कैंब्रिज यूनिवर्सिटी ने खोला 400 साल पुराना राज़
ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे खूंखार दौर में जब पूरा देश अंग्रेजी की चपेट में था, तब तमिलनाडु के छोटे-छोटे गाँवों में एक गुप्त मिशन चल रहा था। नाम था उस मिशन का – “संस्कृत को जिंदा रखो, किसी को कानो-कान खबर न हो।”
कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. जोनाथन डूक्वेट ने पिछले साल तिरुविसैनल्लुर गाँव में एक घर की आलमारी खोली तो उनके हाथ काँप गए।
अंदर थीं हजारों ताड़-पत्र पांडुलिपियाँ – 1840 से 1890 तक की। और सबसे बड़ा झटका: अंग्रेजों के आने के 50-60 साल बाद भी यहाँ नई-नई संस्कृत किताबें लिखी जा रही थीं – प्रेम कविताएँ, दर्शन, कानूनी ग्रंथ, कविताएं, नाटक (यहां तक कि कामुक नाटक भी) और धर्मशास्त्र भी।
डॉक्टर डूक्वेट ने दावा किया: “हम सोचते थे कि 1799 में तंजावुर दरबार खत्म होते ही संस्कृत मर गई।
लेकिन सच ये है – वो मरी नहीं थी, वो छुप गई थी… गाँवों में।
और वहाँ वो और भी जोर-शोर से फल-फूल रही थी!”
शोध में पता चला:
तिरुविसैनल्लुर, तिरुवरूर, कुंभकोणम के आसपास कम से कम 25 गाँव ऐसे थे जहाँ अंग्रेजों का नाम तक नहीं पहुँचा था।
पंडित लोग दिन-रात नई किताबें लिख रहे थे।
आज भी उन परिवारों के घरों में एक स्थानीय बुजुर्ग ने हँसते हुए बताया, “अंग्रेज साहब शहर में बैठे थे, हम यहाँ बरगद के नीचे नाटक लिख रहे थे।
उन्हें पता ही नहीं चला कि संस्कृत यहाँ पार्टी कर रही है!” अलमारियाँ भरी पड़ी हैं – कोई लॉक नहीं, बस धूल की परत।
कैंब्रिज अब इन सारी पांडुलिपियों को स्कैन कर दुनिया के सामने ला रहा है। 2029 तक पूरी दुनिया देखेगी कि कैसे हमारे गाँवों ने अंग्रेजों को मात दे दी।
तो अगली बार कोई बोले “संस्कृत मर गई”,
उसे बोलना:
“भाई, वो मरी नहीं थी… वो तो कावेरी के किनारे छुपकर मजे ले रही थी!”
(स्रोत: कैंब्रिज यूनिवर्सिटी का आधिकारिक प्रोजेक्ट “Beyond the Court: Sanskrit Expert Knowledge in Brahmanical Communities of the Kaveri Delta, 1650-1800” डॉ. जोनाथन डूक्वेट के इंटरव्यू, सरस्वती महल लाइब्रेरी और तिरुविसैनल्लुर के स्थानीय परिवारों से सीधे संग्रह के आधार पर)

