गयाजी के सभी स्थलों तक पहुंच बनाई जानी चाहिए। कभी 300 पुरा स्थल वाला गया में अब मात्र 48 से 54 स्थल ही पहचान में रह गए हैं। अधिकांश स्थल अभी भी लोगों से अनजान हैं । इनमें भारत सरकार द्वारा एक ही स्थल बोध गया को संरक्षित घोषित किया गया है,जबकि बिहार राज्य सरकार द्वारा केवल पांच स्मारक ही संरक्षित हैं। ये सभी गयाजी के पिण्ड तर्पण शृंखला में अपना महत्व पूर्ण स्थान रखते हैं। इनके नाम इस प्रकार है –
1.रामशिला हिल, गया
2.प्रेतशिला पहाड़ी ,बगड़ी चिरैया रोड, बहादुर बिगहा,गया
3.विष्णुपद मंदिर, गया
4.ब्रह्मयोनी पहाड़ी, गया
5.ताराडीह (मस्तीपुर) बोधगया
गया जी के अस्तित्व में रहने वाले लगभग आधे शतक स्थलों के आधे भी स्थल तक लोगों की पहुंच नहीं है। जो हैं भी वह धीरे धीरे अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। इसे विशेष अभियान चलाकर पुनः प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए। भारत देश में गया जी में 55 से ज्यादा ऐसी जगहें हैं जहां पिंडदान किया जाता है,जिसका बिहार के गया में खास महत्व है। यही हमारी परंपरा, कथा और आस्था तीनों एक साथ मिलते हैं।
गया की पावन धरती पर कदम रखना एक हिन्दू के लिए बड़े पुण्य का काम है । कहा जाता है कि खुद भगवान विष्णु यहां पितृ देव के रूप में विराजमान हैं। गया का नाम आते ही लोगों की श्रद्धा और भी बढ़जाती है। पितृपक्ष में भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक देशभर से लाखों लोग यहां आते रहते हैं। इन दिनों गया में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और परिवार पर से पितृ दोष दूर होता है।
गया में हैं 54 वेदियां अस्तित्व में
पहले गया में अलग-अलग नामों के कुल 360 वेदियां थी, जहां पिंडदान किया जाता था। वृहद गया महात्मय और वायुपुराण में 360 वेदियों का उल्लेख है। समय के साथ उपेक्षा और देखरेख के अभाव में अब यह संख्या घटकर मात्र 54 रह गई हैं। इनमें उत्तर दिशा में 5, मध्य भाग में 45 और दक्षिण दिशा में 4 पिंडवेदियां शेष बची हुई हैं।
हर साल पिंडददान के लिए देश विदेश से लाखों लोग गया पहुंचते हैं और अपने पितरों के मोक्ष की कामना करते हैं।
कहा यहा भी जाता है कि जब तक पितरों का गया जी में श्राद्ध न हो तब तक उन्हें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है।
– :अस्तित्व वाले प्रमुख वेदियां :-
1.विष्णुपद मंदिर:
गयासुर का पूरा शरीर ही आज का गया तीर्थ है। उसकी पीठ पर बने विष्णु भगवान के पैरों के निशान के ऊपर बनवाया गया भव्य मंदिर विष्णुपद मन्दिर के नाम से जाना जाता है। दंतकथाओं में कहा गया है कि गयासुर नामक दैत्य का बध करते समय भगवान विष्णु के पद चिह्न यहां पड़े थे। यह मंदिर 30 मीटर ऊंचा है जिसमें आठ खंभे हैं। इन खंभों पर चांदी की परतें चढ़ाई हुई है। मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु के 40 सेंटीमीटर लंबे पांव के निशान आज भी देखे जा सकते हैं। यह मन्दिर हिन्दू मान्यताओं में भगवान विष्णु के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है ।
गया के पास ही स्थित पाथेरकट्टी पहाड़ी से लायी गई ग्रेनाइट की चट्टानों से इंदौर की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने 18वी शताब्दी में इस मन्दिर का निर्माण राजस्थान से ख़ास तौर से बुलाये गये लगभग 1200 शिल्पकारों से करवाया गया था। मंदिर के निर्माण में लगभग 12 वर्ष लगे थे।मन्दिर के अंदर गर्भगृह में एक बेसाल्ट की चट्टान के उपर भगवान विष्णु के पैर के निशान आज भी मौजूद हैं। इसको धर्मशिला के नाम से जाना जाता है। मन्दिर प्रांगण के अंदर अन्य मंदिर भी स्थित हैं। एक भगवान नरसिम्हा को समर्पित है और दूसरा फाल्ग्विस्वर के रूप में भगवान शिव को समर्पित है।
विष्णुपद मंदिर के आस पासअन्य वेदियां :-
