Homeभुले बिसरे लोगभीष्म साहनी का भूला-बिसरा रावलपिंडी

भीष्म साहनी का भूला-बिसरा रावलपिंडी

(भीष्म साहनी जैसे लेखकों और बुध्दिजीवियों ने विभाजन की पीड़ा झेलकर भी विभाजनकारी मानसिकता का महिमामंडन किया, लेकिन उनकी तथाकथित प्रगतिशील सोच के विपरीत हिंदुओं को क्या कुछ भुगतना पड़ रहा है, इस पर सब मौन हैं)

आज भीष्म की आत्मकथा “आज के अतीत’ के पन्ने फड़फड़ा रहे हैं। अखंड भारत की एक मनोहारी झलक आँखों में उभर रही है। वे एक ऐसे समाज का हिस्सा थे, जिनके घरों में वेद-वेदांग रखने और उन्हें कंठस्थ करने की परंपरा थी। संत मोतीराम के बारहमासे गूंजते थे, जिनमें नश्वर जीवन से सीख लेने के अचूक संदेश थे। आर्य समाज के साप्ताहिक सत्संगों की धूम, गुरुद्वारों की चहलपहल से भरा रावलपिंडी और साधु-संन्यासियों की आवक-जावक से भरे आसपास के गाँव-कस्बे…

भीष्म साहनी का बचपन रावलपिंडी में बीता। 1915 में वे जन्मे थे। पेशावर में पठानों की लूटपाट से प्रभावित कारोबारी हरबंसलाल साहनी का परिवार रावलपिंडी रहने आ गया था। वे बलराज साहनी के छोटे भाई थे। दोनों ही बाद में अपने-अपने क्षेत्र में विख्यात हुए। भीष्म लेखन में, बलराज सिनेमा में। 2003 में 87 साल की उम्र में भीष्म का दिल्ली में देहांत हो गया।

भीष्म और बलराज को एक गुरुकुल में भेजा गया। बलराज ने “लघुकौमुदी’ के सूत्र कंठस्थ किए। भीष्म ने ऋजुपाठ के। यज्ञोपवीत संस्कार में दोनों के सिर घुटाए गए। चोटी निकली। पीली धोती पहनाई गई। कोई कहते हुए सुना गया कि प्राचीन काल में ऐसे ही ब्रह्मचारी आश्रमों में रहते होंगे। तीन धागों वाले यज्ञोपवीत धारण कर दोनों भाई भिक्षापात्र लेकर निकले। बाद में दोनों को एक आर्य स्कूल में पढ़ने भेज दिया गया। बड़ा भाई चौथी में, छोटा पहली में। रावलपिंडी में।

आर्य समाज के वार्षिक उत्सव के मेले। पंडित रामचंद्र शास्त्री की रामकथा। भजन मंडलियाँ। बीच कथा में पंडित बुद्धदेव के भजन-गीत। आर्य समाज के अर्द्ध शताब्दी प्रसंग पर साहनी परिवार का श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा आकर स्वामी दयानंद के गुरु स्वामी वृजानंद का टूटाफूटा घर देखना। कोई लाला मय्यादास, जिन्होंने स्वामी दयानंद के दर्शन किए थे जब वे रावलपिंडी पधारे थे। काली कम्बली वाले स्वामीजी के आर्यसमाज मंदिर में आने से रावलपिंडी में बिखरी रौनक। बोहड़वाले बाजार में सहगलों की सराय में सनातन धर्मसभा के स्वामी प्रकाशानंद और आर्य समाज के पंडित लोकनाथ शास्त्री के शास्त्रार्थ। मूर्तिपूजा के औचित्य को लेकर तनातनी। स्कूल में श्रवणकुमार की पौराणिक कथा पर नाटक के मंचन।

श्रीनगर से बुआ की बेटियाँ रावलपिंडी की गली में आई हैं। वे कार्तिक पूर्णिमा पर खिलने वाले केसर के बारे में बता रही हैं, जिसे कश्मीर में शगूफा कहते हैं। वे संस्कृत के श्लोक गा रही हैं-“त्वमेव माता च पिता त्वमेव।’ भीष्म को संध्यामंत्र और हवन के मंत्र याद आ रहे हैं। दोनों ही परिवारों में हवन-संध्या नियमित है। किसने “प्रेमाश्रम’ पढ़ी है, किसने “राजपूत जीवन संध्या’ यह बहस हो रही है।

दिल्ली में बैठे भीष्म साहनी की आँखों में रावलपिंडी परछाईं सा तैर रहा है-“बड़ा निराला शहर था रावलपिंडी। छोटा सा शहर। तीन-चार बड़े बाजार। बाकी गलियाँ ही गलियाँ। आसपास दूर गाँव ही गाँव। गहरी रात में दूर से आती किसी के बंसी बजाने की आवाज। हॉकी के खिलाड़ियों की पिंडी टाइगर्स। तांगें पर अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर के यहाँ फर्शी सलामी के लिए जाते ऑनरेरी मजिस्ट्रेट दीवान फकीरचंद।’

गुरु पर्व पर सिखों का जुलूस राजा बाजार के गुरुद्वारे से निकलकर शाम के वक्त जामा मस्जिद के पास से गुजरता है। शहर के दिल धड़कने लगते हैं। मुसलमानों को यह बात नागवार थी कि जुलूस गाजे-बाजे के साथ मस्जिद के सामने से गुजरे। सदियों तक जिन्हें जूतों के नीचे रखा, उन काफिरों की यह मजाल कि अपने जुलूस निकालें और वो भी मस्जिद के सामने से।

