यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि हिन्दू समाज के साथ 1947 के बाद जो सबसे निर्णायक अन्याय किये गये उनके प्रति न तो किसी विचारक का ध्यान है, न ही किसी बड़े राष्ट्रीय नेता का, और न ही धर्म क्षेत्र की किसी विभूति का। इस काल प्रवाह ही कहा जायेगा। अन्यथा जिस प्रकार राजनीति में नरेन्द्र मोदी जी की टीम के आने से अनेक निर्णायक परिवर्तन हुए है, उसी प्रकार धर्म क्षेत्र की कोई बड़ी विभूति यदि सौभाग्यवश महाकाल की कृपा से आ जाये तो हिन्दू समाज की शेष समस्याएं भी सरलता से दूर हो जायेगी।
इस विषय में विचारक या बौद्धिक के आने से या होने से कोई भी प्रभाव नहीं पड़ने वाला क्योंकि किसी भी स्वतंत्र बौद्धिक को न तो कोई राजनेता महत्व देते और न ही धर्म की विभूतियाँ। स्वाभाविक है कि राजनेता तो उसी को पूछेगें जो उनकी पार्टी का हो। धर्म क्षेत्र की विभूतियां स्वतंत्र और श्रेष्ठ विचारक या बौद्धिक को अर्थात जिसे परम्परा की भाषा में श्रेष्ठ ब्राह्मण कहा जाता था, उसको उचित ध्यान दे सकती है।
परन्तु कुछ ऐसा हो गया है कि राजनेताओं की ही नकल में धर्म क्षेत्र की विभूतियां भी स्वयं राजनैतिक एवं राष्ट्रीय विषय में भी, उन विषयों का विस्तृत ज्ञान न होने पर भी, अपने ही अभिमत को महत्व देती है। ऐसी स्थिति में श्रेष्ठ विचारक को पार्टियों के दायरे के बाहर और धार्मिक विभूतियों के प्रभाव क्षेत्र के बाहर या उससे स्वतंत्र कतिपय प्रबुद्ध लोग महत्व दे सकते है परन्तु राष्ट्र के संदर्भ में ऐसे महत्व की कोई प्रभाव’शाली या निर्णायक भूमिका कभी नहीं होती।
मुख्य घटना जो घटित हुई है, वह हिन्दू समाज की करोड़ो, या लाखों या हजारों (जिसकी जैसी श्रद्धा हो) वर्षों से जो सर्वज्ञात और सर्वमान्य इकाइयां रही है और उनके सर्वमान्य अधिकार रहे है, उन सब इकाइयों के सभी अधिकारों को ईसाई मिशनरियों और यूरोपीय राजनेताओं की प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रेरणा से समाप्त कर दिया गया।
जो काम ब्रिटिश शासकीय अधिकारी करना चाहते थे परन्तु कर नहीं पा रहे थे, वह इंग्लैण्ड की ’शिक्षा और ज्ञान परम्परा से अभिभूत राजनेताओं ने कुछ तो संविधान सभा के द्वारा कर दिया और शेष प्र’शासनिक आदेशों और कदमों के द्वारा कर दिया। इसके साथ ही एक ऐसा नया काम किया गया, जो अंग्रेज सोच भी नहीं सकते थे।
हिन्दू समाज को वि’व के अन्य समाजों से तुलना किये बगैर दुनिया का सबसे खराब समाज मान कर उसकी सभी इकाइयों को विधि के स्तर पर अवैध करार दिया गया और प्रोपेगडा के स्तर पर इस तथ्य को छिपाया गया। जो कथित समाज सुधारक हुए, गांधी, अम्बेडकर आदि सभी, वे इंग्लैण्ड में ही ज्ञान प्राप्त कर उस ज्ञान को ही मूल मानने वाले थे।