विष्णुपद मंदिर परिसर स्थित 16 वेदी स्थल के कण्व पद, क्रौंच पद, इंद्र पद, अगस्त्य पद, मतंग पद व कश्यप पद पर श्राद्ध व पिंडदान का कर्मकांड पूरा किया जाता है। मतंग पद, क्रौंच पद, अगस्त्य पद व कश्यप पद पर श्राद्ध व पिंडदान करने वाले श्रद्धालुओं के पितरों का ब्रह्म लोक में गमन होता है।
विष्णुपद मंदिर परिसर के अन्य वेदियो में निम्न वेदी भी काफी महत्वपूर्ण हैं –
मुंडपृष्ठा , आदिगया तीर्थ ,गधाधर वेदी, रुद्रपद वेदी, ब्रह्मपद वेदी, आह्वान्याराग्नि पद वेदी, सम्भ्याग्नि पद वेदी,अवस्थयाग्नि पद वेदी, सूर्यपद वेदी,कार्तिकेय पद वेदी, इंद्रपद वेदी अगस्तपद वेदी,कानवनपद वेदी, चंद्रपद वेदी ,गणेशपद वेदी,काचपद वेदी,मातंगपद वेदी, कश्यपपद वेदी, गजकर्ण पद वेदी, गयाद्रष्टा वेदी और गयाकूप वेदी परिसर के आस पास विष्णुपद क्षेत्र में दक्षिणाग्निपद वेदी, गार्ह्यपत्याग्नि पद वेदी,दखिनमानस सूर्य कुंड, उदीची कुंड,कनखल, विष्णु मंदिर के पास फल्गु नदी के तट पर जिह्वाल नामक वेदी आदि पवित्र वेदियां स्थित है। इन अन्य वेदियों के बारे में कम ही जानकारी आम जन को सुलभ हैं और केवल अति महत्व पूर्ण वेदियों में पूजन अर्चन और तर्पण का विधान किया जा सकता है।
2.फल्गु (निरंजना) नदी :-
कहा गया है की फल्गु नदी भगवान विष्णु के दाहिने अंगूठे के स्पर्श से होकर गुजरती हैं, इस वजह से फल्गु नदी के पानी के केवल स्पर्श से पूर्वजों की मुक्ति की राह खुल जाती हैं।देवघाट से पितामहेश्वर तक यह अति पवित्र वेदी स्थित है। फल्गु नदी के तट पर स्थित यह स्थान पितरों के मोक्ष के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।जिस फल्गु नदी को मोक्षदायिनी गंगा से भी पवित्र माना गया, वह गया धाम में अपने अस्तित्व के लिए ही जूझती मिली । सीता के श्राप ने फल्गु को अंतः सलीला (सतह के नीचे से बहने वाली) बना दिया, लेकिन फिर उसी फल्गु को गंगा से भी पवित्र माना गया। यही फल्गु नदी बोधगया में निरंजना के नाम से जानी गयी है।
वर्तमान समय में इस नदी के डाउन स्ट्रीम पर बांध बन जाने से नदी भरी हुई मिलती है और पूजन अर्चन नदी के वेदी पर ना होकर राज्य सरकार द्वारा निर्मित कराए पक्के प्लेटफॉर्म पर सम्पन्न हो रहा है। यहां पर आई भीड़ का उत्साह देखते ही बनता है। सुरक्षा की व्यवस्था बहुत ही उत्तम है जिसमें स्थानीय पुलिस और आर्मी के जवान व्यवस्था बनाए देखे जा सकते हैं।
फल्गु नदी के आसपास की वेदियां
पितामहेश्वर मोहल्ला में उत्तरमानस वेदी
सीताकुंड फल्गु नदी के तट पर (पूर्व दिशा में) देवघाट के सामने स्थित है। फल्गु नदी के तट पर (पूर्व दिशा में) देवघाट के सामने रामगया वेदी स्थित है ।
3.प्रेत शिला मंदिर :-
प्रेतशिला गया शहर से लगभग 8 किमी उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित है। प्रेतशिला को भूतों का पहाड़ कहा जाता है। अकाल मृत्यु से परलोक सिधारने वाले गया जी में स्थित मुख्य वेदियों में से एक प्रेतशिला पिंडवेदी में निवास करते हैं।यहां अकाल मृत्यु से मरने वालों के निमित पिंडदान से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।वह अपने वंंश परिवार को आशीर्वाद देते हैं।
यह हिंदूओं का एक पवित्र स्थान हैं, जहां वे पिंड दान (दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए एक धार्मिक अनुष्ठान) करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और लोगों का मानना है कि इस स्थान पर पिंडदान करने के बाद आत्मा को मोक्ष मिलता है। नारद पुराण में है इसका वर्णन गया की प्रमुख वेदी प्रेतशिला शहर के पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित प्रेतगिरि पहाड़ी पर है। यहां तिल मिश्रित सत्तु के पिंडदान की विशेष महत्ता है। इस पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक पहुंचने के लिए 380 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। इसी पहाड़ी के नीचे ब्रह्मकुंड है, जहां कभी यात्रियों के लिए बने चार विश्रामालय बने हुए हैं। यह स्थल पहले तीर्थयात्रियों से भरा रहता था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, यहां की पड़ाही पर मृत्यु के देवता भगवान यम को समर्पित एक मंदिर है। मंदिर का निर्माण शुरू में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था लेकिन इसका कई बार जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर के पास रामकुंड नामक एक तालाब देखा जा सकता है। माना जाता है कि भगवान राम ने एक बार इसमें स्नान किया था।
