जयपुर के प्राचीन गोविंददेवजी मन्दिर का यह शिलालेख बड़े काम की चीज है : वामपन्थी इतिहास के षड्यंत्र का भंडाफोड़ करता है ।
अर्थ
” 1577 ईस्वी का यह शिलालेख है, इसमें श्रीराम वंसज – कुर्मकुल -पृथ्वीनाथवंसज – ( श्रीविष्णु ) कुल में पैदा हुए भगवंतदास जी के प्रतापी पुत्र #महाराजधिराज_मानसिंह ने वृंदावन के इस गोविंददेवजी मंदिर का निर्माण करवाया । “
7 मंजिला यह मंदिर इतना भव्य था, की इसके यज्ञ की अग्नि आगरा के मुगलकिले तक दिखाई देती थी ।। यह मानसिंह का रुतबा था ।
इस शिलालेख से हमे इतिहास के एक महान घपले का पता चलता है । पहला तो यह, की अकबर के काल में अकबर भारत का राजा नही था, बल्कि मानसिंह भारत का राजा था । मानसिंह अगर भारत का राजा नही होते, आगरा से मात्र 70 किलोमीटर दूर ही शिलालेख गाड़कर खुद को ” महाराजधिराज ” नही कह पाते ।। आज इन उपाधियों का महत्व नही है, इनकी जगह प्रधामनंत्री, राष्ट्रपति आदि शब्द सम्मानित नामो की सूची में आ गए है, जिनका हम सार्वजनिक उपयोग या अपमान नही कर सकते । राज ओर शाही ( राजशाही ) काल मे #महाराजधिराज #राजा #रावल आदि शब्दो का महत्व काफी ज्यादा होता था ।। बिना भारत के राजा हुए अगर मानसिंह खुद को महाराजधिराज कह देते, तो खून की नदियां बह जाती ।। अतः अकबर ने भी यह स्वीकार कर लिया था, की मानसिंह ही भारत का राजा है ।।
अब हमारे इतिहास की विडम्बना यह है, की 18Th सदी के आसपास कोई इतिहासकार कर्नल टॉड जो न् अच्छे से भारत की भाषा समझता है, न् सांस्कृती, न् मजबूरियां, वह भारत का इतिहास लिखता है । उसमे वह मानसिंह की आलोचना करता है , अंग्रेजो का वही इतिहास फिर परम्परा ओर सत्य बन जाता है । कहावत है, झूठ को अगर बार बार – बार बार बोला जाए, तो वही सच लगने लगता है । यही हाल तो भारत के इतिहास का हुआ है । वरना क्या भारत मे एक हल्दीघाटी का युद्ध ही हुआ है ? इसके अलावा कोई युद्ध नही हुआ, जिसकी बातें भारत के इतिहास में होती ही नही है …. ओर हल्दीघाटी का युद्ध ही इसलिए बार बार आता है, क्यो की कर्नल टॉड उदयपुर के ही मेहमान थे, बाद के सारे इतिहासकार , जिनके दस्तावेज ही आज के इतिहास के प्रमाणिक दस्तावेज माने जाते है, चाहे श्यामलदास हो, या ओझा जी । यह सब कर्नल टॉड के शिष्य थे, ओर मेवाड़ की तनख्वाह लेने वाले इतिहासकार ।। इनका मेवाड़ के लिए सॉफ्ट कार्नर रहना स्वाभाविक है, लेकिन इसका यह अर्थ नही, की मेवाड़ के इतिहास के सम्मान में भारत के अन्य वीरो के इतिहास की तिलांजलि दे दी जाएं।
बात वहीं हल्दीघाटी पर आती है, क्या भारत मे एकमात्र महान युद्ध हल्दीघाटी ही है ?
क्यो जेता ओर कुम्पा के बलिदान ओर शौर्य की बात बार बार नही होती ? जिसके कारण विश्वशक्ति को कहना पड़ गया, इन दो शेरो के मुंह से बाजरा के दाना लेना भी मुश्किल है । ” एक मुट्ठी बाजरे के लिए में हिन्दुस्थान की सल्तनत खो बैठता । शेरशाह सूरी से अपने पराक्रम के बल पर यह कहलवाने जेता ओर कुम्पा के इतिहास की बात क्यो नही होती ?
क्यों नही बात होती आसाम के लासित वीरफोकन की, जिसने मुगलो को मारा था ?
क्यों नही बार बार बात होती मिहिरभोज, विग्रहराज चौहान , सूरजमल जाट, राजा सुहेलदेव के पराक्रम की ?