स्कूल में दसवीं के छात्र भीष्म साहनी ने पहली कहानी लिखी-“अबला।’ विनाशकारी विभाजन के बाद अबला नारी पर लिखी वह कहानी पीछे छूट गई, जिसे लाहौर की कॉलेज पत्रिका में छापा गया था। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में आकर भीष्म बात-बात पर पिंडी को याद करते हैं। रावलपिंडी की मालरोड पर विक्टोरिया के बुत की याद। कॉलेज के पास ही वह डीएवी कॉलेज है, जो भगतसिंह की अनेक क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बना।

लाहौर में अपने बहनोई और हिंदी के लेखक चंद्रगुप्त विद्यालंकार का घर, जहाँ भीष्म पहली बार वात्स्यायन और देवेंद्र सत्यार्थी से मिलते हैं। विद्यालंकार के घर आकर रुके मुंशी प्रेमचंद से न मिलने का अफसोस उम्र भर रहता है क्योंकि तब वे रावलपिंडी चले गए थे। इसकी भरपाई उन्होंने प्रेमचंद के ऊर्दू में लिखे पत्रों को ढूंढने से की और कानपुर तक आकर पत्रकार दयानारायण निगम से मिले। लाहौर में रवींद्रनाथ टैगोर को कविता पाठ करते हुए और शांति निकेतन के निर्माण की खातिर धन संग्रह के लिए नाटक करते हुए देखना। उसी ब्रेडलॉ हॉल में उदयशंकर और उनके समूह का अविस्मरणीय नृत्य। ये सब अखंड भारत की अंतिम स्मृतियाँ हैं। रावलपिंडी जैसे कई शहर, उनसे ज्यादा कस्बे और उनसे भी ज्यादा गाँवाें सनातन की स्मृतियों का हिसाब लगाइए।

इस्लाम के नाम पर हुए विनाशकारी विभाजन ने भारत का दस लाख वर्ग किलीमीटर भूगोल ही हजम नहीं किया, सनातन संस्कृति के हजारों वर्षों के हरे-भरे बाग का एक बड़ा हिस्सा भी हमेशा के लिए उजाड़कर रख दिया, जिसे जड़मूल से नष्ट करने की हजार-बारह सौ वर्षों की धीमी प्रक्रिया तथाकथित इस्लामी हुकूमत में जारी रही थी।

लाहौर और मुलतान की गलियों में पुराने हिंदू, जैन और आर्य समाज मंदिरों, भव्य गुरुद्वारों और खत्रियों-खन्नाओं की आलीशान हवेलियों के वीडियो डॉ. साजिद के वीडियो में देखिए, जहाँ कसाई माँस बेच रहे हैं या मस्जिद-मदरसों के मेले लगे हैं। बहावलपुर के एक नौजवान माखनराम चौहान के वीडियो में दूर देहात में बटवारे के बाद बदकिस्मत हिंदुओं की लगातार सिमटती-बुझती रौनक देखिए, जहाँ ढाबों पर उनकी चाय पीने के कप भी पेड़ों से अलग टांगे जाते हैं। वे सब धर्मांतरित ईमानवालों के लिए आज तक काफिर होने से अछूत हैं। कोई फर्क नहीं पड़ता, वे दलित हैं या क्षत्रिय या ब्राह्मण!

भीष्म साहनी की सनातन स्मृतियों का अखंड भारत आज बचे-खुचे भारत में भी कितना बचा हुआ है? उनकी बुआ की बेटियों के श्रीनगर में आज कितनी बेटियाँ वेदमंत्र पढ़ रही हैं? मेवात के हजारों गाँवों में सनातन की कौन सी ध्वनि कब डूब गई, किसे पता है? पश्चिम बंगाल और असम में बेखौफ घुसपैठियों ने क्या सदियों से जारी घुसपैठ को ही कायम नहीं रखा है? अब वे हमलावर होकर नहीं आते, घुसपैठ करके फैलते-पसरते हैं। अब वे तलवार लेकर जिहाद पर नहीं आते, न ही जंग में लूटी लड़कियों को उठाकर ले जाते। अब वे नाम बदलकर इश्क करने निकलते हैं, लव जिहाद अब एक सच्चाई है।

2047 के शक्तिशाली भारत का मास्टर प्लान बनाने का यही समय है। उदार लोकतंत्र के घातक दुष्प्रभावों को रोकने के लिए कानून को प्रभावी बनाना जरूरी है। परिवार-कुटुंब में बच्चों को उनके हित-अहित की खुलकर चर्चा जरूरी है। शिक्षण संस्थानों में जागरूकता निरंतर चाहिए, जहाँ बेटियों को उनकी हिफाजत के बारे में बताया जाए। देश विरोधी शक्तियों को जमीन में सौ फुट उतारने की इच्छाशक्ति राजनीति और प्रशासन में चाहिए। जाति, क्षेत्र और भाषाओं में बाँटने की राजनीति अब बुझनी चाहिए। आशाजनक है कि पिछले एक दशक में भारत काफी हद तक सकारात्मक दिशा में गति करता हुआ दिखाई दिया है। यह दीए की लौ को मशाल में रूपांतरित करने का समय है।

(लेखक राष्ट्रवादी विषयों पर खोजपूर्ण लेखन करते हैं और ऐतिहासिक विषयों पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं-संप्रति ः माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में कुलगुरु के रुप में सेवाएँ दे रहे हैं) 
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