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बंकिम को क्या मालूम था कि उनके गीत को ही आधा कर दिया जाएगा…

अब बताइये। यदि हम वंदेमातरम् का वही टुकड़ा राष्ट्रगान की तरह रखें जिसमें सिर्फ प्रकृति की सुषमा का वर्णन है, जिसमें सुमधुरभाषिणीं, सुहासिनीं भारतीय पहचान का वर्णन है तो क्या वह भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि और आत्म-छवि एक ऐसे राष्ट्र की नहीं बनाता जो एक सॉफ्ट स्टेट है, जो दुनिया भर की धर्मांतरणोन्मादी शक्तियों के लिए एक खुला गोचर है, जहाँ आतंकवादी अपनी गतिविधियों के लिए स्वतंत्र हैं क्योंकि उन्हें संरक्षण देने वाले वही नहीं हैं जो उन्हें आश्रय देते हैं बल्कि वे भी हैं जो अभी अपने भाषणों में उनकी बी टीम की तरह काम करते हैं। दुर्गा के 10 हथियार 10 दिशाओं में भारती की संप्रभुता का गान थे। सैम मानेकशा ने क्यों कहा था कि A nation that sings only half its war cry will lose half its wars.” दुर्गा का संघर्ष किसी समकालीन समुदाय के विरुद्ध नहीं था, असुरों के विरुद्ध था। तब कोई समुदाय उनके नाम से बिदकेगा क्यों? इंडोनेशिया में एक दुर्गा मस्जिद है। क्या वहाँ के बहुसंख्यक समुदाय ने उस मस्जिद जाना बंद कर दिया? मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 में इसे मातृभूमि की पुकार की तरह बताया था जो यह है भी। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में पूरा गीत सड़कों पर गूँजा। नज़रुल इस्लाम ने गाया।
मूल वंदेमातरम् के शेष हिस्से की आवश्यकता आज इसलिए है कि भारत की न कोई विश्व-छवि और न कोई आत्म-छवि खंडित तरह से बने। जब आजाद हिंद फौज ने जापानी हवाओं में इसे गाया था तो पूरे पाँच छंद एक साथ गाये थे और उस फौज में बहुत सी आस्थाओं के सैनिक थे।
इजरायल का हतिक्वा (1878) गान में जिओन और यहूदी आत्मा है। फिलिस्तीनी नफरत करते हैं। पर क्या उसे इजरायल ने अपने यहाँ की एक आबादी को खुश करने के लिए काटा? नहीं। परिणाम? आयरन डोम, मोसाद, टफ राष्ट्र के रूप में वैश्विक छवि। इज़राइल के अधिकारियों और न्यायालयों ने भी यही टेक रखी कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का गीत है, यह नहीं बदला जा सकता। तुर्की में एर्दोआन ने ओटोमन मार्च लौटाया—कोई धर्मनिरपेक्ष विद्रोह वहाँ तमाम आधुनिकीकरण के बाद भी नहीं हुआ। भारत में हमने गोली चलने से पहले ही अपना गान काट दिया। पूर्ण गीत अलगाव नहीं पैदा करता यदि अलगाव पहले से है—अपनी पहचान छोड़ कर आप किसी की नज़रों में सम्मान के पात्र नहीं होते।
लिथुआनिया के राष्ट्रगीत Tautiška giesmė की भी काँट छाँट करने की माँग कुछ वर्ग वर्षों से कर रहे हैं। लिथुआनिया ने कहा कि ऐसे Edits उनकी दृष्टि में violation of national integrity होंगे जो अस्वीकार्य है।
2018 में equal opportunity commissioner ने जर्मनी के राष्ट्रगीत में आये Fatherland” को “homeland” शब्द से और “brotherly” को “courageously” शब्द से प्रतिस्थापित करने का सुझाव दिया पर चांसलर एंजेला मार्केल ने मना कर दिया और राष्ट्रपति फ्रैंकवाल्टर स्टीनमियर ने भी मना कर दिया।
प्रतीकों पर समझौता संप्रभुता का समर्पण होता है और आधा गान वैश्विक हँसी का पात्र बनाता है।BBC डॉक्यूमेंट्री (2025) का शीर्षक “India: The Reluctant Giant” इसीलिए था क्योंकि हम खुद को सेंसर करते हैं। उनका संदेश यह है कि यह देश अपनी जड़ों से कट चुका है।
मैं 1937 में लिये गये निर्णय की आलोचना नहीं कर रहा। जिस निर्णय में देश के तीन असाधारण नेता शामिल हों, उस पर कुछ कहने लायक ऊँचाई अपनी है भी नहीं, न उस दौर का तापमान इतने वर्षों बाद सुरक्षित दूरी पर बैठे हुए हम लोग आँक सकते हैं। मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूँ कि 1957 में भारतीय कापीराइट एक्ट में संशोधन हुआ और उसमें कवि या लेखक के मृत्यूपरांत भी उसके अपनी रचना पर नैतिक अधिकार का बने रहना माना गया और वह अधिकार उसके विधिक उत्तराधिकारी पर अंतरित होना स्वीकार किया गया। वह तो शुक्र मानिए कि बंकिम चंद्र जी के उदार वंशजों ने इस संक्षिप्तीकरण पर अभी तक कोई आपत्ति नहीं की अन्यथा आप किसी महान रचना के साथ ऐसी स्वच्छंदता दिखाने का क्षेत्राधिकार ही नहीं रखते थे।
पर क्या वह सिर्फ एक ऐसी रचना का अंग-भंग था जिसने बंग-भंग तक रोक दिया था जब उसे अक्षुण्ण रूप से गाया जाता था? अथवा उसमें यदि मूर्तिपूजा दिखती थी और आपने उस मूर्तिपूजा के तर्क को स्वीकार लिया तो क्या यह उस अमर गीत में वर्णित मूर्ति का भंजन नहीं हुआ? कि मध्यकाल में मूर्तियाँ पत्थर की होती थीं तो तोड़ दी जाती थीं तब हमने आधुनिक युग में इस शब्द-मूर्ति को तोड़ना उचित समझा कि कुछ लोग अकॉमॉडेट हो सकें?
और वह विभाजन दिखता है क्योंकि भारत सिर्फ प्रकृति ही नहीं है, जनसंख्या भी है। बंकिम को प्रकृति के तत्काल बाद वे भी याद आये थे। कोई भी राष्ट्र बनता तो अपनी आबादी से ही है। प्रकृति ईश्वर की निर्मिति है। पर संस्कृति तो मनुष्यों से बनती है। बंकिम प्रकृति और संस्कृति दोनों से समन्वित भारत की बात कर रहे थे—
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले कोटि-कोटि-भुजैरधृत-खरखरवाले।
भारत की यह जनसंख्या जो भारत का सबसे बड़ा dividend सिद्ध होती, इसी को अंग्रेजी राज ने कभी अकालों और कभी महामारियों में करोड़ों की संख्या में मरवाया। उनका इरादा इस जनसंख्या के साथ भी वही करने का था जो उन्होंने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की स्थानीय आबादी के साथ किया। उनका उत्पाटन और उन्मूलन। पर वंदे मातरम् के कवि ने इस आबादी को याद कराया कि तुम नि:शक्त नहीं हो- अबला केन मा एते बल। शक्ति की शब्द-मूर्ति बंकिम ने अकारण ही नहीं गढ़ी थी। Baz Luhrmann ने कहा था—A life lived in fear is a life half lived. कि भय में बिताया जीवन आधा जिया जीवन है।
बंकिम को क्या मालूम था कि उनके गीत को ही आधा कर दिया जाएगा।

 

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