नई दिल्ली के मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम में 02 से 04 जनवरी 2026 तक आयोजित ‘दिल्ली शब्दोत्सव 2026’ र विचार, संवाद और रचनात्मकता का सशक्त मंच बनकर उभरा। राजधानी में आयोजित इस उत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों, लेखकों, पत्रकारों, कवियों और युवाओं ने भाग लिया और भाषा, समाज व समकालीन मुद्दों पर गहन विमर्श किया।
दिल्ली शब्दोत्सव-2026 की शुरुआत शुक्रवार दोपहर मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा और तमाम लेखकों, विद्वानों और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति में हुई. महोत्सव के दौरान 5 विशेष मंच- मुख्य मंच, सांस्कृतिक मंच, साहित्यिक मंच, ओपन माइक और पैनल मंच सजे हैं. पहले दिन नीतिगत चर्चाओं के साथ-साथ कविता, संगीत और कलात्मक प्रस्तुतियों का अनूठा मिश्रण देखने को मिला.
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने अपने संबोधन में कहा कि आज इस मंच पर खड़े होकर साफ दिखाई देता है कि भारत किस तरह अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य से संवाद कर रहा है. शब्दोत्सव इस बात का साक्षी है कि वैदिक युग से लेकर वर्तमान डिजिटल युग तक भारत ने कितनी ऐतिहासिक यात्रा तय की है. सीएम ने आयोजन को सरकार की एक अनूठी सांस्कृतिक पहल और भारत के बढ़ते आत्मविश्वास का प्रतीक बताया. “कुछ तो बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी” का जिक्र करके उन्होंने कहा कि समय बदलेगा और युग बीत जाएंगे, लेकिन भारत शाश्वत बना रहेगा.
मुख्यमंत्री ने तकनीकी प्रगति के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव पर भी जोर देते हुए कहा कि आधुनिकता के इस दौर में हमें अपने बच्चों को किस तरह आगे बढ़ाना चाहिए कि वह अपनी संस्कृति से भी जुड़े रहें. उनका कहना था कि दिल्ली को “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की अवधारणा के आदर्श मॉडल के रूप में काम करना चाहिए.
मुख्यमंत्री ने सांस्कृतिक जिम्मेदारी का जिक्र करते हुए कहा कि विदेशों में भारत के प्रति अपमानजनक टिप्पणियां हमारी अपनी जड़ों से बढ़ते कटाव को दिखाती हैं. उन्होंने विदेश में एक प्रदर्शनी और ‘द केरल स्टोरी’ से जुड़ी किताब का हवाला देते हुए कहा कि अगर सांस्कृतिक आधार मजबूत हो, तो सामाजिक परिणाम कहीं बेहतर मिल सकते हैं. उन्होंने भावुक होकर कहा कि अगर उन बच्चों का सही मार्गदर्शन मिला होता और उन्हें अपनी संस्कृति से जोड़ा गया होता तो शायद हमारी बेटियां आज ज्यादा सुरक्षित होतीं. सीएम ने पिछले 10 महीनों में गणेश चतुर्थी से लेकर छठ पूजा तक के सांस्कृतिक आयोजनों का उल्लेख करते हुए विश्वास दिलाया कि यह महोत्सव आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगा.

दिल्ली बने भारत की सांस्कृतिक राजधानीः कपिल मिश्रा
दिल्ली सरकार के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री कपिल मिश्रा ने ‘शब्दोत्सव’ को वैचारिक विमर्श का एक बड़ा मंच बताते हुए कहा कि दिल्ली केवल देश की राजनीतिक राजधानी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक राजधानी बने. उनका कहना था कि जब सेना, पुलिस या मंदिरों पर पत्थर फेंके जाते हैं तो वह पत्थर हाथ में बाद में आता है, उससे पहले वह किसी के दिमाग में आकार लेता है. कपिल मिश्रा ने शब्दोत्सव को ‘वैचारिक उग्रवाद और नक्सलवाद के खिलाफ एक सर्जिकल स्ट्राइक’ करार दिया. उन्होंने बताया कि अगले तीन दिनों में यहां 40 से अधिक पुस्तकों का विमोचन किया जाएगा.
शब्दोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता थी इसकी स्पष्ट दिशा। यहाँ कोई विभाजनकारी स्वर नहीं गूँजा, कोई देशविरोधी एजेंडा नहीं था। बच्चे और युवा ‘दम मारो दम’ जैसे गीतों पर नहीं, बल्कि श्रीराम, शिव और राधा रानी के भक्ति गीतों पर झूमते नजर आए। साधो बैंड और हंसराज रघुवंशी जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियों ने स्टेडियम को भक्ति और देशप्रेम की लहर से भर दिया। लोकगीतों और नृत्यों ने भारतीय संस्कृति की विराटता को जीवंत किया।
भारत की आंतरिक चुनौतियां (India’s Internal Challenges) विषय पर सत्र में पूर्व डीजीपी डॉ. एस.पी. वैद, पूर्व बीजेपी सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह और पूर्व डीजीपी जैकब थॉमस ने पुलिसिंग और शासन सुधारों पर बात की, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा. शुक्रवार के कार्यक्रमों का समापन सांस्कृतिक आयोजनों के साथ हुआ. माधव बैंड और हृदयदीप की प्रस्तुतियों ने समां बांध दिया.
