चिंता चिता समान है। यह वाक्य न जाने हमने कितनी बार पढ़ा और दोहराया होगा लेकिन हर बार हम उसे अमल में ला पाए होंगे ही, ऐसा नहीं है। हमें शांत रहकर अपनी चिंताओं को तजना और अपनी ऊर्जा को बढ़ाना होगा तभी हम उन दुआओं, नेमतों को हासिल कर पाएँगे, जो हमारे लिए बरस रही हैं। गर्मी की चिलचिलाती धूप में हम हलकान होते हैं कि उफ़ कितनी गर्मी है लेकिन यदि हम जान जाएँगे कि यही तपन आगे वर्षा लेकर आएगी, बारिश आने से फसल लहलहाएँगी और हम खुशहाल होंगे तो उस उमस और गर्मी की उन झुलसाती सूर्य किरणों के भी हम शुक्रगुज़ार होंगे। हमें हर हाल में कल्पनाशील, स्वप्नदृष्टा और चमत्कारों पर भरोसा करने वाला बनना ही होगा।
शांति और प्रेम, अपने आपसे प्यार करना भी अपने सपनों की ओर खुद को ले जाने जैसा है। आत्म मुग्धता की बात नहीं हो रही बल्कि अपने प्रति सदाशयी बनना होगा। आपको अपने सपने चाहिए तो आपको शांति और खुशहाली को भी न्यौता देना होगा। कुदरत हमारे लिए कार्यरत रहती है, हमारे विरोध में नहीं। अपने आप पर विश्वास रखिए। विश्वास रखिए कि आपके सपने अवश्य साकार होंगे।
बड़े-बड़े सपनों को पूरा करने से पहले हममें से हर कोई कुछ मूलभूत इच्छाओं को पूरा होते देखना चाहता है जैसे मनोवैज्ञानिक सुकून, सुरक्षा, लगाव, सम्मान, रोटी, मकान, अपनेपन की ऊष्मा। इनकी पूर्ति हो जाने पर व्यक्ति आत्मबोध की दिशा में बढ़ता है। इन मूलभूत आवश्यकताओं को पहले-पहल पहचानने वाले मनोवैज्ञानिक थे अब्राहम मास्लो जिन्होंने आत्मबोध का सिद्धांत मनोविज्ञान की दृष्टि से दुनिया को दिया था।
आपकी रोटी-पानी की व्यवस्था हो जाए, आपकी मूलभूत शारीरिक आवश्यकताओं जैसे साँस लेने और सोने में कोई बाधा न हो, तो आप सुरक्षा के उपायों की ओर बढ़ सकते हैं। सुरक्षा मिल जाने पर शारीरिक आराम और आवास, रोज़गार और संपत्ति की चाह रहती है। इसके बाद उसे अपने करीबियों का साथ और प्यार ज़रूरी होता है, फिर बात आती है सामाजिक मान्यता और पूर्ति की तथा लगाव और लोगों द्वारा पसंद किए जाने की, शायद शारीरिक सुख और परिवार की। संतुष्टि, साथियों द्वारा स्वीकृति तथा दूसरों से मिलने वाला सम्मान इसके बाद की चाहतों में आता है। इन सबकी पूर्ति हो जाने पर व्यक्ति आत्म बोध की राह पर बढ़ता है।
आपमें जितनी प्रतिभा है उसका सही उपयोग करते हुए क्षमता की पूर्ति करना अपने यथार्थ को पहचानने जैसा है। आत्मबोध या आत्म साक्षात्कार जैसे शब्द बड़े क्लिष्ट लग सकते हैं लेकिन सेल्फ़ एक्चुलाइज़ेशन – Self Actualisation मनोवैज्ञानिक टर्म है, जिसके ज़रिए आप खुद को बेहतर तरीके से जान सकते हैं। इसे वास्तविकीकरण या वास्तविक रूप देना मान सकते हैं। मास्लो यह भी कहते हैं कि वास्तविक आत्मबोध की अवस्था तक पहुँचने वाले लोग समाज में बहुत कम हैं।
शोधार्थियों ने पाया है कि जब लोग अपने वास्तविक स्वभाव या क्षमताओं से अलग जीवन जीते हैं तो वे उन लोगों से बनिस्बत कम सुखी होते हैं, जिन्होंने अपने जीवन के लक्ष्यों को पा लिया है। आत्मबोध होने पर आपको अपनी काबलियत का पता चलता है। यह उन अनंत इच्छाओं को पूरा करने के स्वप्न की तरह भी है जो किसी को सपने देखने का माद्दा देती है। इससे किसी के जीवन को नहीं समझा जा सकता बल्कि उन इच्छाओं, प्रेरणाओं को जगाना होता है जो उसे महत्वाकांक्षी बना सकते हैं।
आपके साथ क्या ग़लत हुआ उस पर ज़ोर देने के बजाय मास्लो का सिद्धांत मानवीय क्षमताओं पर और उन्हें कैसे पूरा किया जाए इस पर ज़ोर देता है। बताइए हम किस बात से प्रेरित होते हैं?