उनमें गांधी सर्वाधिक भारतीय थे परन्तु वे न तो धर्म क्षेत्र के महात्मा थे और न ही शीर्ष बौद्धिक। वे केवल राजनेता थे, और उन्होंने राजनैतिक दृष्टि से कथित समाज सुधार चलाये। उनमें लोकमान्य बालगंगाधर तिलक जैसा ज्ञान भी नहीं था और दृष्टि भी नहीं थी। इसलिए वे यह देख नहीं पाये कि समाज या लोक या जन के सामाजिक जीवन को नियंत्रित करने की शक्ति राज्य को देना और राज्य को केवल राजनैतिक व्यक्तियों के नियंत्रण में सौंप देना तथा समाज की अन्य इकाइयों का राज्य की राजनैतिक शक्ति और निर्णय के तंत्र पर कोई भी अधिकार नहीं होना समाज को नष्ट कर डालने का उपाय है।
परिणाम यह हुआ कि ये सारे ही नेता किस्म के समाज सुधारक ईसाई मिशनरियों और यूरोपीय लेखकों के द्वारा हिन्दू समाज पर लगाये गये आरोपों को तथ्य मानकर उनसे हिन्दू समाज को मुक्त करने में लग गये, इनमें से किसी ने भी न तो हिन्दू धर्म शास्त्रों का कोई अध्ययन किया, न ही समाज की इकाइयों की गतिशीलता और कार्य पद्धति के मूल में कार्यरत सिद्धांत और अध्यात्म को समझा।
अतः वे सब मूल को छोड़कर शाखाओं पर ही ध्यान देने लगे। इस स्थिति को फायदा उठाकर अंग्रेजों शासकों ने जाते-जाते सत्ता का हस्तांतरण ऐसे व्यक्ति को करना उचित समझा जिसे हिन्दू समाज की कोई भी समझ न हो और उस समझ में रूचि भी न हो तथा यूरोपीय मतवादों के प्रति प्रचण्ड आवेगों से जो प्रेताविष्ट हो। इसके बाद का काम सब अंग्रेजों को और उनके द्वारा प्रशिक्षित एवं दीक्षित प्रशासकों को ही करना था।
उन्होंने वह किया। कोई भी कथित हिन्दू संगठन और धर्म के आचार्य उधर ध्यान नहीं दे पाये। हिन्दू समाज की सभी इकाइयों को शक्तिविहीन कर दिया गया। कुल को शक्तिहीन करके उसके सदस्य व्यक्तियों को अर्थात वयस्क व्यक्तियों को राष्ट्र की स्वतंत्र आधारभूत इकाई की विधिक मान्यता दी गई।
इससे कुल का विधिक अस्तित्व समाप्त हो गया। केवल उसकी देह या भौतिक रूप बचा। कुल की परम्परा जैसी कोई चीज ’शिक्षा का अंग नहीं रह गयी। अतः वह सामाजिक मान्यता का भी अंग नहीं रह गई। केवल निजी अंहकार का अंग ही रह गई। कुल के मुखिया के कर्तव्य तो पिटी हुई लीक पर बचे रहे, परन्तु उनके अधिकारों की कोई विधिक मान्यता नहीं रही और उसका कोई सामाजिक संदर्भ भी नहीं बचा।
सम्पत्ति सदा से कुलों की ही मानी जाती रही है। अब देश की सारी सम्पत्ति कानूनी रूप से राज्य की मान ली गई और राज्य के कर्ताधर्ताओं ने यह जान कर कि हिन्दू एक योद्धा समाज है और वह सार्वजनिक रूप से इस तथ्य की घोषणा करने वाले शासकों को मिलकर मार डालेगा, इस तथ्य को पूरी तरह छिपा लिया और स्वयं को राष्ट्र के सेवक के रूप में प्रचारित करते हुए उस राष्ट्र भावना का भयंकर दुरुपयोग किया जो, बाहरी अजनबी आततायी अंग्रेजों को मार भगाने के लिए क्रांतिकारियों और मनीषियों ने जगाई थी।