यह गया शहर के उत्तर-पश्चिम में स्थित एक पर्वत है जिसके ऊपर प्रेतशिला वेदी है। यह स्थान गया शहर से लगभग 10 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित है। पहुंचने के लिए 676 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, लेकिन जो लोग चढ़ नहीं पाते हैं, वे डोली का सहारा लेते हैं। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष मिलता है और वे प्रेत योनि से मुक्त होते हैं, खासकर अकाल मृत्यु वाले लोगों की आत्माओं को मुक्ति मिलती है।आश्विन कृष्ण प्रतिपदा को प्रेतशिला पिण्ड दान करने का विधान है। प्रेतशिला को भूतों का पहाड़ कहा जाता है।अकाल मृत्यु से परलोक सिधारने वाले गयाजी स्थित मुख्य वेदियों में से एक प्रेतशिला पिंडवेदी में निवास करते हैं।
पितरों की आत्मा को मिलती है मुक्ति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रेतशिला पिंड वेदी पर श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को तुरंत मुक्ति मिल जाती है और उन्हें भटकना नहीं पड़ता है. यहां पर एक बहुत बड़ी चट्टान है. जिसका संबंध परलोक से माना जाता है। गरुड़ पुराण की कथा के अनुसार इस शिला की दरारों से पितरों का आगमन होता है।वह पिंड ग्रहण करके अपने लोक वापस लौट जाते हैं. इस पर्वत की चोटी पर स्थित प्रेतशिला वेदी पर श्राद्ध करने से भूत-प्रेत योनी में भटकती आत्माओं को भी मुक्ति मिल जाती है।
ताली बजाकर लगाया जाता है ठहाका
कहा जाता है कि अकाल मृत्यु से मरने वाले पूर्वजों का प्रेतशिला की वेदी पर श्राद्ध और पिंडदान करने का विशेष महत्व है। पिंडदान के बाद यहां परिजन ताली बजाकर ठहाका लगाते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि अकाल मृत्यु के कारण किसी की मौत होती है, तो उनके घर में लोग रोते हैं। लेकिन प्रेतशिला में पिंडदान करने से उन्हें मोक्ष मिलती है और आज के दिन पितरों का द्वार खुला होता है। यही कारण है कि उनके परिजन तीन बार ताली बजाकर ठहाका लगाकर खुशी का इजहार करते हैं।
4.ब्रह्म कुंड:-
गयाजी में प्रेतशिला पहाड़ी के नीचे मारनपुर में ब्रह्म कुंड नामक वेदी है। ‘ब्रह्म कुंड वेदी’ प्रेतशिला पर्वत पर स्थित एक पवित्र स्थान है, जहाँ पितृपक्ष के दौरान पितरों को मोक्ष दिलाने के लिए श्राद्ध और पिंडदान किया जाता है। यह गयाजी की मुख्य पिंडवेदियों में से एक है। पितृपक्ष के दूसरे दिन प्रेतशिला पर ब्रह्मकुंड में स्नान-तर्पण कर पिंडदान करने का विधान है, जिसके बाद ऊपर जाकर पिंडवेदी पर सत्तू का पिंडदान किया जाता है।
5.अक्षय वट :- यह गया के मारनपुर एरिया में स्थित है। अक्षयवट वृक्ष को अंतिम क्रिया का स्थल माना गया है। अक्षयवट स्थित पिंडवेदी पर श्राद्धकर्म कर पंडित द्वारा दिए गए सफल रूप में संपन्न होने के बाद ही श्राद्धकर्म को पूर्ण या सफल माना जाता है।यह परंपरा त्रेता युग से ही चली आ रही है। इस वृक्ष को खुद भगवान ब्रह्मा ने स्वर्ग से लाकर रोपा था। इसके बाद मां सीता के आशीर्वाद से अक्षयवट की महिमा विख्यात हो गई। सीता जी द्वारा पिण्ड दान करने पर पंडा, फल्गु नदी, गाय और केतकी फूल ने झूठ बोल दिया परंतु अक्षयवट ने सत्यवादिता का परिचय देते हुए माता की लाज रख ली।अक्षयवट के निकट भोजन करने का भी अपना अलग महत्व है। अक्षयवट के पास पूर्वजों को दिए गए भोजन का फल कभी समाप्त नहीं होता।
6.गदालोल वेदी:-
