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ब्राह्मणों ने अपने अत्याचारों को महिमाा मंडित नहीं किया, इसलिए वे आज भी आसान शिकार हैं

ज्ञान के प्रति एक द्वेष रहता ही रहता है। लोग दूसरे के धन प्राचुर्य को सह लेते हैं पर ज्ञान प्राखर्य नहीं सहा जाता। किसी भी सभ्यता को नष्ट करना हो तो सबसे पहले उसके ज्ञान-ग्रिड पर आक्रमण करना होता है।
राक्षस क्यों ब्राह्मणों और यज्ञों पर आक्रमण करते थे? द्विजभोजन मख होम सराधा/ सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा। यज्ञ होम हवन में ही बाधा नहीं, श्रद्धा में भी बाधा। देखत जग्य निसाचर धावहिं/ करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं। यह अत्याचार जो ब्राह्मणों पर हुए, उनके विवरणों से हमारी पुस्तकें भरी हुई हैं। जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं/ नगर गाऊँ पुर आगि लगावहिं।
इसलिए ब्रह्महत्या के विरुद्ध इतने कड़े नियम बनाने पड़े थे। तपस्वियों, ऋषियों मुनियों की हिंसा राक्षसों का प्रिय शगल बन गया था। अरण्यकांड में राम को ज्ञात होता हैः “इस वन में रहने वाला वानप्रस्थ महात्माओं का यह महान समुदाय जिसमें ब्राह्मणों की ही संख्या अधिक है तथा जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के द्वारा अनाथ की तरह मारा जा रहा है इस मुनि समुदाय का बहुत अधिक मात्रा में संहार हो रहा है। (श्लोक 15, सर्ग 6, अरण्यकांड)।’ आइये, देखिये, ये भयंकर राक्षसों द्वारा बार- बार अनेक प्रकार से मारे गये बहुसंख्यक पवित्रात्मा मुनियों के शरीर शव-कंकाल दिखायी देते हैं। “(अगला श्लोक)” पंपा सरोवर और उसके निकट बहने वाली तुंगभद्रा नदी के तट पर जिनका निवास है, जो मंदाकिनी के किनारे रहते हैं तथा जिन्होंने चित्रकूट पर्वत के किनारे अपना निवास स्थान बना लिया है, उन सभी ऋषि-महर्षियों का राक्षसों द्वारा महान संहार किया जा रहा है। ” (अगला)” इन भयानक कर्म करने वाले राक्षसों ने इस वन में तपस्वी मुनियों का जो ऐसा भयंकर विनाशकांड मचा रखा है, वह हम लोगों से सहा नहीं जाता है। “(अगला)

तो जिन लोगों ने लगातार अत्याचार सहे, उन लोगों की गलती यह रही कि उन्होंने अपने विक्टिमहुड का नैरेटिव तैयार नहीं किया। बार बार उनका ईश्वर उनकी रक्षा के लिए अवतार लेता रहा पर बार बार उसका आना ही इस कारण होता रहा कि वे ही बार बार अतिचार के शिकार होते रहे। सिर्फ पौराणिक इतिहास ही नहीं बाद का इतिहास भी ब्राह्मणों के उत्पीड़न का साक्षी रहा।
जो विप्र परंपरा यह कहती थी कि ‘यो हि यस्यान्न मश्नाति स तस्याश्नाति किल्विषम्” कि जो जिसका अन्न खाता है, वह उसका पाप भी खाता है’; उस परंपरा को दूसरे के मुंह का निवाला छीन लेने का आरोपी बनाया गया।
जिस परंपरा में विप्र को अकिंचन होना सिखाया गया हो- ‘अनन्तसुखमाप्नोति तद् विद्वान यस्त्वाकिंचनः’ कि जो अकिंचन है, वह विद्वान अनन्त सुख पाता है- उस परंपरा को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया गया कि जो पददलित हैं, जो पीड़ित है, उनकी दुर्दशा का दायित्व इन्हीं लालची पेटू ब्राह्मणों का है।
