की जनता के सुख-दुख में शामिल रहते थे. राज परिवार के दरवाजे आम जनता के लिए हमेशा खुले रहते थे. जो भी व्यक्ति राजसदन आता, उसे सम्मानपूर्वक मुलाकात का अवसर दिया जाता है।

 

विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र का निधन

अयोध्या के राजा 75 वर्षीय स्मृति शेष श्री विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र ने अयोध्या में स्थित राज सदन में अपनी अंतिम सांस ली। हाल ही में उनके रेट की हड्डी का ऑपरेशन हुआ था और लखनऊ में इसे चेकअप भी कराया गया था जो सामान्य रहा फिर भी रात के 11:00 बजे उनका बीपी को हुआ और उन्हें श्री राम हॉस्पिटल अयोध्या दिखाया गया जहां उन्हें मृतक घोषित कर दिया गया। उनका निधन 23 अगस्त 2025 की देर रात हुआ था। उनका अंतिम संस्कार 24 अगस्त 2025 को सरयू तट पर स्थित बैकुंठ धाम में किया गया। उनके ज्येष्ठ पुत्र यतींद्र मिश्र ने उन्हें मुखाग्नि दी थी।

 

अयोध्या के राजा विमलेंद्र प्रताप की अंतिम यात्रा स्थानीय राज सदन से निकली थी। अयोध्या वासियों ने उन्हें गमगीन माहौल में अंतिम विदाई दी थी। अंतिम यात्रा में जिले के प्रभारी मंत्री सूर्य प्रताप शाही, पूर्व प्रदेश सचिव अवनीश अवस्थी, अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद , राम जन्मभूमि ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, जिलाधिकारी निखिल टीकाराम फुंडे समेत कई भाजपा नेता, संत-महंत व अयोध्यावासी सम्मिलित हुए। उनके निधन पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दुख जताया था।

लेखक परिचय:-


(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

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