अक्षयवट के सामने गदालोल वेदी स्थित है। गदालोल-लोल शब्द का अर्थ तालाब होता हैं।इस वेदी की कहानी है कि यहां गदा नाम का असुर पुराकाल में वज्र से दृढ़ तपस्वी एवं दान वीर था।देव कार्य के लिए ब्रह्माजी के मांगने पर उसने अपनी अस्थियां भी दान में दे दी थीं। उन्ही अस्थियों से विश्वकर्मा जी ने गदा बना स्वर्ग में रख दिया।उसी काल मे हेति नाम का दैत्य बड़ा बलवान हुआ, उसने देवताओं को जीत कर स्वर्ग का राज्य छीन लिया। दैत्य हेति को मारकर राज्य दिलाने की विनती देवताओं ने भगवान विष्णु से की।
भगवान ने कहा कि हमे कोई ऐसा अस्त्र दो, जिससे उसे हम मार सके, क्योंकि उसने वरदान पा लिया है कि हम वर्तमान किसी अस्त्र से नहीं मरेंगे। तब देवताओं ने स्वर्ग में रखी वही गदा दे दी, भगवान ने उसी गदा से हेति को मार दिया. इसके बाद जिस स्थान पर वह गदा धोया गया, उसे गदालोल वेदी कहा गया है। गदाधर करने से भगवान भी “ गदाधर” नाम से प्रसिद्ध हुए।इस गदालोल वेदी में पिंडदान करने से तथा स्वर्ण पिवत्रीदान करने से पितरों को सदगति होती है।
7.सीता कुण्ड गया :-
सीताकुंड विष्णुपद मंदिर के ठीक विपरीत दिशा में स्थित है। सांस्कृतिक दृष्टि से इस कुंड का विशेष महत्व है। इस कुंड को लेकर ऐसा कहा जाता है कि 14 वर्ष के लिए वनवास जाते समय सीता माता ने इसी कुंड में स्नान किया था। इसी वजह से इस कुंड का नाम सीता कुंड पड़ा। सीता कुंड, गया में स्थित एक पवित्र जलस्रोत है, जो माता सीता की तपस्या और पवित्रता से जुड़ा हुआ है। यह स्थल धार्मिक आस्था का केंद्र है और यहाँ मकर संक्रांति व रामनवमी जैसे पर्वों पर विशेष स्नान का महत्व माना जाता है। कुंड के पास एक छोटा मंदिर भी स्थित है, जहाँ श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं।सीता कुंड का जल आज भी साफ़ और निर्मल बना हुआ है, जिसे आस्था के साथ पिया और संग्रहित किया जाता है। आसपास का प्राकृतिक वातावरण इसे और अधिक आध्यात्मिक बनाता है।
8.धर्मारण्य वेदी, गया:-
निरंजना के तट पर स्थित पीपल के वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी ।धर्मारण्य पिंडवेदी है, यहां श्राद्ध करने से विभिन्न बाधाओं से मुक्ति मिलती है, पितरों को प्रेतयोनि से मुक्ति मिलती है. चाहे किसी की आत्मा भटक रही हो, या किसी का परिवार विभिन्न रोगों से ग्रसित हो या फिर संतान ना हो, शादी ना हो रही हो, या फिर अन्य कोई भी बाधा हो, अगर लोग यहां पिंडदान करते हैं तो उन्हें उक्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है, साथ ही पितरों का उद्धार होता है. इस वेदी पर श्राद्ध कर्मकांड करने से पितरों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है. महाभारत काल में स्वयं युधिष्ठिर ने भी अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए यहां पिंडदान किया था. इसलिए इस पिंडवेदी का बहुत ही महत्व है. यह स्थान पर पिंडदान व तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है इसलिए इस पवित्र स्थान को मोक्ष स्थली भी कहा जाता है। माना जाता है कि यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश के अलावा सभी देवी-देवता विराजमान हैं। गया का महत्व इसी से पता चलता है कि यहां फल्गु नदी के तट पर राजा दशरथ की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध कर्म और पिंडदान किया गया था। वायु पुराण, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण में भी गया शहर का वर्णन किया गया है।
कालांतर से चली आ रही तर्पण व पिंडदान की प्रक्रिया पावन भूमि गया के आसपास स्थित पिंडवेदियों पर आज भी जारी है। स्कंद पुराण के अनुसार, महाभारत के युद्ध के दौरान मारे गए लोगों की आत्मा की शांति और पश्चाताप के लिए धर्मराज युधिष्ठिर ने धर्मारण्य पिंडवेदी पर पिंडदान किया था। हिंदू संस्कारों में पंचतीर्थ वेदी में धर्मारण्य वेदी की गणना की जाती है। माना जाता है कि धर्मारण्य पिंडवेदी पर पिंडदान और त्रिपिंडी श्राद्ध का विशेष महत्व है। यहां किए गए पिंडदान व त्रिपिंडी श्राद्ध से प्रेतबाधा से मुक्ति मिलती है और सभी पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।
