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बांग्लादेश में जान बचाने को हिंदू ने रखा मुस्लिम नाम, भारतीय पहचान छिपाकर पहुँचे एयरपोर्ट

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार अब चरम पर है। हाल ही में हिंदू युवक दीपू दास की बेरहमी से पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। अब चटगांव जिले में दो हिंदू परिवारों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, देश में उग्रवादी आंतकियों की तरह धर्म पूछ-पूछ हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं।

वहीं कई हिंदू परिवार बांग्लादेश में माहौल के डर से जान बचाकर किसी तरह भारत पहुँचे हैं। उन्होंने आपबीती सुनाते हुए बांग्लादेश में हिंसा के बीच अपने डर को जाहिर किया है। वह कहते हैं कि देश में जगह-जगह घूम रही इस्लामी भीड़ के चंगुल से निकलना काफी मुश्किल था।

तबला वादक मैनाक विश्वास 48 घंटे में पहुँचे भारत
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत पहुँचने वालों में एक नाम तबला वादक मैनाक विश्वास ढाका का है। वो बांग्लादेश में एक कार्यक्रम में शामिल होने अपने साथियों के साथ गए थे।लेकिन बिगड़ते हालात के बीच वो किसी तरह जान बचाकर निकले। उन्होंने बताया कि वे 48 घंटे की मशक्कत के बाद बांग्लादेश से भारत वापस लौटे हैं। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में हिंसक भीड़ के निशाने से बचने के लिए उन्हें हिंदू पहचान छिपानी पड़ी।

विश्वास ने एक इंटरव्यू में कहा, “मैं पहले भी कई बार बांग्लादेश जा चुका हूँ, लेकिन मैंने कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया। जहाँ स्थानीय लोगों के एक वर्ग के बीच तनाव और शत्रुता की भावना इतनी स्पष्ट रूप से महसूस की जा सके।” न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वास बताते हैं कि उन्हें हिंदू नाम बदलकर मुस्लिम नाम रखना पढ़ा।

सरोद वादक ने भारतीय पहचान छिपाकर बचाई जान
बांग्लादेश में हिंसा के बीच फँसे लोकप्रिय सरोद वादक शिराज अली खान भी भारत लौट आए। ढाका में उनकी संगीत कार्यक्रम में तोड़फोड़ हुई थी, जिसके बाद उनका कार्यक्रम रद्द हो गया था। वे शनिवार (20 दिसंबर 2025) को ही भारत लौटे हैं, जबकि उनका परिवार बांग्लादेश में फँसा रहा। परिवार सोमवार (22 दिसंबर 2025) को वापस लौटा है।

शिराज अली खान कहते हैं कि भारत लौटने के बाद भी बांग्लादेश में देखा भयावह मंजर का खौफ अब तक है। वह बताते हैं कि वे दो दिन तक होटल के कमरे में ही बंद रहे। अगर किसी वजह से बाहर निकलना भी पड़ता था तो वह यह सुनिश्चित करते कि उनकी भारतीय पहचान छिपी रहे। होटल से ढाका एयरपोर्ट आते हुए भी उन्होंने पासपोर्ट छिपा दिया और अपनी अम्मी से सीखी ‘ब्राह्णबाणिया’ की स्थानीय भाषा में बात की, जिससे किसी को शक न हो।

बांग्लादेश में हिंसा पर चिंता जताते हुए वह कहते हैं, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे अपनी पहचान छिपाकर भागना पड़ेगा। ढाका में कोई भी भारतीय सुरक्षित नहीं है।”

साभार- https://hindi.opindia.com/ से
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