ऐसे में भारत में एक दल का खुलेआम ( खुलेआम इसलिए कि यह उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध है) यह दावाः-कि Brahmanism is an ideology of graded inequality and oppression. Its origins lie in the Vedic period, thousands of years ago. A class that has emerged and established its rule, “ब्राह्मणवाद श्रेणीकृत असमानता और दमन की विचारधारा है। इसकी उत्पत्ति वैदिक काल में हजारों साल पहले हुई। एक वर्ग उभरा और उसने अपनी सत्ता स्थापित की” :-हास्यास्पद और अनपढ़ लगता है।
ध्यान दीजिए कि स्वयं अंबेडकर भी बहुत परिश्रम के बावजूद वेदों में जाति व्यवस्था नहीं ढूँढ पाये थे पर इस दल को वैदिक काल को बदनाम करने में कोई संकोच नहीं है।
देखें कि इस एक बिन्दु पर साम्राज्यवादी और मार्क्सवादी, दलित चिंतक, मिशनरी और अल्पसंख्यकवादी सब एक हो जाते है।
गेल ओम्वेद मिल्ली गजट में ‘हावी’ ब्राह्मणवाद के विरुद्ध मुस्लिम दलित एकता की वकालत इस आधार पर करते हैं कि बौद्ध धर्म की पराजय के बाद इस्लाम ने ही भारत में शताब्दियों तक समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (ब्रदरहुड) के मूल्यों को जिंदा रखा।
सैय्यद शहाबुद्ददीन भी मिल्ली गजट में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावनाओं की चर्चा करते हैं और इस बात पर दुःख जताते हैं कि ‘शूद्र ब्राह्मनिकल व्यवस्था में ही एकोमोडेशन चाहते हैं।
समानता के मूल्य इन भले मानुसों के लिए उस वेद में नहीं है जो यह कहता हैः “असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उदवतः /ऊंचनीच की असमानता नहीं है। समता बहुत है।), प्रवतः समंबेहु.” (हमारी मातृभूमि में रहने वालों में उन्हें शंकराचार्य के उस उद्‌घोष में ‘मूल्य’ नहीं दिखता कि It has been established that every one has the right to the knowledge and that the supreme goal is achieved by that knowledge alone. कि “यह स्थापित सत्य है कि प्रत्येक को ज्ञान का अधिकार है और महत्तम लक्ष्य ज्ञान मात्र से ही प्राप्त किया जाता है।” (भाष्य, तैत्तिरीय उपनिषद् 2.2)। वह सर्वहाराओं के उन स्वनामधन्य शुभ ‘चिंतको’ में नहीं था जो व्यवस्था के उच्छिष्ट पर पलते हैं।
वह सच्चा ब्राह्मण था जो ‘भिक्षां देहि’ का जीवन किसी बाहरी निर्देश से नहीं जिया, बल्कि अपने हालात और हकीकतों के कारण जिया। जिस तरह से ये सभी ‘बंधु’ एक हुए हैं, उससे इतना तो स्पष्ट है कि ब्राह्मणवाद की बोगी से इनके जरूर कुछ हित सधते हैं। अन्यथा क्रूसेड, विच ट्रायल्स इनक्वीजीशन, जेनोसाइड, उपनिवेशवाद, एटम-बम, स्लेवरी, नव-साम्राज्यवाद, जजिया, ईजियन द्वीप में इस्लामी आक्रामकों द्वारा 27,000 ईसाइयों का नरसंहार, कांस्टिनटिनोपल से लेकर दिल्ली तक मध्यकालीन मुस्लिम आक्रामकों के सामूहिक हत्याकांड, 1840-1860 के बीच खलीफाओं के हत्याकांड , 1847 में 30,000 असीरियन क्रिश्चियनों को मार डालना, लेबनान, दैर- अल- कमार, जाजिन, हस्बैया, राशय्या, जाला दामस्कस के भयावह नरसंहार जहां पहले ईसाइयों को शस्त्र जमा करने को कहा गया और बाद में सामूहिक किलिंग में ‘रस’ लिया गया, 1870 के दशक के बाल्कन हत्याकांड (जहां कभी 12,000 ईसाई एक साथ मार डाले गए, तो कभी 9000), 1890 के दशक के नरसंहार (जहां कभी इंस्तंबूल में 6000 आर्मीनियन ईसाइयों को) ‘बूचर’ किया गया तो कभी 3 लाख असीरियन ईसाइयों का 24 अप्रैल 1915 से शुरू हत्याकांडों की श्रृंखला (जब आटोमन मुस्लिम शासकों द्वारा 15 लाख आर्मीनियनों और 2.50 लाख असीरियनों की हत्या की गई); हिरोशिमा, नागासाकी लेनिन-स्टालिन के रूस, माओ के चीन, कम्पूचिया में ‘ड्राप इयर’, नक्सली नरसंहार ये सब समानता (egalitarianism) और बंधुत्व (brotherhood) के वाकई ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें वैदिक समय से लेकर अभी तक ब्राह्मणवाद कभी जिंदा नहीं रख पाया लेकिन इन ‘बंधुओं’ ने कभी खत्म नहीं होने दिया।
