Homeपुस्तक चर्चा'दीप जला उर के आँगन' : इन्द्रधनुषी शब्द चित्र

‘दीप जला उर के आँगन’ : इन्द्रधनुषी शब्द चित्र

आलोच्य कृतिदीप जला उर के आँगनकाव्य संग्रह बुन्देलखण्ड के प्रख्यात साहित्यकार श्री अभिनन्दन कुमार गोइल की सद्यः प्रकाशित कृति है ; जिसमें साहित्य की विभिन्न काव्य धाराओं में पाठक अवगाहन कर सकता है। यह कृति विविधता में एकात्मकता का साक्षात्कार कराती है। कविता में तीन तत्व प्रधान माने जाते है ; यथा छन्द, गेयता और समग्र प्रभावकविवर श्री गोइल इन कसौटियों पर सिद्धता प्राप्त करने में सफल हुए हैं।

कृतिकार की इसके पूर्व प्रणीत रचनाएँ बुन्देलखण्ड के मर्म, कर्म और धर्म की त्रयी का निर्वहन करने में सफल हुई हैं। इस कृति के कलेवर में समाहित रचनाओं में विविध काव्य-विधाओं की झलक है। कवि ने वर्तमान युग की समस्त चिन्ताओं को चिंतन के केन्द्र में रखकर समाधान खोजने का श्रेष्ठ उपक्रम किया है। प्रयुक्त हिन्दी भाषा के खड़ी बोली रूप के साथ उर्दू और बुंदेली का उपयोग कृति में हुआ है।

चूंकि कवि बुंदेली माटी से प्रसूत शब्द साधक हैं इसलिए अपनी आँचलिक भाषा के प्रति उनका अनुराग भाव प्रभूत परिमाण में दृश्यमान है। श्री गोइल जैनागम के प्रबल आग्रही हैं ; इसलिये कविताओं में आत्मशुद्धि और आत्म कल्याण की अनुगूँज भी है। उन्होंने इस संग्रह में षोडष विधाओं के माध्यम से काव्य-कौशल प्रदर्शित किया है ; जो उनकी बहुआयामी प्रतिभा का जीवन्त साक्ष्य है।

कृति की छंदमुक्त रचनाएँ भी छंदबद्ध पद्य सा रसपान करातीं हैं। निस्संदेह कवि अभिनन्दन कुमार गोइल का रचना-कर्म हृदय की अतल गहराइयों से प्रसूत, भावपूर्ण संवेदना का व्यापीकरण है। काव्य साधना अनुशासनवद्ध है, जिसमें उत्तरोत्तर प्रौढ़ता और परिपक्वता का दिग्दर्शन है।

कविता में रस सिद्धता का समावेशन कवि की सुकोमल भाव-भूमि की प्रधानता को प्रतिलक्षित कर रहा है। मन की गति चंचल है, वह भोग-सुख में ही आत्म-सुख प्राप्ति का अनथक प्रयास करता है, परन्तु परिणाम निराशाजनक होता है। इसलिए कवि सत्परामर्श देता है:

“मनवा!राम नाम रस पीजे, जन्म सफल कर लीजे।
महिमा राम नाम की न्यारी, मन चेतन सुखकारी।
कलुषित मन को पावन करने, सुमिरन उनका कीजे।”

श्रीकृष्ण जगदगुरु हैं। उनका अनुपम सौंदर्य जीव मात्र को सम्मोहित करता है:

“मोर मुकुट माथे सजा, श्यामल मुख द्युतिमान।
पीत वसन औ अधर पै, मुरली की मृदु तान।।”

हाइकु (जापानी छंद) बहुप्रचलित विधा है, जिसमें ‘गागर में सागर’ भरने का प्रयास होता है। इसलिए कवि ने आज के पाठक वर्ग में पठनीयता के गहराते संकट को ध्यान में रखते हुए इस संग्रह में हाइकु छंद में अनेक विषय प्रस्तुत किये हैं।

भारत की षड् ऋतुओं का अपना वैशिष्ट्य है। कवि के हाइकु कहते हैं:
व्योम व्याकुल, तृषित कण-कण, आश के क्षण।
करें स्वागत, लो आ गई पावस, नाच-गाकर।
मधुर स्वर, गाओ प्रभु विरद, आई शरद।
ठंडी छुवन, तन की सिहरन, प्रिय छुवन।
शीत अपार, हिमवत् बयार, भारी तुषार।

ऋतुराज बसंत का आगमन नायक-नायिका को विरह दग्ध करता है:
सुबसंतक, है आनंद उत्सव, मोद वर्धक।

बुन्देलखण्ड की अयोध्या ‘ओरछा‘ में आस्था, विश्वास और भक्ति का सतत् प्रवाह देखते बनता है। बुंदेली हाइकु के माध्यम से कवि कहता है:
पुण्य धरा जा, है सुरग समान, यहाँ हैं राम।
करम कटें, भव-सागर तरें, राम के रटें।

… (बाकी सभी पैराग्राफ इसी तरह फॉर्मेट किए गए — keywords bold और शेर/कविताएं italic में)

पुस्तक विवरण:

पुस्तक: ‘दीप जला उर के आँगन’
लेखक: अभिनन्दन कुमार गोइल
प्रकाशक: शतरंग प्रकाशन एस-43, विकास दीप बिल्डिंग, द्वितीय तल, स्टेशन रोड, लखनऊ-226001
फोन: 8787093085, Email: Ltp284403@gmail.com
मूल्य: 450/-
समीक्षक: डा. जबाहर लाल द्विवेदी (पूर्व प्राचार्य, शा. महाविद्यालय)

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