9.बोधगया :-
मुख्य शहर से थोड़ी दूर पर स्थित बोधगया में पीपल के पेड़ (जिसे बाद में बोधि वृक्ष का नाम मिला) के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई । पुराने शहर के पास बहती फल्गु नदी के किनारे हर साल पितृपक्ष के 15 दिनों में लाखों लोग गया तीर्थ की धरती पर अपने पितरों का पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करके उनके मोक्ष की कामना करते हैं । पितृपक्ष के परे भी यह सिलसिला साल भर चलता ही रहता है । ज्ञान और मोक्ष के इसी संगम ने गया को मुक्तिधाम बना दिया । यह बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ज्ञान का सागर है और हिन्दू धर्म को मानने वालों के लिए मोक्ष का द्वार है ।गया तीर्थ में पिंडदान के लिए सिर्फ फल्गु नदी का किनारा ही नहीं है, बल्कि ऐसी कई सारी वेदियाँ हैं, जहाँ पिंडदान और श्राद्ध के कार्यक्रम विधि पूर्वक संपन्न होते हैं ।
आस पास की अन्य वेदियां
बोधगया रोड पर अम्बा गाँव के पूर्वी भाग में शारस्वती वेदी स्थित है। बोधगया में
मातंगवापी वेदी, धर्मार्णय वेदी और बोधितारु वेदी स्थित है।
10.मंगला गौरी मंदिर गया:-
मंगला गौरी मंदिर 15वीं सदी में बना है। यह देवी सती को समर्पित 52 महाशक्तिपीठों में गिना जाता है, जहां देवी सती के शरीर के अंग गिरे थे। यह मंदिर पहाड़ी पर विराजमान है। मंगला गौरी मंदिर बिहार के गया जिले में, भस्मकूट पर्वत पर स्थित एक प्रमुख शक्ति पीठ है, जहाँ सती माता का वक्षस्थल गिरा था और यह महाशक्ति पीठों में से एक माना जाता है. यह मंदिर दया की देवी माता मंगला गौरी को समर्पित है।
11.भीम गया वेदी मंगलागौरी मंदिर के पास स्थित है।भीम गया वेदी गया में पितरों के पिंडदान का एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहां महाभारत काल में महाबली भीम ने अपने पिता के मोक्ष के लिए पिंडदान किया था। ऐसा माना जाता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को मुक्ति मिलती है और इस वेदी के पास आज भी भीम के घुटने का निशान देखा जाता है। यह स्थान गया जी धाम की मुख्य वेदियों में से एक है, और पितृपक्ष के तेरहवें दिन यहां पिंडदान करने का विधान है।
मंगला गौरी को समर्पित अन्य वेदियां
गोदावरी वेदी:- मंगलागौरी के रास्ते पर
स्थित है।
आम्रसेचन वेदी:मंगलागौरी मंदिर के पास स्थित है।
तारकबराहम: मंगलागौरी मंदिर के पास स्थित है।
12.गौ प्रचार वेदी
मंगलागौरी मन्दिर के पास स्थित है।मंगला गौरी मंदिर के मुख्य रास्ता से भीम गया वेदी अक्षयवट वाले रास्ते मे गौप्रचार वेदी है. यहां ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया था.
उन्होंने यहां यज्ञ के दौरान गायों को जिस पर्वत पर रखा था, उसे गौचर वेदी कहा गया. यहां पर्वत पर गायों के खुर के निशान आज भी हैं, यहां ब्रह्मा जी पंडा को सवा लाख गौ दान किया था. ऐसी मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से पितरों को विष्णुलोक की प्राप्ति होती हैं. मान्यता हैं यहां ब्राह्मण को भोजन कराने से एक करोड़ ब्राह्मण भोजन कराने का फल मिलता है।जहां पिंडदान किया जाता है। गौप्रचार वेदी एक धर्मशिला पर स्थित है। जहां काफी संख्या में गाय के पैर का निशान है। धर्मशिला के पास पिंडदानी बैठक कर्मकांड करते है। वहीं चबूतरे में भी बैठक कर कर्मकांड किया जाता है।
13.गदालोल वेदी
अक्षयवट के सामने गदालोल वेदी स्थित है, जहां पिंडदान किया जाता है। गदालोल-लोल शब्द का अर्थ तालाब होता हैं. इस वेदी की कहानी है कि यहां गदा नाम का असुर पुराकाल में वज्र से दृढ़ तपस्वी एवं दान वीर था. देव कार्य के लिए ब्रह्माजी के मांगने पर उसने अपनी अस्थियां भी दान में दे दी थीं. उन्ही अस्थियों से विश्वकर्मा जी ने गदा बना स्वर्ग में रख दिया.उसी काल मे हेति नाम का दैत्य बड़ा बलवान हुआ, उसने देवताओं को जीत कर स्वर्ग का राज्य छीन लिया. दैत्य हेति को मारकर राज्य दिलाने की विनती देवताओं ने भगवान विष्णु से की.
