Homeपुस्तक चर्चा“उपाध्याय इस्टेट” के चंद्रिका प्रसाद का युग

“उपाध्याय इस्टेट” के चंद्रिका प्रसाद का युग

चन्द्रिका प्रसाद वंश के प्रतिष्ठित व्यक्ति

पोखरनी के लाल रूपेन्द्र नारायण के उत्तराधिकारी लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण सिंह थे। ये कुश्ती के बड़े शौकीन थे।  इनके समकालीन चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय जी थे। लाल भूपेंद्र प्रताप नारायण और चंद्रिका प्रसाद दोनों पहलवान थे और प्रायः दोनों में कुश्तियां होती रहती है।

महराज राम की पहली पत्नी का निधन होने के बाद उन्होंने 1903 में दूसरा विवाह बच्छीपुर अमोढा में किया था, जिनसे 1908 में चंद्रिका प्रसाद जी का जन्म हुआ था। चन्द्रिका प्रसाद इस वंश के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे जो एक अच्छे पहलवान थे लेकिन अपने भाइयों की इज्जत भरत और राम की तरह करते थे। बस्ती के हर नामी पहलवान चन्द्रिका प्रसाद को अवश्य जानते थे। जिले के सबसे तगड़े पहलवान बन्धू पांडे और टिकोरी पाडे से चन्द्रिका प्रसाद का खूब बैठती थी । पुलिस दरोगा से भी इनकी बैठती थी। ये पोखरनी राज घराने से काफी समादृत थे। राजा भूपेन्द्र नारायण इनके समकालीन थे। इसलिये राजा के यहाँ इनकी बैठक चलती रहती थी।

एक बार रमवापुर के अवधू पाठक पहलवान पंचमी के दिन राजा पोखरनी के यहां आये। गायन चल रहा था। अवधू पहलवान 6 फुट के तगडे जवान थे। उनकी बड़ी-बड़ी काली-काली मूछें पृथ्वीराज और राणाप्रताप की मूछों के समान थी। राजा साहब के अपने बैठके  में आल्हा सुन रहे थे। पास में पुददुन पहलवान, जो क्षेत्र के सबसे तगड़े पहलवान थे , बैठे हुए थे। अवधू पाठक ने कहा पहलवान आज पंचमी है। हम आप जरा दरबार में कुछ देर अपनी अपनी कुस्ती का कौशल दिखा दे। इस समय अवधू की अवस्था 30 वर्ष और पुदुन की अवस्था 50 थी । वे जवार के नये पहलवानो के उस्ताद थे।

राजा भूपेन्द्र नारायण अवधू पहलवान की बात सुन रहे थे। वे पुदुन से बोले-  “क्या बात है पहलवान ?” पुदुन कुछ बोलने में देर किये तब तक चन्द्रिका प्रसाद जी कहा, “पाठक जी ! उस्ताद को जाने दें। आज हम आप कुछ दिखा दें।” राजा साहब बोल उठे, “उपाध्याय ठीक कह रहे हैं। जवान से जवान की कलाकारी अच्छी होगी।”

फिर क्या था चार बजे का समय था। कुछ देर बाद आल्हा बन्द हो गया। अवधू पाठक बिगड़े भैंसे के समान लंगोट पहनकर आ गये और बोले, “चन्द्रिका बाबु आओ, आज खुलकर जोड़ हो जाय।” चन्द्रिका प्रसाद कम तगड़े नहीं थे जैसे के अखाडे में आये जवार के लोगों ने करतल बजाकर स्वागत किया। दोनों का हाथ मिलाना राजा जनक के धनुष के समान किसी ने देखा ही नहीं कि चन्द्रिका प्रसाद कब अवधू के सीने पर चित करके बैठ गये। राजा साहब ने चन्द्रिका प्रसाद को । कुर्ता और साफा भेंट किया ।

 महाराजराम की दूसरी पत्नी के इकलौते पुत्र चन्द्रिका प्रसाद का पालन पोषण एक राजपुत्र के समान हुआ था। यद्यपि केदार नाथ पहली माँ के चार पुत्रों के साथ महाराजराम के कम प्यारे नहीं थे किन्तु उनकी पत्नी अपने सभी पुत्रों का सम्मान करती थी। जिस समय चन्द्रिका प्रसाद का जन्म हुआ उस समय उनके भाई परमेश्वर नाथ के रामबरन व रामसुन्दर भी पैदा हो चुके थे । सासु की पुत्रवधूये उनका सम्मान करती थी। महाराजराम के आराम तलब होने के कारण परिवार के किसी की बच्चे की पढ़ाई उचित रूप से नहीं हो पाई थी। धीरे-धीरे एक बड़ा परिवार घर पर रहने लगा था, जिसके जीने का आधार खेती और जमीनदारी की वसूली ही थी।