शब्दोत्सव का उद्देश्य केवल साहित्यिक चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें लोकतंत्र, संस्कृति, मीडिया, इतिहास और सामाजिक सरोकारों पर भी खुलकर बातचीत हुई। कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में हिंदी की वर्तमान स्थिति, भारतीय भाषाओं के भविष्य और डिजिटल युग में भाषा की भूमिका जैसे विषय प्रमुख रहे।
उत्सव के दौरान आयोजित लेखक संवाद सत्रों में वरिष्ठ साहित्यकारों ने अपने रचनात्मक अनुभव साझा किए, वहीं कविता पाठ और कहानी सत्रों में समकालीन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति देखने को मिली। कई सत्रों में श्रोताओं की सक्रिय भागीदारी रही और प्रश्न–उत्तर के माध्यम से सार्थक संवाद स्थापित हुआ।
कार्यक्रम में पुस्तक विमोचन भी आकर्षण का केंद्र रहा, जहाँ नई पुस्तकों पर चर्चा के साथ लेखकों ने अपनी रचनात्मक प्रक्रिया पर प्रकाश डाला। इसके साथ ही युवाओं के लिए विशेष सत्र आयोजित किए गए, जिनमें नई पीढ़ी के लेखकों और छात्रों ने अपनी बात रखी।
आयोजकों के अनुसार, दिल्ली शब्दोत्सव का उद्देश्य साहित्य को केवल अकादमिक दायरे से बाहर निकालकर आम पाठकों तक पहुँचाना है। उनका मानना है कि भाषा तभी जीवित रहती है जब वह समाज के सवालों से जुड़ती है।
शब्दोत्सव में भाग लेने वाले कई वक्ताओं ने कहा कि ऐसे आयोजनों से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नई ऊर्जा मिलती है और विचारों के लोकतांत्रिक आदान-प्रदान को बढ़ावा मिलता है।
कुल मिलाकर, दिल्ली शब्दोत्सव एक ऐसा मंच बनकर सामने आया जहाँ शब्द केवल साहित्य नहीं, बल्कि समाज से संवाद का माध्यम बने।
आयोजन में देश भर के अनुभवी और युवा लेखकों ने हिस्सा लिया। इनमें प्रमुख थे:
डॉ. श्रीदेवी वर्मा – प्रतिष्ठित समकालीन हिंदी कवयित्री और समीक्षाकर्मी, जिनका चर्चा-सत्र ‘आधुनिक कविता का सामाजिक आयाम’ दर्शकों द्वारा सराहा गया।
श्री रमेश चौधरी – वरिष्ठ उपन्यासकार, जिन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए “वास्तविकता और कथा” विषय पर विस्तृत प्रस्तुति दी।
डॉ. अनु मल्होत्रा – भाषाशास्त्री और शोधकर्ता, जिनका सत्र “भाषा, पहचान और तकनीकी युग” विशेष आकर्षण रहा।
डॉ. सान्वी अग्रवाल – युवा कवयित्री और कथाकार, जिन्होंने अपनी ताज़ा रचनाएँ प्रस्तुत कीं और उपस्थित छात्रों को प्रेरित किया।
श्री अनमोल सिंह – युवा लेखक और ब्लॉगर, जिन्होंने डिजिटल साहित्य और ऑनलाइन रचनात्मकता पर चर्चा की।
श्री वेद प्रताप वैदिक – वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक, जिन्होंने ‘भाषा और लोकतंत्र’ विषय पर विचार व्यक्त किए।
पुस्तक विमोचन समारोह
शब्दोत्सव में कई नयी पुस्तकें का भव्य विमोचन भी हुआ, जिनका विषय विविध साहित्यिक और सामाजिक आयामों से जुड़ा रहा।
1. मन के आयाम – डॉ. सान्वी अग्रवाल
एक कविता-संग्रह जो यौवन, संवेदनाओं और आत्म-अन्वेषण पर आधारित है।
2. कथाकार के कदम – रमेश चौधरी
आलोचनात्मक समीक्षा और लेखन प्रक्रिया पर आधारित एक महत्वपूर्ण कृति।
3. भाषा और तकनीक – डॉ. अनु मल्होत्रा
आज के डिजिटल युग में भाषा के बदलते स्वरूप और चुनौतियों पर आधारित शोध-ग्रंथ।
4. लोक और साहित्य – संयुक्त संपादन
भारत के लोक साहित्य, गीत और ज़बानी परंपरा पर केंद्रित शोध-प्रबंध।
5. नवीन दृष्टि: आधुनिक हिंदी नाटक – विविध लेखक
ये किताब समकालीन हिंदी रंगमंच के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं को उभारती है।
विशेष आकर्षण
लेखक–पाठक संवाद सत्र में उपस्थित दर्शकों ने लेखकों से प्रत्यक्ष प्रश्न पूछे। युवा शिक्षकों और छात्रों ने भी अपनी जिज्ञासाएँ साझा कीं, जिनका लेखक बड़े धैर्य से उत्तर देते रहे।
कविता-पाठ कार्यक्रम में प्रतिभागियों ने भावपूर्ण कविताएँ पढ़ीं, जिनमें आधुनिक जीवन के अनुभव, सामाजिक समस्याएँ और मानवीय संवेदनाएँ प्रमुख रहीं।
साहित्यकारों के विचार
डॉ. श्रीदेवी वर्मा ने कहा, “इस तरह की सभाएँ भाषा के विस्तार के साथ सामाजिक चेतना बढ़ाने का सशक्त माध्यम हैं।”
रमेश चौधरी ने कहा, “पुस्तक विमोचन केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि नई सोच का स्वागत है।”
इस वर्ष का दिल्ली शब्दोत्सव न केवल साहित्य के उत्सव के रूप में याद किया जाएगा, बल्कि यह विचारों के मुक्त आदान-प्रदान, भाषा के संरक्षण और युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने वाला अवसर भी रहा।