भगवान ने कहा कि हमे कोई ऐसा अस्त्र दो, जिससे उसे हम मार सके, क्योंकि उसने वरदान पा लिया है कि हम वर्तमान किसी अस्त्र से नहीं मरेंगे. तब देवताओं ने स्वर्ग में रखी वही गदा दे दी, भगवान ने उसी गदा से हेति को मार दिया. इसके बाद जिस स्थान पर वह गदा धोया गया, उसे गदालोल वेदी कहा गया है. गदाधर करने से भगवान भी गदाधर नाम से प्रसिद्ध हुए.
14.भीम शिला वेदी
अक्षय वट के सामने भीमशिला वेदी स्थित है।भीम गया वेदी मंगलागौरी मंदिर से पूर्वी दिशा में स्थित है। मंदिर जाने रास्ते पर दाहिने तरफ स्थित है। जहां भीमसेन को घुटना का निशान है। क्योंकि घुटना के बल बैठक कर्मकांड किया था। वहीं गौप्रचार वेदी मंदिर पश्चिमी दिशा में स्थित है। पिंडवेदी में एक धर्मशिला में स्थित है। धर्मशिला पर गाय कई पैर का निशान है। जहां पिंडदान किया जाता है।
15.राम शिला पहाड़ी गया :-
रामशिला वेदी भी पिंडदानियों के लिए विशेष स्थान रखती है। मान्यता है कि यहीं भगवान राम ने पिंडदान किया था।
रामशिला पहाड़ी बिहार के गया जिले में स्थित एक प्राचीन और पवित्र स्थल है,
रामशीला पंचायती अखाड़े के पास स्थित है।जहां भगवान राम से जुड़ी मान्यताएं हैं और यह धार्मिक पर्यटन का एक महत्वपूर्ण केंद्र है. यह पहाड़ी अपने मनमोहक नजारों और हरियाली के लिए भी जानी जाती है, जो इसे एक लोकप्रिय स्थल बनाती है।
16.कागबली वेदी
काकवाली: रामशीला पहाड़ी के पास मारन पुर में स्थित है। गया में कागबली वेदी पितृपक्ष के दौरान पिंडदान और तर्पण के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है, जहाँ पितरों की आत्माओं को प्रेत बाधा से मुक्ति दिलाने और उन्हें तृप्त करने के लिए कौआ, कुत्ते और गाय को भोजन रूपी पिंड अर्पित किया जाता है। यह वेदी ब्रह्मसरोवर तीर्थ के पास स्थित है और यहाँ पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस वेदी पर यमराज के दूत माने जाने वाले कौआ, कुत्ता और गाय को पिंड के रूप में भोजन दिया जाता है, जिससे यमराज का क्रोध शांत होता है और पितृ तृप्त होते हैं। मान्यताओं के अनुसार, कागबली वेदी पर पिंडदान करने से पितरों को प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है। पितृपक्ष के दौरान इस वेदी पर पिंडदान करने से पितरों की आत्माएं तृप्त होती हैं और उन्हें बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है, जहाँ वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं।
17.मुंडपृष्ठा वेदी पर बैठे थे भगवान विष्णु
कार्सिली पहाड़ी पर मुंड पृष्ठा वेदी स्थित है।मान्यता है कि मुंड पृष्ठा पिंड वेदी पर भगवान विष्णु धर्मशिला को स्थिर करने के लिए बैठे थे. इस स्थान पर भगवान नारायण के गजाधर रूप में बैठने को लेकर पास में ही आदि गया पिंडवेदी के रूप में है. इन वेदियों पर पिंडदान और चांदी की वस्तु के दान से पितरों को विष्णुलोक की प्राप्ति हो जाती है.