मानों उनके सभी पुण्य और तप को नये शासक खा गये और उसी भक्षण से पुष्ट होने लगे। इस महापाप को छिपाने के लिए शिक्षा पूरी तरह इन शासकों ने अपने अधीन कर ली, और ’शिक्षा तथा संचार माध्यमों के द्वारा हिन्दुओं को पूरी तरह बरगलाने और बदलने लगे तथा उन्हें हिन्दू धर्म से रहित करने के लिए अनेक कदम उठाये।
परिणाम यह हुआ कि कुल तो शक्तिहीन हो गये, परन्तु हज+ारों साल की स्मृति बनी रहने के कारण कुल समूहों का संगठन जाति के नाम से वोट के समय ‘मोविलाईज’ किया जाने लगा।
इस वोट की राजनीति में जाति केवल वोट जुटाने का एक संकेतक या प्रतीक या ध्वज जैसा बन गयी। जाति के इतिहास, संस्कार, गौरव और पूजा परम्पराओं तथा आस्थाओं और मान्यताओं को उपहास या उपेक्षा का विषय बना दिया, परन्तु एक उत्तेजक संम्मिलन बिन्दु के रूप में जाति अधिकाधिक महत्व पाती गई।
विशेषकर मानविकी अनुशासन में ’शिक्षा के नाम पर मुख्यतः यूरोपीय विचारों को और कुछ सीमा तक मुस्लिम विचारों को पढ़ाया जाने लगा और यह पाप सरकार के द्वारा तथा सरकार के नियंत्रण में राष्ट्रव्यापी बना दिया गया।
जीवन दर्शन और जीवन वैविध्य के आधार जो हमारे सम्प्रदाय थे, उनके पास जो अपनी-अपनी सम्पत्तियां थी वे भी शासकीय नियंत्रण में आ गई और वातावरण ऐसा हो गया कि मठ और सम्प्रदाय भी उन पर प्रभुत्व पाये हुए लोगों के लिए गौरव और राजनैतिक मोलतोल की चीज हो गये। उनकी अपनी ज्ञान परम्पर कहीं-कहीं ही बच रही।
जाति पंचायतें, ग्राम पंचायतें, खाप पंचायतें अवैध हो गई। अजीब सी कानूनी छीना झपटी के अडडों के रूप में अंग्रेंजी ढ़ंग के न्यायालय आ गये, जो ‘एग्लों सेक्शन लॉ’ के अनुसार और उनके ही सिस्टम के अनुसार निर्णय लेने लगे। कुलों की और सम्प्रदायों की अपनी परम्परा की थी कोई विधिक हैसियत नहीं रहीं।
परम्परा से श्रेणियां, निगम और संघ ये व्यापारियों और ’शिल्पकारों के संघ होते थे जो स्वयं सनातन धर्म के शास्त्रों के अनुसार चलते थे और उसी के अनुसार वाद का निर्णय भी होता था। अब वे सब भी अवैध हो गये।
न्यायिक निर्णय में ’शिष्ट जनों और ’शिष्ट परिषदों की निर्णायक भूमिका थी। अब वे सब भी अवैध हो गये। परम्परा केवल निरर्थक बहसबाजी की चीज बच रही। उसका पालन सुनिश्चित करने वाली किसी भी संस्था- कुल, सम्प्रदाय, श्रेणी, पंचायत और ’शिष्ट परिषद – की कोई वैधता नहीं रहीं।
ऐसे में व्यवहार परम्परा और संस्कार परम्परा के केवल अवशेष बच रहे और सरकार द्वारा नियंत्रित ’शिक्षा के द्वारा उनको भी गलत, अन्यायपूर्ण, पिछड़ा, हास्यास्पद बताया जाने लगा। वे व्यवहार का आधार नहीं बचे।
