Homeहिन्दी जगतभारतीय भाषाओं में शिक्षा ही देश की असली ताकत,भारत को फिर विश्व...

भारतीय भाषाओं में शिक्षा ही देश की असली ताकत,भारत को फिर विश्व गुरु बनाने का संकल्प

सुशील कुमार मिश्र/वाराणसी। भाषावार प्रांतों में विभाजित होने के बावजूद भारत की आत्मा एक है— यही संदेश कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सूत्र में पिरोने वाले भारतीय भाषा समागम–2025 में गूंजा। शनिवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में भारतीय भाषा समागम–2025 का आयोजन किया गया। थीम था। पंच प्रण : स्वभाषा और विकसित भारत। कार्यक्रम का शुभारंभ अपरान्ह दो बजे हुआ। इस भव्य आयोजन में देशभर की भाषाओं, बोलियों और लोकसंस्कृतियों की रंगारंग छटा बिखरी। कार्यक्रम की अध्यक्षता भालचंद्र मार्डीकर ने की। संचालन सम्पादक जितेंद्र तिवारी ने किया। स्वागत निदेशक प्रदीप मधोक ‘बाबा’ ने किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जम्मू कश्मीर के उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना की आत्मा है। भारतीय भाषाएं ही देश की एकता की सशक्त कड़ी हैं, जो हमें विविधता में भी एकता का बोध कराती हैं। उन्होंने बताया कि भारत की सांस्कृतिक विरासत की जड़ें वेदों और पुराणों में निहित हैं, जिनका उद्गमस्थान (वाराणसी) मानी जाती है। काशी को वेदों और पुराणों के अनुसार धरती का पहला और अंतिम नगर कहा गया है, जहां से भारतीय भाषाओं की आवाज पूरे देश में गूंजती रही है। इस समागम का उद्देश्य देश की भाषाई विविधता को सम्मान देना और नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा के प्रति गौरव बोध कराना है।

मुख्य वक्ता आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक व शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के राष्ट्रीय सचिव शिक्षाविद् अतुल भाई कोठारी ने भारतीय भाषाओं के संरक्षण, प्रचार और उनके माध्यम से देश की सांस्कृतिक एकता बनाए रखने पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि मातृभूमि और मातृभाषा का कोई विकल्प नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं में शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और साहित्य का प्रचार देश की परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखता है। उन्होंने विशेष रूप से यह बताया कि अनुवाद का कार्य केवल साहित्य को साझा करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों के बीच संवाद और समझ को बढ़ाने का भी जरिया है। कोठारी ने स्वतंत्रता संग्राम और समाजिक आंदोलनों में भारतीय भाषाओं की भूमिका पर भी प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि देश की आज़ादी और समाज सुधार के आंदोलनों में भारतीय भाषाओं ने लोगों को जागरूक करने और देशभक्ति की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह बच्चों के समग्र विकास और राष्ट्रीय पहचान के निर्माण के लिए आवश्यक है। अतुल भाई कोठारी ने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों से आग्रह किया कि वे अपनी भाषाओं का सम्मान करें, उनका प्रचार-प्रसार करें और देश की एकात्मता को बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाएं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय भाषाओं में तकनीकी और शैक्षणिक सामग्री का विकास आवश्यक है ताकि युवा पीढ़ी अपनी मातृभाषा में आधुनिक ज्ञान तक पहुंच सके।

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने कहा कि 75 साल बाद भारत विश्व के आधुनिक देशों में शामिल क्यों नहीं हुआ उसका सबसे बड़ा कारण एक ही है। हम मातृभाषा में शिक्षा देने में सक्षम नहीं हो पाए। प्रधानमंत्री मोदी का प्रयास है कि शिक्षा मातृभाषा में ही दी जाए। जब भाषाएं उन्नति करेंगी तभी भारत उन्नति करेगा। जब तक हम पुस्तकें अपनी भाषा में उपलब्ध नहीं कराएंगे तब तक देश की उन्नति स्वप्न ही बना रहेगा।

देश को स्व का बोध कराएगा नई शिक्षानीति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि नई शिक्षा नीति भावी पीढ़ियों को दिशा देगी। देश को स्व का बोध कराएगा। उन्होंने भारतीय भाषाओं की आवाज हिन्दुस्थान समाचार की भूमिका की चर्चा की। कहा कि 1948 में जब इसकी स्थापना हुई थी, तब ये बीज था। आज वट वृक्ष बनकर हम सबको छाया दे रहा है। दिशा दिखा रहा है। भारतीय भाषाओं के विकास के हिंदी का भी विकास होगा। इससे देश की समरसता बढ़ेगी। एक भारत—श्रेष्ठ भारत की संकल्पना एकाकार होगी। 22 भारतीय भाषाओं के विद्वानों को मिला भारतीय भाषा सम्मान से सम्मानित किया गया।

चित्रः हिंदी के क्षेत्र में योगदान के लिए जम्मू – कश्मीर के उपराज्यपाल मा. मनोज सिन्हा जी के करकमलों द्वारा वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक, डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ को भारतीय भाषा सम्मान – 2025 प्रदान किया गया।

वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई
vaishwikhindisammelan@gmail.com

spot_img
RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -

वार त्यौहार