Homeअध्यात्म गंगावैदिक वाँग्मय में गुरू का महत्व

वैदिक वाँग्मय में गुरू का महत्व

हमारी सनानत और वैदिक परंपरा में माना गया है कि ‘यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरु’ अर्थात जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी होनी चाहिए। बल्कि सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

श्री स्कान्दोत्तरखण्ड में उमामहेश्वर-संवाद के माध्यम से श्री गुरुगीता में गुरू की महिमा को विस्तार से बताया गया है।

गुरु गीता के रचयिता वेद व्यास हैं। वास्तव में यह स्कन्द पुराण का एक भाग है। इसमें कुल ३५२ श्लोक हैं। गुरु गीता में भगवान शिव और पार्वती का संवाद है जिसमें पार्वती भगवान शिव से गुरु और उसकी महत्ता की व्याख्या करने का अनुरोध करती हैं।

इसमें भगवान शंकर गुरु क्या है, उसका महत्व, गुरु की पूजा करने की विधि, गुरु गीता को पढने के लाभ आदि का वर्णन करते हैं। वह सद्गुरु कौन हो सकता है उसकी कैसी महिमा है। इसका वर्णन इस गुरुगीता में पूर्णता से हुआ है।

शिष्य की योग्यता, उसकी मर्यादा, व्यवहार, अनुशासन आदि को भी पूर्ण रूपेण दर्शाया गया है। ऐसे ही गुरु की शरण में जाने से शिष्य को पूर्णत्व प्राप्त होता है तथा वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है।


भवारण्यप्रविष्टस्य दिड्मोहभ्रान्तचेतसः |
येन सन्दर्शितः पन्थाः तस्मै श्रीगुरवे नमः ||

(गुरू गीता 41)


विद्या धनं बलं चैव तेषां भाग्यं निरर्थकम् |
येषां गुरुकृपा नास्ति अधो गच्छन्ति पार्वति ||

(गुरू गीता 149)


धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोदभवः |
धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता ||

(गुरू गीता 150)


गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरौ निष्ठा परं तपः |
गुरोः परतरं नास्ति त्रिवारं कथयामि ते ||

(गुरू गीता 152)


सर्वसन्देहसन्दोहनिर्मूलनविचक्षणः |
जन्ममृत्युभयघ्नो यः स गुरुः परमो मतः ||

(गुरू गीता 170)


भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः |
क्षीयन्ते सर्वकर्माणि गुरोः करुणया शिवे ||

(गुरू गीता 191)


सप्तकोटिमहामंत्राश्चित्तविभ्रंशकारकाः |
एक एव महामंत्रो गुरुरित्यक्षरद्वयम् ||

(गुरू गीता 203)


गुरुरेको जगत्सर्वं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् |
गुरोः परतरं नास्ति तस्मात्संपूजयेद् गुरुम् ||

(गुरू गीता 209)


ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः |
गुरोः समानतो नान्यत् साधनं गुरुमार्गिणाम् ||

(गुरू गीता 210)


मंत्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् |
स्मृतिवेदपुराणानां सारमेव न संशयः ||

(गुरू गीता 212)


गुरवो बहवः सन्ति शिष्यवित्तापहारकाः
दुर्लभः स गुरुर्लोके शिष्यचित्तापहारकः

समयोचितपद्यमालिका


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

(मूल मन्त्र — गुरु सत्त्व)


त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि।
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि।
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि।
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि।
साक्षाद् आत्माऽसि नित्यम्।


गुरुं ज्ञानमयम् लोकं तम: प्रदूषिताम्।
प्रकाशयन्तम् तं गुरुं प्रणमाम्यहम्॥


शरणागत दीनार्त परित्राता भव गुरु।
शरणं व्रजामि त्वां भगवन् प्रभो।


सर्वगुरु मंदिरं त्वं, सर्वविद्या रूपधाम।
नमोऽस्तु तव चरणयोः, यज्ञं तवोपमं हि॥


वेदगुरवे नमो वयं वदामोऽस्मि शान्तिप्रदम्।
विद्या सद्भाव प्रातुं तं गुरुं वन्दे सर्वदा नित्यम्॥


सर्वविद्यानां प्रभवोऽसि वेदगुरुः परमेश्वरः।
तव पादपंकजं सदा चरणकमले नमे नमः॥


विद्येयं वेदगुरोरं, जगद्भारं मुमुक्षुभिः।
प्रसादात् स्फुरतु ज्ञानं, तव तेजोऽमृतमयीं हि॥


गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै वेदगुरवे नमः॥


यः स गुरुर्न हि कश्चिद् द्वेष्टुमर्हति ज्ञानवित्।
वेदशास्त्रप्रकाशकं तं वेदगुरुं नमाम्यहम्॥


गुरु कृपया विना न जीवति जनः।
प्राप्ता विद्याः सर्वाः सदा तस्मै गुरवे नमः॥


गुरु दीनबंधुं करुणानिधिं विनयम्।
ज्ञानं चतुष्टयं प्रदाय किंकरः स्मरन्॥


गुरु कृपया प्रभवति ज्ञानसागरः।
सर्वत्र तेजोमयं धृतिः सम्यक्॥


यस्य कृपया प्रसादात् सर्वं ज्ञानं स्फुरति जनाः।
तं देवतारूपं गुरुमेव नमाम्यहम्॥


सर्वगुरवे नमः सदा।
यस्त्वां दत्तवान् ज्ञानं मम।
कृतज्ञोऽस्मि तव कृपया।
प्रणमामि तव चरणयोः॥


गुरुं वेद सर्वेशं जगद्वेदान्त कारणम्।
गुरवे वन्दे परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥


यत्प्रसादात्परमं पदं तत्प्रसादात् परमं पदम्।
तदेव विद्या तदेव ज्ञानं तदेव परमं पदम्॥

अर्थ:
गुरु की कृपा से प्राप्त उच्चतम स्थान ही विद्या है, वही ज्ञान है और वह परम स्थान है।

 

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