केदारनाथ के समय में खेती का कार्य बहुत व्यवस्थित था। उपाध्याय वंश की तीनों पट्टी अपनी समृद्ध खेती से खुशहाल थी। केदारनाथ के नेतृत्व में चालीस परिवार के लोग सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में पल रहे थे। चन्द्रिका प्रसाद बाहरी कार्यों की देखरेख के अगुवा थे। वे प्रान्तीय रक्षा दल के मेम्बर भी थे। किसी पुलिस से कम नहीं थे। अपने समय में वे दस नये जवानों को अखाड़े में जोड़ कराते थे। उनके साथियों में रामरत्न पाण्डेय, रामबरन चौबे भरोश सिंह ,यमुना सिंह, पटेश्वरी सिंह, बंधू पाण्डेय, टिकोरी पाण्डेय, पं. श्याम सुन्दर प्रमुख थे। ये 1942 से कांग्रेस के मेम्बर थे और कृपाशंकर श्रीवास्तव, रामशंकर श्रीवास्तव, केशवदेव मालवीय के विधान सभा और लोक सभा के चुनावों में खूब भाग लेते थे।

 

फाग जुगीड़ा के दौरान साड़ को कब्जे में किया

सन् 1950 का वर्ष और फागुन का महीना था। फाग गाने वाले घूम-घूमकर गाँव के कोने-कोने में अपना आनन्द मना रहे थे। चन्द्रिका प्रसाद जी ढोल बजाने में बड़े प्रवीण थे। वे फाग जोगीड़ा और आल्हा की ढोल बहुत अच्छे ढंग से बजाते थे। एक बार राम मिलन उपाध्याय हथिया वाले जो ढोल के उस्ताद थे, सायंकाल आये हुए थे। उस दिन फाग और जोगीड़ा होना था। ढोल बजाने के लिये चन्द्रिकाप्रसाद तैयारी कर रहे थे। यह तय हुआ कि राम मिलन  जोगीड़ा और चन्द्रिका प्रसाद फाग की ढोल बजायेंगे। दोनों उस्तादों ने कार्यक्रम के संचालन का ठीका लिया। रामरत्न बाबा, भैया काका, ओरी खवास, देवकी नन्दन बाबा, बडडर बाबा, मगरु तेली की गोल फाग गाने आई हुई थी। चन्द्रिका प्रसाद ने तीन घण्टे तक फाग का गायन सम्पन्न किया। काका नम्बरदार, भगवती बाबा सिपाही आदि फाग गायन सुन रहे थे।  उस दिन बाबू जंगबहादुर उपाध्याय, बाबू राधेश्याम उपाध्याय, सत्यनारायण के खलिहान में सरसों कांट कर रक्खी थी। वे उसकी रखवाली कर रहे थे।

गाँव का और खड़ौवा खुर्द के लगभग डेढ़ सौ लोगों का जमावड़ा था। एक बिगड़ा साँड़ अक्सर लोगों को पीछाकर मार देता था कई लोग उसकी चोट से घायल हो चुके थे। रामनरेश जी का उसने पीछा किया वे दौड़ते चिल्लाते गाँव में पहुँचे। साड़ का पीछा किये। फाग गाने वाले लोगों ने साड़ को घेर लिया था। साड़ जैसे गली में घुसा तैसे चन्द्रिका प्रसाद जी ने पीछे से दौड़ कर उसका दोनों पिछला पैर पकड़ लिया। साड़ बहुत तगड़ा था वह बार-बार छुड़ाने की कोशिश कर रहा था। बाबू जगबहादुर जी ने कहा कि इसे आगे से सींघ में रस्सी लगाकर बाँध लिया जाय और इसे कब्जे में कर लिया जाय। दूर से तमाम लोग तौर तरीके बता रहे थे लेकिन साड़ के पास कोई नहीं जाना चाहता था। साड़ आगे बढ़ना चाहता था। चन्द्रिका प्रसाद ऐसा पकड़े थे कि उसके मुँह से फेन निकलने लगा। बाबू जंगबहादुर जी आगे से रस्सी लिये जैसे बाधना चाहे, साड़ उग्र रूप में हो गया। उन्होंने दोनों सींघ पकड़ा और गर्दन को ऐसा ऐठा कि वह जमीन पर गिर पड़ा। दोनों लोगों ने साड़ को काबू में कर लिया। किशोर अहिर और वंशू चौहान ने तुरन्त उसे सूजे से नाथ दिया और रामबरन और राम आसरे रमेश्वर कहांर की मदद से गर्दन और आगे से पाव में रस्सी लगा दिया। काबू में करके रातो-रात उसे मनवर नदी पार कराकर डारीडीह के सीवान में छोड़ दिया। सारे गाँव के लोग बहुत खुश हुये। चन्द्रिका प्रसाद जी इसी तरह से गाँव जवार के तमाम लोगों की मदद करते थे।

विकास और शान्ति के लिए प्रयासरत

पुलिस दरोगा से भी मिल कर गाँव के विकास और शान्ति व्यवस्था के प्रति जागरुक रहते थे। खेतों की कटाई, निराई, गुड़ाई के लिये मजदूरों आदि की व्यवस्था इन्हीं के ऊपर रहती थी। अपने भाइयों में सबसे छोटे थे। इसलिये केदारनाथ आदि इन्हें बहुत मानते थे।

-(सन्दर्भ: डा मुनि लाल उपाध्याय ‘सरस’ कृत “इतिवृत्त कथा” पृष्ठ 74,75 एवं 76)

 

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। वॉट्सप नं.+919412300183)

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