इस परिप्रेक्ष्य में पुनः उस दल के कथन के अगले हिस्से को पढ़िए Its outlook of graded superiority and inferiority has infected, to a greater or lesser degree, each and every caste and religious community. कि ‘इसके श्रेणीकृत श्रेष्ठता और हीनता के दृष्टिकोण ने ज्यादातर और कमतर रूप में मगर हर जाति और धार्मिक समुदाय को संक्रमित किया।’ यहां “Its” का अर्थ ब्राह्मणवाद से है। लेकिन ‘ईच’ एवं ‘एवरी’ पर ध्यान दें और ध्यान दें ‘रिलीजस कम्युनिटी’ शब्द पर।
माने यह कि ऊपर गिनाए गए इन सारे शुभकामों के लिए भी ब्राह्मणवाद ही जिम्मेदार रहा होगा- यदि इनकी मानें तो। बुद्धि के ये जमींदार आगे कहते हैं: Marx has spoken about this advance as a process involving the elimination of all classes and class distinctions generally, all the relation of production on which they rest, all the social relations corresponding to them, and all the ideas that result from these social relations. This understanding was further deepend by Mao Tse Tung, especially through the Great Proletariat Cultural Revolution. In India, the task of continuing the revolution, all the way up till communism, is crucially dependent on advancing and deepening the struggle against Brahmanism and its concrete manifestations.
अर्थात, “मार्क्स ने इस प्रगति को एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में बताया जो सभी वर्गों और वर्ग विशिष्टताओं को सामान्य तौर पर समाप्त करती है. सभी उत्पादन-संबंध जिन पर वे निर्भर हैं, उससे मिलते सभी सामाजिक रिश्ते, और सभी विचार जो इन सामाजिक रिश्तों का फल हैं। यह समझ आगे माओ-त्से-तुंग द्वारा गहरी की गई, खासकर महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति के जरिए। भारत में क्रांति को जारी रखने का काम- साम्यवाद के लक्ष्य तक- ब्राह्मणवाद और इसके ठोस स्वरूपों के विरुद्ध संघर्ष को बढ़ाने और गहरा करने पर अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से निर्भर है।”
तो यह स्पष्ट है कि ब्राह्मनिज्म रावण के समय से ही एक ऐसी सत्ता रहा है जिससे और जिसके मूर्त प्रतीकों से संघर्ष किए बिना न तो उनकी प्रगति (advancing) होती है, न ‘खुदाई’ (deepening)। उनकी यानी शेष सभी “समानता” और “भाईचारे” की विचारधाराओं की। उस सांस्कृतिक क्रांति की जिसमें करोड़ों लोग मारे गये, बुद्धिजीवी विशेष रूप से टारगेट किये गये – वह सांस्कृतिक क्रांति भारत में नहीं आ पा रही तो इस नामुराद ब्राह्मणवाद के कारण।
सोचिए तो कहां उनके पास स्टालिन, किम-इल-सुंग, माओत्सेतुंग, होचीमिन्ह, पोल पोट जैसे लोग हैं और ये ‘ब्राह्मनिकल व्यवस्था’ जिसमें कभी वशिष्ठ, कभी विश्वामित्र, कभी शंकराचार्य, कभी कणाद, कभी कपिल, कभी जैमिनी, कभी चाणक्य हुए !

साभार- https://www.facebook.com/share/1HiiYwdjzs/
(लेखक मध्य प्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

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