ऐसी स्थिति में समाज का व्यवहार स्तर गिरना अनिवार्य ही था। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में वे विविध संगठन जो हिन्दू एकता आदि की या वैदिक संस्कृति आदि की बातें कर रहे थे, और जो पूर्व में अपने संस्थापकों के समय, उस समय स्वाभाविक ही बहुत महत्वपूर्ण थे, इतनी बड़ी और निर्णायक घटनाओं के प्रति अनजान या अंधे बन जाने के कारण अप्रासंगिक होते चले गये, क्योंकि जनगण के संस्कार, व्यवहार, वि’वास, जीवन लक्ष्य और मान्यताओं के निर्धारण में उनकी भूमिका शासन के द्वारा अत्यधिक सीमित बना दी गई, और यह वे कमजोर नेतृत्व के कारण देख ही नहीं पाये।
आज भी इस विराट तथ्य का संज्ञान लेने वाले लोग कम ही दिखते है परन्तु सामाजिक व्यवहार में तो इसके परिणाम हो ही रहे है। हम देखते है कि प्रारंभ में अर्थात 1960-65 तक नेताओं के आपसी व्यवहार और उनका शील हिन्दू संस्कारों की निरंतरता वाला था। इसीलिए उनके व्यवहार सुसंस्कृत और मर्यादित होते थे।
अस्तेय को धर्म और स्तेय को पाप मानने के संस्कारों के कारण आर्थिक भ्रष्टाचार भी बहुत ही कम था और उतने कम भ्रष्टाचार की भी सर्वत्र निदा होती थी।
हम सब जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, नरेन्द्र देव आदि के आपसी व्यवहार और शील को जानते ही है।
साथ ही आज नरेन्द्र मोदी और अमित शाह जैसे श्रेष्ठ और मर्यादित राजपुरूषों के साथ राहुल गांधी आदि का जो उद्दंड व्यवहार तथा भीषण भ्रष्टाचार एवं देशहित की पूर्ण अवेहलना देखते है। यह समाज की शक्ति के विलोप का परिणाम है।
समाज की या लोक और जन की आधारभूत इकाइयों को अवैध बना देने का परिणाम है। परन्तु इस तथ्य की ओर किसी का ध्यान नहीं है। एक प्रकार से सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एक कुल परम्पराविहीन, शील विहीन, प्रज्ञाविहीन, परम्पराविहीन, लज्जाविहीन, और शास्त्रविहीन बना डालने के विषय में सभी प्रमुख राजनैतिक दलों में व्यवहार के स्तर पर सर्वानुमति सी है क्योंकि वे इन आधारभूत बातों पर तो विचार ही नहीं करते।
सब का संदर्भ मुसलमान और ईसाई समुदाय बन गये है। परन्तु अगर वे हमारे संदर्भ है तो जिस प्रकार विविध ईसाई चर्चों में शताब्दियों तक एक-दूसरे को मारा-काटा, लूटा-खसोटा, जलाया और भूना तथा खूनी खेल खेला और पै’ााचिक कर्म किये, वे हिन्दू समाज की भी नियति होने ही वाले है।
इसी प्रकार आज भी विविध मुस्लिम समुदाय परस्पर जो खूनी खेल खेलते है, एक दूसरे को खा डालने, और नष्ट कर डालने में गर्व के साथ अल्लाह की दुहाई देते हुए भिडे रहते है, वहीं नियति तो हमारी भी होगी।
परन्तु इन तथ्यों पर विचार करने वाले राजनेता या धर्म क्षेत्र की विभूतियां अगर महाकाल की कृपा से सामने आ जाये तो सारी समस्याओं का समाधान उसी प्रकार हो जायेगा जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा और अर्थ क्षेत्र में मोदी जी के आने से समाधान हो गया है।
(लेखक दर्शन, राजनीति, इतिहास पर 25 पुस्तकें लिख चुके हैं, ऐतिहासिक व अध्यात्मिक विषयों शोधपूर्ण लेखन करते हैं)