यह बात इसलिए नही हो सकती, क्यो की इन बातों से हिंदुओ का भला होता है । देश का बच्चा अगर अपना इतिहास ही जान लेगा, तो गुलामी की जंजीर नही तोड़ फेंकेंगा ? बाबासाहेब ने बिल्कुल सही कहा है, बाबासाहेब की बातें में आपसे कहना चाहता हूं –
” तोड़ दीजिये अपने सारे सभी पूर्वाग्रहों को की इतिहास ने किसको महान या ग़द्दार कहा है, अपने आप से तय करें, की इतिहास में महान या गद्दार कौन है ? क्यो की महान इतिहासकार P N ok ने कहा है, की ” भारत का इतिहास भारत के शत्रुओं द्वारा लिखा गया है ” ।अब शत्रु हमे भृमित नही करेंगे तो ओर क्या करेंगे ??
बार बार हल्दीघाटी की अगर बात से अगर मानसिंह का अपमान होता ही है, तो आज में आपको कहना चाहता हूं, की अगर मानसिंह हल्दीघाटी का युद्ध हार जाते, तो उस दिन हिन्दूधर्म ही हार जाता, अगर महाराणा प्रताप का वह भाला मानसिंह को लग जाता, तो फिर पूरी का जगन्नाथपुरी मंदिर नही बचता ।। अगर हल्दीघाटी के मैदान में मानसिंह हार जाता, तो गुजरात इस्लामिक सुल्तानों, जिसके कारण भद्रकाली अहमदाबाद बना पड़ा है, ओर चित्तौड़ माता कर्णावती के जोहर के साथ जला कुचला सा पड़ा है, उन गुजराती मुसलमान सुल्तानों से गुजरात को आजादी नही मिलती । द्वारिकाधीश मस्जिद से दुबारा मंदिर नही बनता ।।। क्यो की हल्दीघाटी के बाद मानसिंह ने भारत मे यही सब काम किये है । कोई हिंदुओ पर अत्याचार नही किये है, आप एक भी प्रमाण देवें, कहाँ मानसिंह के राज्य में किसी हिन्दू के साथ कोई अन्याय हुआ हो, या उसका किसी मुसलमान ने धर्म परिवर्तन करवाया हो ?
आज बिहार में मानसिंह के नाम पर गांव आजतक है, गयाजी के मस्जिद बने मंदिरो को दुबारा मानसिंह ने ही मंदिर बनवाया था । सूर्यमंदिर का पुनः उद्धार भी किया। यह सब कार्य मानसिंह ने हल्दीघाटी के बाद ही किए ।
जोधा को लेकर अपमानित करना भी गलत है, क्यो की जोधा का चर्चा जिसने छेड़ा , वह कर्नल टॉड स्वयं कन्फर्म नही, की जोधा जोधपुर की थी, या आमेर की ।। ऐसे इतिहास को हम प्रमाणिक क्यो मानें ?
ओर फिर भी अगर आप जोड़तोड़ करके साबित करते भी है, की आमेरवालो ने लड़कीं दी, भले ही पारसी हो, तब भी आमेर परिवार सम्मान के लायक है, न् की अपमान के लायक । क्यो की उनके इस निर्णय की वजह से हजारो लाखो लड़कियों की इज्जत आबरु बच गयी । एक राजा अगर अपना बलिदान देकर प्रजा की रक्षा कर ले, तो इससे बड़ी खुशी और आदर्श की बात ओर क्या हो सकती है ??
इस पोस्ट के अंत मे मैं यह कहना चाहता हूं, की मेरी पिछली पोस्ट में किसी ने कमेंट किया, मानसिंह कितने भी वीर हो, थे तो मुगलो के सेनापति ?
तो भैया सेनापति नही थे, सेनापति तो अकबर था, मानसिंहः तो राजा ही था, बस भारत के हिन्दू गद्दारों ने, आपने, हमने मिलकर मानसिंह को सेनापति ओर अकबर को राजा बना दिया ।। वरना 15-16th में तो मानसिंहः राजा ही हुआ करते थे ।
अब कर लेते हैं हल्दीघाटी की बात –
मेवाड़ की सेना ? 7000
गुजरात की पठान की सेना – 2 लाख
मालवा – लाखो पठान उपद्रवी
बंगाल की पठान षेण – 3 लाख, 200 एडवांस तोप, 40,000 घुड़सवार
अकबर – सैनिक लाख में , लेकिन हथियार बहुत एडवांस । अकबर का एक सैनिक आधुनिक हथियार लेकर 10 के बराबर ।
मानसिंह- 20000 सेनिक
ऐसी समीकरण भारत मे हो, तो आपका मित्र कौन होगा ? और हां इसमें आपके पास पठानो के पास जाने का ऑप्शन नही है, क्यो की पूरे भारत के पठान एक है और वह किसी कीमत पर मूर्तिपूजा नही होने देने की कसम खा चुके हैं …….

