मध्यप्रदेश हमेशा की तरह स्वच्छता सर्वेक्षण में सबसे आगे रहा। लगातार 8वीं दफा इंदौर सिरमौर बना तो राजधानी भोपाल भी श्रेष्ठता का सिरमौर बना। मध्यप्रदेश के कुछ अन्य शहर भी स्वच्छता सर्वेक्षण में स्वयं को साबित किया। स्वच्छता सर्वेक्षण का यह परिणाम सचमुच में सुखदायक है और गर्व से कह सकते हैं कि देश का दिल मध्यप्रदेश अब एक स्वच्छता प्रदेश भी है।
अब सवाल यह है कि पुरस्कारों का ऐलान हुआ, उत्सव हुआ, चर्चा हुई और असली मकसद स्वच्छता फिर कहीं तब तक के लिए हाशिए पर जाता दिख रहा है जब तक दुबारा स्वच्छता सर्वेक्षण का सिलसिला आरंभ ना हो। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या हम सिर्फ नम्बरों में आगे रहने के लिए ही स्वच्छ प्रदेश होने का प्रयास करते हैं या नागरिक बोध के साथ स्वच्छता की दिशा में कदम बढ़ाते हैं?
पिछले सालों का अनुभव यही बताता है कि हमारी रुचि निरंतर स्वच्छ बने रहने से ज्यादा स्वच्छता सर्वेक्षण में सिरमौर बने रहने की है। स्वच्छता उत्सव चार दिनों का ना होकर पूर्ण नागरिक बोध से हो तो यह स्वच्छता का नम्बरों का खेल एक दिन थम भी जाए तो हम गौरव से स्वयं महसूस कर सकें कि हम स्वच्छ प्रदेश के वासी हैं।
लेकिन ऐसा करने वालों में एकमात्र शहर मध्यप्रदेश ही नहीं, देश में रहने वाला इंदौर है। पूर्ण नागरिक बोध के साथ इंदौर के नागरिक अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं। इस बात पर कुछ लोग एतराज कर सकते हैं कि ये क्या बात हुई लेकिन सच यही है।
इंदौर क्यों नागरिक बोध से भरा हुआ शहर है, यह जानना है तो उसकी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को समझना होगा।
राजनीति तो राजनीति होती है और सत्ता और शीर्ष पर बने रहने के लिए कुछ भी करेगा की नीति पर चलती है लेकिन आप जब इस पर विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि इन सबके बावजूद इंदौर की राजनीति इससे परे है और तब जब अपने शहर इंदौर की बात हो।
इंदौर की अस्मिता और प्रतिष्ठा को लेकर सभी निर्दलीय हो जाते हैं। स्वच्छता को लेकर, नागरिक सुविधाओं को लेकर भी इंदौर का यही चरित्र रहा है। कदाचित कभी, कहीं इंदौर की स्थानीय राजनीति फेल हुई तो नागरिक इसका जिम्मा उठा लेते हैं। स्वच्छता सर्वेक्षण का सिलसिला जबसे आरंभ हुआ है, बच्चा-बच्चा स्वच्छता को अपनी जिम्मेदारी समझता है।
शहर के वाशिंदें हों या शहर में आए मेहमान, उन्हें भी इंदौर की स्वच्छता की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है।
एक कागज़ का टुकड़ा भी गलती से सड़क पर फेंक दिया तो न जाने कहां से कोई आएगा और आपसे कहेगा—”भिया, यहां नहीं।” और वह खुद उस कचरे को उठाकर डस्टबीन में डाल देगा।
आमतौर पर निगम के स्वच्छता साथियों के बारे में राय है कि वे अपने काम के प्रति संजीदा नहीं होते हैं। इस सोच पर इंदौर के निगम के स्वच्छता साथी थप्पड़ मारते हैं। वे स्वच्छता की जिम्मेदारी नौकरी के भाव से नहीं करते हैं बल्कि वे नागरिक बोध से भरकर इस जिम्मेदारी को संभालते हैं, पूरा करते हैं।
यह बात सबसे सुंदर और सीखने वाली दूसरे शहरों के लिए है।
स्वच्छता में सिरमौर बनने के लिए पहले और अभी के अफसरों में होड़ मची होती है कि उनके कार्यकाल के कारण इंदौर को यह कामयाबी मिली लेकिन वे भूल जाते हैं कि जिस शहर में नागरिक बोध ना हो, वहां व्यवस्था भी फेल हो जाती है।
सिस्टम का काम बजट और सुविधा मुहैया कराना है और उसकी मॉनिटरिंग करना लेकिन कार्य व्यवहार तो नागरिक बोध से ही आता है। कलश को श्रेय देने के बजाय बुनियाद को प्रणाम किया जाए तो इंदौर हमेशा स्वच्छ शहर बना रहेगा।
इंदौर को बार-बार स्वच्छता में श्रेष्ठता क्यों हासिल होती है, इस पर आपत्ति हो सकती है जिसका जवाब ऊपर लिखा जा चुका है।
अब बड़ा सवाल यह है कि इंदौर जैसा नागरिक बोध अन्य शहरों में क्यों नहीं है? क्यों वहां पर इस बात की चिंता नहीं की जाती कि इंदौर की तासीर में हम क्यों ना घुलमिल जाएं?
