भारत भवन, भोपाल मध्यप्रदेश की एक श्रेष्ठ संस्था है। इसमें साहित्य, कला और रंगकर्म पर विमर्श और प्रस्तुतियां होती है। साहित्य प्रभाग का नाम है वागर्थ। रंगकर्म प्रभाग का नाम है रंगमण्डल। चित्रकला प्रभाग का नाम है, रूपंकर। संगीत प्रभाग का नाम है अनहद। ये चार विभाग प्रारंभ से हैं। बाद में पाँचवा प्रभाग सिनेमा का बना, जिसका नाम रखा गया छवि। परन्तु मूल संकल्पना में प्रारंभिक चार प्रभाग ही थे। इन प्रभागों के ही कार्यक्रम यहाँ होते रहे है। वागर्थ के अंतर्गत साहित्यिक विमर्श किया जाता रहा है, जिनमें समीक्षकों का अखिल भारतीय समागम ‘‘समवाय’’ के नाम से हुआ था, जिसमें अज्ञेय जी, विष्णुकांत शास्त्री, रमेशचन्द्र शाह, नामवरसिंह सहित भारत के सभी दिग्गज समीक्षक आये थे और मैं भी आमंत्रित था। कविता एशिया में एशिया के शीर्ष कवि शामिल हुए थे। इसके रंगमण्डल में बी.व्ही. कारंत ने महत्वपूर्ण कार्य किया और अनहद में देश के सभी महत्वपूर्ण संगीतज्ञ, गायक एवं नर्तक- नर्तकियाँ आते रहे, जिनकी संख्या 150 से अधिक है। रूपंकर में सैयद हैदर रजा सहित अनेक विश्वक विख्यात चित्रकारों का योगदान रहा है और उनके चित्र यहाँ है। वनवासी कला के क्षेत्र में जे. स्वामीनाथन ने इसे वैश्विक प्रतिष्ठा दिलायी थी।
भारत भवन, मध्यप्रदेश शासन द्वारा स्थापित है और इसे केन्द्रीय अनुदान भी मिलता है तथा इसके न्यासियों में केन्द्र के प्रतिनिधि अवश्य होते है। समकालीन विमर्श ही यहाँ की विशेषता रही है। क्योंकि यह इतिहास या दर्शन का केन्द्र नहीं है। यह साहित्य, संगीत, नाट्य, नृत्य और चित्रकला सहित सभी रूपंकर कलाओं का केन्द्र है। इन विषयों पर समकालीन राष्ट्र जीवन के प्रमुख विमर्श यहाँ होते रहने की परम्परा है।
इन दिनों भारत का समकालीन विमर्श क्या है? श्रीराम जन्मभूमि में भव्य मंदिर का निर्माण और उससे उभरी विराट जनचेतना भारत का सर्वोपरि विमर्श है। ऑपरेशन सिन्दूर के बाद भारत के शौर्य को जाग्रत करने वाले नाट्य एवं साहित्य सर्वोपरि विमर्श है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व समकालीन विमर्श है। स्वामी विवेकानंद के चिंतन से युवा वर्ग को मिलने वाली प्रेरणा समकालीन विमर्श है।
जहीरुद्दीन बाबर भारत भवन के लिए कोई विमर्श का विषय नहीं है। आप जहीरुद्दीन के भक्त हो या उस पर आसक्त हो या उसके निंदक हो, इस पर किसी इतिहास शोध संस्था में जाकर आप अपना परचा पढ़ सकते है। उस पर बहस कर सकते हैं। भारत भवन उसकी जगह नहीं। क्योंकि जहीरुद्दीन किसी समकालीन विमर्श का विषय ही नहीं है। अपने प्रिय यार बाबरी पर फिदा और नशे में धुत जहीरुद्दीन ने चार साल में भारत में कहां-कहां ठोकरे खाई, और कैसे तकलीफ में जिन्दगी काटी, और किस दुर्दशा में मरा, यह समकालीन विमर्श का अंग नहीं है। भारत के लिए जलालुद्दीन (अकबर) का तो कोई अर्थ है हालांकि वह भी अपने समय के भारत के 16वें हिस्से में राजपूतों के साथ साझेदारी में ही राज्य कर सका था। अतः समकालीन विमर्श में उसका भी कोई महत्व नहीं है। फिर भी भारत के किसी इतिहास के संस्थान में उस पर चर्चा करने वाले कर सकते है। भारत भवन के लिए तो वह भी विषय नहीं है।
किसी पूर्व कम्युनिस्ट ने बाबर के विरुद्ध कौन सी नई खोज कर ली है, यह किसी भी स्थिति में भारत भवन या मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग के लिए कोई विषय नहीं हो सकता। कम्युनिस्टों को और पूर्व कम्युनिस्टों सहित सबको अपनी नई-नई ऐतिहासिक खोजों का पूरा अधिकार है और इतिहास के केन्द्रों में उन पर बहस भी होनी ही चाहिए। परन्तु भारत भवन की स्थापना के उद्देश्ये और यहां के अब तक के विमर्श की गौरवशाली परम्परा में जहीरुद्दीन भाई पर केन्द्रित किसी नई किताब पर चर्चा का कोई भी औचित्य नहीं है। जलालुद्दीन या सलीम पर भी चर्चा की जगह भारत भवन नहीं हो सकता। कोई और ठांव खोजनी चाहिए।
(लेखक ऐतिहासिक व राजनीतिक विषयों के जानकार हैं और कई पुस्तकें लिख चुके हैं)