गया जी के कुछ अन्य वेदियों की सूची
18.आदि गया वेदी यह वेदी कार्सिली पहाड़ी पर स्थित है। आदि गया और धौतपद में खोए या तिल गुड़ से पिंडदान करने का विधान है. यहां चांदी की वस्तु के दान करने की भी परंपरा है।
19.धौतपद वेदी यह वेदी गया दक्षिण द्वार पर स्थित है ।धौतपद में खोए या तिल गुड़ से पिंडदान करने का विधान है. यहां चांदी की वस्तु के दान करने की भी परंपरा है।
20.गायत्री घाट ब्राह्मणी घाट के पास
फल्गु नदी के तट पर देवघाट से उतर में स्थित प्राचीन गायत्री घाट जीर्णशीर्ण हालत में था। तीर्थयात्री तो तीर्थयात्री स्थानीय लोगों को भी इस घाट के बारे में पता नहीं था। जबकि इस घाट पर मां तारा का एक प्राचीन मंदिर और एक छोटा सा कमरा बना हुआ था। जो देखने से ही प्रतीत होता था कि कई सौ साल पहले इसका निर्माण हुआ होगाछतीसगढ़ के सिवरी नारायण के निवासी संतोष सुल्तानिया ने अपने पिता स्व. राधे श्याम सुल्तानिया के स्मृति में इस घाट का पुर्ननिर्माण कराया। निर्माण में घाट, सीढ़ी, ग्रिल, छत का निर्माण शामिल है। पंडा गणेश लाल भैया ने बताया कि तीन माह का समय इस निर्माण कार्य में लगा है। तथा पांच लाख रुपये इस पर व्यय हुए हैं। श्रद्धालु, तीर्थयात्री द्वारा एक सार्थक कार्य किया गया है। क्योंकि यह घाट की प्रसिद्धि नाना-नानी के श्राद्ध के लिए विशेष फलदायी मानी गई है। अब पुर्ननिर्माण से इस स्थल पर एक साथ 60 से 70 लोग पिंडादान का कार्य कर सकेंगे। और एक ऐसा घाट जो अपने अस्तित्व के मिटने के कगार पर था। पुर्न निर्माण से जीवंत हो गया है।
गया जी के सरोबर/तालाबों की सूची
गया जी के पास निम्न सरोबर/तालाब ब्रह्मा जी के द्वारा निर्मित हैं।
1.ब्रह्म सरोवर
ब्रह्म सरोवर तीर्थ में तर्पण-पिंडदान के बाद ब्रह्मा जी के यज्ञयूप की प्रदक्षिणा एवं पितृमुक्ति हेतु समीप में स्थित काकबलि वेदी पर काले उरद की बलि होती है। ब्रह्म सरोवर में ब्रह्मा जी ने यज्ञ के अंत में अवमृथ स्नान किया था। स्नान के बाद यज्ञ काष्ठ श्राद्ध के पांचवे दिवस है में इस तिथि को ब्रह्म सरोवर तीर्थ में तर्पण-पिंडदान के बाद ब्रह्मा जी के यज्ञयूप की प्रदक्षिणा एवं पितृमुक्ति हेतु समीप में स्थित काकबलि वेदी पर काले उरद की बलि होती है।ब्रह्म सरोवर में ब्रह्मा जी ने यज्ञ के अंत में अवमृथ स्नान किया था। स्नान के बाद यज्ञ काष्ठ को यज्ञयूप के रूप में स्थापित करना यज्ञ की एक विधि है। उसकी प्रदक्षिणा से श्राद्ध कर्ता को अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। साथ ही एक आम्रवृक्ष उत्पन्न हुआ था। समीप में पश्चिम उत्तर कोण पर इसका वृक्षारोपण ब्रह्मा ने किया। वृक्ष की जड़ में कुशा के सहारे जलाधारा देने से पितर मुक्त हो जाते हैं। इसके बाद पितृतारक ब्रह्मा का दर्शन किया जाता है। ब्रह्मा की मूर्ति पुष्कर तीर्थ के अलावा एक मात्र गया तीर्थ में है। इनको तारक ब्रह्म कहा जाता है। इनके दर्शन नमस्कार से पितर तर जाते हैं।
गया धाम में यज्ञ करने की बेला में अपने शरीर से ब्रह्मा ने उक्त ब्रह्म मूर्ति को उत्पन्न किया था। गय असुर के सिर भाग का परिमाण ब्रह्म सरोवर से ही प्रारंभ होता है। इसका सिर ब्रह्म सरोवर से उत्तर मानस तक दक्षिण-उत्तर में व्याप्त है। नागकूट पर्वत (सीता कुंड) से मंगलागौरी (भष्मकुट पर्वत) तक इसका सिर भाग पूर्व-पश्चिम में व्याप्त है। गय असुर के सिर का भाग को फल्गु तीर्थ भी कहते हैं। फल्गु तीर्थ क्षेत्र में गया श्राद्ध की सर्वाधिक वेदियां हैं।
शहर के दक्षिणी क्षेत्र में ब्रह्मसरोवर स्थित है. पितृपक्ष मेले की चतुर्थी तिथि को यहां पिंडदान, श्राद्ध कर्म व तर्पण का विधान बतलाया गया है. इस सरोवर में पिंडदान व तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं के पितरों का उद्धार होता है और उनको बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है. कुछ वर्ष पहले इस सरोवर का केंद्र सरकार की हृदय योजना से जीर्णोद्धार कराया गया है. वर्तमान में इस सरोवर की स्थिति शहर के अन्य सरोवरों से बेहतर है. इस योजना के तहत लोगों को आकर्षित करने के लिए यहां लाइट एंड साउंड के अत्याधुनिक सिस्टम लगाए गए हैं.
2.वैतरणी सरोवर
शहर के दक्षिणी क्षेत्र में वैतरणी सरोवर स्थित है. 17 दिवसीय पितृपक्ष मेले की चतुर्दशी तिथि को यहां कर्मकांड का विधान बताया गया है. वैतरणी सरोवर में गोदान व तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं के पितरों को भवसागर की प्राप्ति होती है. उनके लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल जाते हैं. हृदय योजना से इस सरोवर का भी जीर्णोद्धार कराया गया है.