दूसरे शहरों में भी शहर को स्वच्छ रहने के लिए बजट और सुविधा आवंटित होता है लेकिन वह रूटीन में निपटा दिया जाता है। स्वच्छता सर्वेक्षण के समय जरूर दबाव रहता है कि हमें पुरस्कार जीतना है, सबसे आगे रहना है तो जाहिर है कि कागजी कार्यवाही पूरा कर कुछ पुरस्कार और नंबर पा लेते हैं।
तमाम विषयों को लेकर शहर-दर-शहर विमर्श, गोष्ठी और संवाद का सिलसिला चलता है लेकिन शायद ही कहीं स्वच्छता पर विमर्श को लेकर संवाद का कोई सिलसिला शुरू हुआ हो।
आमतौर पर हमारी मानसिकता है कि यह काम सरकार का है, नगर निगम का है, वो करे। इस मानसिकता के साथ हम कागजी तौर पर स्वच्छ शहर का तमगा तो पहन सकते हैं लेकिन खुद से सच का सामना नहीं कर सकते हैं।
यह हाल देश के सभी शहरों और राजधानी का है।
स्वच्छता में सिरमौर बनने की दौड़ में शामिल शहरों की पोल हर बार बारिश खोल देती है और इस बार भी यही हो रहा है। सड़कें और नालियां बजबजा गई हैं। पॉलिथीन और दूसरे कचरों से पानी निकासी की व्यवस्था चरमरा गई है।
कम से कम उन शहरों से यह सवाल किया जा सकता है कि आप तो स्वच्छता सर्वेक्षण में सिरमौर रहे हैं, फिर ये संकट क्यों उत्पन्न हुआ?
मामला साफ है कि हम कागजी तौर पर तो स्वच्छ हो गए लेकिन नागरिक बोध के अभाव में शहर को जमीनी तौर पर स्वच्छ नहीं रख पाए।
इंदौर भी इस आरोप से पूरी तरह बरी नहीं है।
अगले वर्ष फिर हम स्वच्छता उत्सव मनाएंगे।
जिन शहरों के खाते में नंबर आएंगे, उन्हें शाबाशी दी जाएगी और जो पिछड़ जाएंगे, उनसे सवाल किए जाएंगे। यह सब प्रशासनिक प्रक्रिया है, चलती रहेगी।
आपके घरों का कचरा उठाने के लिए आने वाली गाड़ी में बजने वाला गीत कहां गुम हो गया? स्वच्छता साथियों को मिलने वाली सुरक्षा में भी ढील है, आखिर इसका दोषी कौन?
मूल प्रश्न यह है कि स्वच्छता के लिए देश के हर नागरिक में अपने शहर के प्रति नागरिक बोध का भाव हो। नियमित रूप से स्वच्छता पर चर्चा, संवाद, संगोष्ठी हो।
अपने शहर की अस्मिता और प्रतिष्ठा के लिए नागरिक जागरूकता, नागरिक बोध सर्वप्रथम है ताकि स्वच्छता उत्सव चलता रहे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं मीडिया शिक्षा से संबद्ध हैं)