मनुष्य होने के नाते हमारा जैविक संरचनात्मक गठन इस तरह का है कि हम विकास के लिए प्रेरित होते हैं न कि परास्त हो जाने के लिए। लोग परिपूर्णता चाहते हैं और व्यक्तिगत विकास के ज़रिए बदलाव चाहते हैं। अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करते हुए ही आप अपनी उच्च महत्वाकांक्षाओं के शिखर तक पहुँच सकते हैं।
आपका विकास कदम दर कदम, एक-एक सीढ़ी पार करते हुए ही हो सकता है। माना जाता है वयस्कों में से केवल एक प्रतिशत लोगों को यह आत्मबोध होता है कि वे जीवन से क्या पाना चाहते हैं और वे उसे पा सकते हैं। आम तौर पर आम लोग अधिकांश समय छोटी इच्छाओं को पूरा करने में उलझे रहते हैं और उच्च महत्वाकांक्षाओं के शिखर तक पहुँच ही नहीं पाते।
मास्लो की यह व्याख्या आधुनिक मनोविज्ञान में बहुतायत में प्रयुक्त होती है जब इसे किसी के व्यक्तित्व को समझने के लिए उपयोग में लाया जाता है। स्वस्थ, प्रेरित लोग अपने आपको कैसे देखते हैं इस पर आत्मबोध की व्याख्या टिकी है जो सिगमंड फ्रायड की अस्वस्थ एवं मानसिक रूप से उलझे लोगों के मनोवैज्ञानिक आचरण की व्याख्या से पूरी तरह अलग है।
जिन्हें आत्म बोध हो जाता है वे अपने आपमें परिपूर्ण होते हैं और हर उस काम को करते हैं जिसे करने में वे सक्षम हैं। हो सकता है किसी का आदर्श माँ बनने का ख़्वाब हो या कोई अच्छा खिलाड़ी बनना चाहता हो, कोई अच्छा चित्रकार या लेखक होना चाहता हो, मतलब यह कि हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है कि उसे क्या करने से आत्म बोध की अनुभूति होती है।
फिर आप अमीर हों या गरीब, लोकप्रिय हों या अनजान, शिक्षित हैं या नहीं उन सबसे इतना फ़र्क नहीं पड़ता यदि आपको अपने जीवन का सही उद्देश्य मिल गया हो। इस उद्देश्य का मिल जाना ही आत्मबोध है, जिसमें आप हर स्थिति का सही तरीके से ईमानदार आकलन कर पाते हैं।
मानवीय स्वभाव को नकारात्मक रूप से देखने के बजाय आत्मबोध उसके सही व्यक्तित्व को समझने में मददगार होता है जो इसे नकारता है कि व्यक्ति उस तरह से जीते रहने के लिए बाध्य है, जैसी उसकी परवरिश हुई है या कह लीजिए तनाव कम करते हुए अधिक सकारात्मक रवैया देता है।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार हैं और सामाजिक व सांस्कृतिक विषयों पर लेखन करती हैं)