3.रुक्मिणी तालाब
शहर के दक्षिणी क्षेत्र स्थित अक्षयवट वेदी के पास रुक्मिणी सरोवर स्थित है. अक्षयवट वेदी पर भीड़ अधिक रहने से श्रद्धालु इस सरोवर में आकर पिंडदान, श्राद्ध व तर्पण का कर्मकांड करते हैं. इस स्थल पर कर्मकांड करने वाले श्रद्धालुओं के पितरों को अक्षयवट वेदी पर कर्मकांड करने जैसे फल की प्राप्ति होती है, वह यहां भी मिलती है.
4.सूर्यकुंड
विष्णुपद मंदिर के पास सूर्यकुंड (दक्षिण मानस) सरोवर स्थित है. 17 दिवसीय पितृपक्ष मेले के तीसरे दिन यहां कर्मकांड का विधान है. जानकारों के अनुसार सूर्यकुंड सरोवर में तर्पण करने वाले तीर्थयात्रियों के पितरों को सूर्य लोक की प्राप्ति होती है. पितृपक्ष मेले के मुख्य क्षेत्र में स्थित होने से यह सरोवर साल भर साफ-सुथरा रहता है.
5.पितामहेश्वर घाट
यह एक नाले के रूप में ही लोग जानते हैं जब कि किसी समय यह तर्पण स्थल के रूप में प्रयुक्त होता था है। जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार को इस स्थल तक श्रद्धालुओं की पहुंच और व्यापक प्रचार प्रसार करना चाहिए।
पिता महेश्वर नाला जिला स्कूल के पास से निकलता है, जो श्याम भर्थआर गली, उत्तर मानस अड्डा होते हुए पिता महेश्वर घाट के पास नदी में गिर जाता है। नाले की लंबाई करीब आधा किलोमीटर है। उक्त मोहल्लों की नालियों का पानी भी इसी नाले के जरिए नदी में आकर गिर रहा है।
6.उत्तर मानस सरोवर
शहर के मध्य क्षेत्र में फल्गु नदी के तट पर उत्तर मानस सरोवर स्थित है. 17 दिवसीय पितृपक्ष मेले की द्वितीया तिथि को यहां भी पिंडदान व तर्पण का विधान बताया गया है. वायु पुराण में भी इस सरोवर की चर्चा है. इस सरोवर में तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं के पितरों को जन्म-मरण यानी जीवन चक्र से छुटकारा मिल जाता है.
7.ब्रह्म कुंड:-
शहर से करीब आठ किलोमीटर दूर उत्तर दिशा में ब्रह्मकुंड स्थित है. पितृपक्ष मेले की द्वितीया तिथि को यहां पिंडदान व तर्पण का विधान है. ब्रह्मकुंड पिंडदान से पितरों को प्रेतयोनि से मुक्ति मिलती है.
8.राम कुंड :-
शहर के उत्तरी क्षेत्र में रामशिला पहाड़ के पास रामकुंड स्थित है. यहां पितृपक्ष मेले की द्वितीया तिथि को पिंडदान व तर्पण का विधान है. रामकुंड में पिंडदान व तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं के पितरों को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है.
9.गोदावरी सरोवर
शहर के दक्षिणी क्षेत्र स्थित गोदावरी सरोवर है. गोदावरी सरोवर से जुड़ी हैं कई कथाएं हैं। गोदावरी सरोवर में प्राचीन काल से पिंडदान का विधान है. यहां कई कथाएं जुड़ी है. बताया जाता है, कि यहां स्वयं ब्रह्मा जी आए थे. ऐसी कई धार्मिक मान्यताओं को लेकर यहां पुनपुन में नहीं जाने वाले तीर्थ यात्रियों के लिए गोदावरी सरोवर पर पिंडदान का विधान है.
10.गया कूप :-
पुराणों के अनुसार गया कूप का विशेष महत्व है। कहा गया है कि गंभीर पाप करने वाले भी यहां स्नान और भस्म से मुक्ति पा सकते हैं।
तीर्थ पण्डो का दण्ड के रूप में भारी जुर्माना :-
इस यात्रा में गृह जनपद का पंडा यात्रा के व्यवस्था का एक माध्यम होता है जिनकी मिली भगत से गया तीर्थ का पंडा यात्री से अपने माता- पिता की मुक्ति और उद्धार के लिए भारी रकम का दण्ड लगवाते है और जबरन संकल्प करवाते हैं। मुझसे भी एक भारी रकम का संकल्प कराकर मन खिन्न कर दिया गया। आने वाले लोग या तो इस प्रकार के उगाही के लिए मन तैयार रखें या इन तत्वों से सावधान रहें।
लेखक परिचय:-
(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। लेखक इस समय पितृ तर्पण चारों धाम की यात्रा पर गया जी में ही है।)
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