Homeहिन्दी जगतहिन्दी दिवस : मातृभाषा की शक्ति, संस्कृति का पुनर्जागरण

हिन्दी दिवस : मातृभाषा की शक्ति, संस्कृति का पुनर्जागरण

हिन्दी दिवस केवल भाषा का उत्सव नहीं है, यह आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का पर्व है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था—“मातृभाषा केवल भाषा नहीं, बल्कि संस्कृति और आत्मा का प्रवाह है।” सच तो यह है कि जिस समाज की भाषा जीवित और प्रखर रहती है, उसकी संस्कृति भी अक्षुण्ण और प्रगतिशील रहती है। भारत सौभाग्यशाली है कि यहाँ भाषाओं और बोलियों की बहुरंगी धारा प्रवाहित होती है—२२ संवैधानिक भाषाएँ, १२१ प्रमुख भाषाएँ और लगभग १९,५०० बोलियाँ हमारे सामाजिक जीवन का आधार हैं। यही अपार विविधता हमारी एकता को गहराई देती है और राष्ट्रीय जीवन को शक्ति प्रदान करती है। हिन्दी दिवस इस विविधता का उत्सव है और हमें स्मरण कराता है कि भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि आत्मा की ध्वनि और संस्कृति का स्वर है।

फिर भी यथार्थ यह है कि नई पीढ़ी अंग्रेज़ी और विदेशी भाषाओं को अवसर और प्रतिष्ठा का प्रतीक मानकर आगे बढ़ रही है। अपनी मातृभाषा से उनका लगाव घटता जा रहा है, और यही स्थिति सांस्कृतिक संकट का रूप ले रही है। भाषा और संस्कृति का रिश्ता शरीर और आत्मा के समान है—भाषा कमजोर होगी तो संस्कृति का रंग भी फीका पड़ जाएगा।

हिन्दी की वैज्ञानिकता उसकी स्पष्ट ध्वनि और सरल लिपि में छिपी है। जैसा लिखा जाता है, वैसा ही बोला जाता है—“फल” सदा “फल” ही रहेगा। यही सरलता बच्चों में आत्मविश्वास जगाती है। मनोविज्ञान सिद्ध करता है कि मातृभाषा में शिक्षा से बच्चों की स्मृति और समझ गहरी होती है। भारतीय सामाजिक अध्ययन संस्थान के एक अध्ययन ने पाया कि ग्रामीण भारत के पाँच से सोलह वर्ष के बच्चों में मातृभाषा आधारित शिक्षा से पठन और गणितीय क्षमता उल्लेखनीय रूप से बढ़ी। उत्तर प्रदेश के अनुभव भी यही दर्शाते हैं कि मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पढ़ने वाले बच्चे की शब्दावली तेज़ी से बढ़ती है, उनका आत्मविश्वास प्रबल होता है और कक्षा में उनकी सहभागिता बढ़ जाती है। ओडिशा का “नुआ अरुणिमा” कार्यक्रम इसका सशक्त उदाहरण है, जहाँ इक्कीस भाषाओं में तीन से छह वर्ष के बच्चों को मातृभाषा आधारित पाठ्यक्रम दिया जा रहा है। इसका परिणाम यह हुआ कि बच्चे अधिक सहज होकर सीखने लगे और शिक्षा उनके लिए आनंददायी बन गई। शोध यह भी बताता है कि भारत में लगभग पच्चीस प्रतिशत बच्चे तब गंभीर शैक्षिक असमानता से जूझते हैं, जब विद्यालय की भाषा उनके घर की भाषा से अलग होती है। संविधान के अनुच्छेद ३५० (क) में राज्यों का दायित्व तय है कि भाषाई अल्पसंख्यक बच्चों को प्राथमिक स्तर पर उनकी मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराई जाए, परन्तु वास्तविकता में इस दिशा में अभी भी कई बाधाएँ हैं।

ये सारे तथ्य एक ही सत्य को रेखांकित करते हैं —मातृभाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, आत्मविश्वास, सामाजिक समानता और सांस्कृतिक पहचान का आधार है। जब बच्चे उसी भाषा में पढ़ते हैं जिसे वे घर में सुनते और बोलते हैं, तो शिक्षा उनके लिए पराई नहीं लगती। वह पढ़ाई उनके आत्म-गौरव और आत्म-परिचय का स्रोत बनती है।

इस सन्दर्भ में यह स्मरणीय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति २०२० ने स्पष्ट अनुशंसा की है कि प्राथमिक स्तर की शिक्षा संभव हो तो मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में दी जाए। यही नीति भविष्य में बच्चों की नींव को मज़बूत करेगी, किन्तु चुनौतियाँ अभी शेष हैं। मातृभाषा का महत्व केवल शिक्षा तक सीमित नहीं ; यह हमारे मन की भावनाओं को आकार देती है। दादी की कहानियाँ, माँ की लोरी और लोकगीत केवल शब्द नहीं, बल्कि स्नेह और संस्कार के अनुभव हैं। त्योहारों का उल्लास भी तभी जीवंत होता है जब उसे अपनी भाषा में गुनगुनाया और समझा जाए। मातृभाषा वह सेतु है जो पीढ़ियों को जोड़ती है और जीवन को आत्मीयता से भर देती है। यही कारण है कि मातृभाषा संस्कृति की जड़ों को सींचने वाली अमिट धारा कही जाती है।

हिन्दी दिवस केवल भाषा का सम्मान नहीं, बल्कि साहित्य और संस्कृति की विरासत को सहेजने का भी अवसर है। हमारे महान ग्रंथ और कृतियाँ युवाओं के व्यक्तित्व निर्माण और राष्ट्रभावना को गहराई से प्रभावित करती हैं। “आनन्द मठ” वन्दे मातरम् से राष्ट्रभक्ति जगाता है, “भारत भारती” राष्ट्रीय चेतना का स्रोत है, “गीतांजलि” जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि देती है और “रामचरितमानस” नैतिक मूल्यों का विद्यालय है। पंचतंत्र व हितोपदेश बच्चों को नीति का मार्ग दिखाते हैं। प्रेमचंद की कहानियाँ—“ईदगाह”, “पूस की रात”, “नमक का दारोगा”, “दो बैलों की कथा” और “पंच परमेश्वर”—संवेदनशीलता, करुणा और जड़ों से जुड़ाव सिखाती हैं।

आज की पीढ़ी तकनीक की चमक में घिरी है। मोबाइल और इंटरनेट ने जीवन को सहज अवश्य बनाया है, पर मन की गहराइयों से संवेदनशीलता और संस्कृति का रिश्ता ढीला होता गया है। ऐसे समय में मातृभाषा और साहित्य ही संतुलन की वह ज्योति हैं, जो दिशा भी दिखाते हैं और आत्मा को ऊष्मा भी देते हैं। मातृभाषा आत्मविश्वास का बीज बोती है, साहित्य नैतिकता और राष्ट्रप्रेम का वृक्ष उगाता है, और कहानियाँ करुणा की नदी बहाती हैं। तेज़ गति, वैश्वीकरण और जीवन की आपाधापी में यही हमारी सबसे सुदृढ़ शरण है। यदि हम इन्हें संजोकर अगली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ, तो संस्कृति केवल जीवित ही नहीं रहेगी, बल्कि पुष्पित-पल्लवित भी होगी। हिन्दी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि भाषा ही पहचान है, और यही हमारी धरोहर तथा सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्राण है।

(लेखिका दंत चिकित्सक हैं तथा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं)

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