Homeहिन्दी जगतहिंदी का भविष्य रोमन से नहीं देवनागरी से है

हिंदी का भविष्य रोमन से नहीं देवनागरी से है

आज रोमन लिपि में हिन्दी की वकालत करने वाले यह नहीं जानते कि वे संविधान विरोधी बात कर रहे हैं। संविधान में जिसे राजभाषा कहा गया वह हिन्दी नहीं है, ‘देवनागरी लिपि में हिन्दी’ है। संविधान निर्माताओं की इस गहरी समझ के कारण मैं उनका संविधान की कई प्रत्यक्ष कमियों के बावजूद गहरा आदर करता हूँ।
देवनागरी लिपि और हिन्दी मानव इतिहास में भाषाई सिम्बायोसिस के सबसे गहरे उदाहरण हैं।
थियरी के हिसाब से भाषा और लिपि स्वतंत्र होते हैं एक दूसरे से। कि भाषा किसी भी लिपि में लिखी जा सकती है, लेकिन हिन्दी और देवनागरी दोनों का रिश्ता इतना अंतर्भूत है, ऐसे बुनियादी तरह से इन दोनों ने एक दूसरे के विकास, संरचना और सांस्कृतिक सार्थकता को प्रभावित किया है, कि इस थियरी को भी चुनौती मिल सकती है।
एक लिपि के रूप में नागरी का इतिहास हिन्दी से अधिक पुराना है। देवनागरी यदि किसी देव-नगर की है -अलकापुरी की है तो हिन्दी हिन्द की है।
मध्यकाल में पनपकर भी हिन्दी ने फारसी – अरबी जैसे विकल्पों को नहीं अपनाया तो इसलिए कि हिन्दी की बहुत-सी ध्वनियाँ उन लिपियों में थीं ही नहीं। देवनागरी का phonetic precision ही हिन्दी के मन भाया।
देवनागरी एक लिपि के रूप में भारत की देशजता और जड़ों को जैसे हृदयंगम करती थी वैसी क्षमता किसी विदेशी लिपि में नहीं थी।
उर्दू और हिन्दी दोनों पारस्परिक समझ की भाषिक अंतरंगता रखती थीं लेकिन हिन्दी को दरबार की जगह देवता से जुड़ना बेहतर लगा, इसलिए हिन्दी जन्म से ही जनता की भाषा बन गई। उर्दू ने फारसी अरबी लिपि को अपनाकर अपने युग की सत्ता की प्राथमिकताओं के सामने समर्पण किया जबकि हिन्दी ने देवनागरी लिपि को अपनाकर जन्म से ही एक विद्रोही चेतना का प्रतिनिधान किया।
अन्यथा सत्ता की लिपि के चुनाव में हमेशा एक बड़ी भूमिका होती है। जैसे पाकिस्तान में सिंधी का देवनागरी से रिश्ता टूट गया है। वहाँ सिंधी अरबी लिपि में लिखी जा रही है।
कई देशों ने राजनीतिक बदलावों के बीच भाषाओं को लिपि-निष्ठा का त्याग करते देखा है। तुर्की 1928 में अरबी लिपि से लैटिन में लिखी जाने लगी- अतातुर्क कमाल पाशा के दबाव में। जब सोवियत संघ के टुकडे हए तो मध्य एशिया के गणतंत्रों ने सिरिलिक विधि छोड़ दी और अपनी भाषाएँ लैटिन में लिखने लगे। जब वियतनाम में फ्रेंच शासन आया तो चीनी कैरेक्टर्स की जगह लैटिन आधारित स्क्रिप्ट ने ले ली।
हिन्दी ने न मध्यकालीन दरबार की लिपि ली और न औपनिवेशिक युग में रोमन लिपि के लिए कोई झुकाव दर्शाया। हिन्दी देवनागरी के अमृतगर्भ से जुड़ी रही।
यानी यह जुगलबंदी व्यावहारिक से कहीं ज्यादा आदर्शवादी और वैचारिक जुगलबंदी थी।
हिन्दी ने प्राचीन भारतीय सभ्यता से अपनी सांस्कृतिक निरन्तरता लिपि के रूप में देवनागरी को चुनकर सुनिश्चित की। देवनागरी को अपनी लिपि बनाकर हिन्दी ने एक विद्वत परंपरा और आध्यात्मिक वैधता सीधे प्राप्त कर ली।
विदेशी प्रभावों का, सत्ता के दबावों का निरसन कर उसने वह लिपि चुनी जिनके माध्यम से वह भारत के दूसरे भाषिक समुदायों के साथ जुड़कर एक कॉमन भारतीय अस्मिता का सह-निर्माण कर सकती थी।
यों लिपि भाषा से अपृथक्करणीय हो गई; सिर्फ एक लेखन प्रणाली की तरह नहीं बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक निष्ठा की निशानदेही की तरह।
तो सिर्फ यही नहीं कि फारसी-अरबी में retroflex sounds ट ठ ड ढ के लिए कोई dedicated letter नहीं था, या रोमन अंग्रेजी जैसी स्थिति नहीं थी कि जहां स्पेलिंग और उच्चारण बहुत ज्यादा ही फरक हो जाते हैं मसलन Though, through, tough, thought में ough एक ही स्पेलिंग के बावजूद अलग अलग उच्चारणों की तरह पायेंगे और ‘त’ के लिए वहाँ कोई अक्षर नहीं जबकि देवनागरी-हिन्दी में ध्वन्यात्मक संगति भरपूर है।
इसने भारतीय बच्चे की ध्वन्यात्मक चेतना के विकास में बहुत योग भी दिया। मनोभाषिकी psycholinguistics के शोध आज यही बताते हैं कि देवनागरी में हिन्दी पढ़ने वाले बच्चे phonemic awareness के बारे में अन्य लिपियों के बच्चों से बहुत आगे हैं और किसी भी लिखित शब्द को ज्यादा शुद्धता से उचार लेते हैं।
दुनिया भर में खा घा झा जैसे aspirated व्यंजन बहुत दुर्लभ हैं, हिन्दी में देवनागरी के कारण सहज हैं।
हिन्दी ने देवनागरी के बहुत से संस्कृत conjunts को सरलीकृत भी कर दिया। देवनागरी की शिरोरेखा को शिरोधार्य कर हिन्दी ने word boundaries को सहज रूप से मुखरित किया।
संस्कृत की ध्वनिसूचिका में नुक्ता नहीं होता था, फारसी- अरबी में उसका चलन था। हिन्दी देवनागरी ने उसे सहज ही अपना लिया।
हिन्दी ने देवनागरी को कम्युनिकेटिव वाइटेलिटी दी है, कंटेंपरेरी रेलीवेंस दी है और करोड़ों लोगों के दैनंदिन जीवन से जोड़ा है, देवनागरी ने हिन्दी को ध्वन्यात्मक स्पष्टता दी है, विजुअल ईस्थेटिक्स दी है और एक महान परंपरा का ऐतिहासिक नैरंतर्य दिया है।
अब जब व्हाट्सएप इंस्टाग्राम के 13 से 24 वर्ष के 68% हिन्दी यूज़र्स रोमन अल्फ़ाबेट्स का प्रयोग कर रहे हैं तब वे सिर्फ संविधान निर्माताओं की भावनाओं का ही उपहास नहीं कर रहे, हिन्दी-देवनागरी के इस ऐतिहासिक सांस्कृतिक गठबन्धन का भी उपहास कर रहे हैं।

(लेखक सेवानिवृत्त आएएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)

साभार- https://www.facebook.com/share/1bRbaecV3w/ से

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