बीएसई और दलाल स्ट्रीट अब एक समान हैं परन्तु वास्तव में इस एक्सचेंज का प्रथम जन्मस्थल 1850 में एक बरगद का वृक्ष था। फिलहाल जहां हार्निमन सर्कल है, वहां टाउनहाल के पास बरगद के वृक्ष के नीचे दलाल लोग एकत्रित होते थे और शेयरों का सौदा करते थे। एक दशक के बाद ये दलाल मेडोज स्ट्रीट और महात्मा गांधी रोड के जंक्शन पर बरगद के वृक्ष की सघन छाया के नीचे जुटने लगे। शेयर दलालों की संख्या बढने पर उन्हें नए स्थान पर जाना पड़ता था। यह सिलसिला जारी रहा और अन्त में 1874 में उन्हें एक स्थाई जगह मिल गयी, यह स्थल दलाल स्ट्रीट के रूप में सुविख्यात हो गया।
- 1899 में एसोसिएशन ने दलाल स्ट्रीट पर जमीन खरीदी और वहां पहला स्थायी भवन बनाया।
- यह इमारत अपेक्षाकृत साधारण थी — 2-3 मंजिला, जिसमें ब्रोकरों के लिए ट्रेडिंग हॉल, बैठक कक्ष और रिकॉर्ड रूम था।
- उस समय के हिसाब से इसकी लागत लगभग ₹1.5–2 लाख रुपये (1899 की कीमत) बताई जाती है। ।
मुंबई शेयर बाजार का जन्म एक एसोसिएशन के रूप में 1875 में हुआ था। जिसका नाम था नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर एसोसिएशन। इसके पूर्व शेयरों का सौदा शुरू हो चुका था। 1840 में शेयर दलाल एक वट वृक्ष के नीचे खड़े होकर शेयरों की खरीद-बिक्री करते थे। वहीं से एसोसिएशन बनाने की रूपरेखा आकार में आई और इसी विचार से एक ऐतिहासिक घटना साकार हुई।
भारत उस दौरान ब्रिटिश शासन के आधीन था। 18 जनवरी 1899 के दिन ब्रिटिश उच्चाधिकारी जे. एम. मेक्लिन द्वारा मुंबई के नेटिव शेयर दलालों के लिए उच्चारित किए गए शब्दों को आज भी गौरव के साथ याद किया जाता है। मेक्लिन के सिद्धांत का तात्पर्य यह था कि मुंबई के नेटिव शेयर दलाल समाज के अभिन अंग हैं जिनको उचित सम्मान नहीं मिला, परंतु उनके दोषों का ही आकलन किया गया। किसी अपवाद के अलावा ये शेयर दलाल प्रामाणिक रहे हैं। उनको भले ही कितना भी नुकसान झोलना पडा हो, लेकिन उन्होंने अपने ग्राहकों की पाई-पाई चुकाई है। भारत में पूंजी का यह सबसे बड़ा बाजार है। मुंबई पोर्ट ट्रस्ट एवं मुंबई म्युनिसिपल्टी जैसी संस्थाओं को नीचे से ऊपर उठाने में सहायक रहा है। वर्तमान मुंबई के सृजन में इन नेटिव शेयर दलालों की उल्लेखनीय भूमिका है। यह सिद्धांत 21 वीं सदी में भी मुंबई के शेयर दलालों के लिए यथार्थ रहा है। अलबत्ता अपवाद तो हमेशा किसी न किसी स्वरूप अथवा मात्रा में प्रकट होते रहते हैं।
प्रथम शेयर मैनिया
1850 में भारत सरकार ने कंपनीज एक्ट 1850 पारित किया और शेयर ट्रेडिंग का एक नया मार्ग खुला। नया इसलिए क्योंकि उसके पहले भी शेयरों का सौदा तो होता था, लेकिन नाम मात्र के लिए, ट्रेडिंग के लिए बड़ी संख्या में शेयर उपलब्ध हुए बिना इस प्रवृत्ति को गति मिलना संभव नहीं था। उन दिनों में कमर्शियल बैंक, चार्टर्ड बैंक, दि ओरिएंटल बैंक एवं बैंक ऑफ बॉम्बे जैसे मुख्य बैंक स्टॉक जैसे कुछ शेयर ही उपलब्ध होते थे। लोगों में भी शेयर में निवेश करने के लिए बहुत लगाव नहीं था। शेयर ट्रेडिंग प्रवृत्ति का प्रमाण भी कम रहता था और सिर्फ छः शेयर दलालों द्वारा चलाया जाता था। उस समय न तो ट्रेडिंग हॉल था न ही शेयर बाजार का मकान। इसके लिए आवश्यक पूंजी भी नहीं थी। इसके बावजूद 1860 तक शेयर दलालों की संख्या 60 तक पहुंच गई थी।
1860 में एक ऐसे व्यक्ति प्रकाश में आये जिन्होंने `शेयर मैनिया’ को जन्म दिया। इनका नाम था प्रेमचंद रोयचंद। ये पहले भारतीय शेयर दलाल थे जो अंग्रेजी लिख-पढ़ सकते थे। श्री प्रेमचंद रोयचंद ने कई लैंड रिक्लमेशन सहित अनेक कंपनियों को खड़ा करने में सहायता की थी। शेयरों के सौदों की प्रवृत्ति बढ़ती गई और वैसे-वैसे शेयर दलालों की संख्या भी बढ़कर 200 से 250 तक पहुंच गई। इसके बाद 1865 में अमेरिकन सिविल वार (आंतरिक-युद्ध) का अंत होने के परिणाम स्वरूप इसके विकास के लिए भारत में आनेवाली पूंजी के प्रवाह में कमी आ गई और `शेयर मैनिया’ का भी अंत हो गया। रातोंरात शेयरों के भाव नाटकीय æढ़ंग से नीचे गिर गये। परिणाम स्वरूप शेयर दलालों के कामकाज ठप हो गये। जिसकी वजह से शेयर दलालों के एसोसिएशन की रचना का विचार उनके मन में आया और शेयर दलालों ने एकजुट होकर 1868 और 1873 के बीच एक गैर औपचारिक एसोसिएशन की रचना की। 1874 में इन दलालों ने नियमित सौदा करने के लिए एक स्थल की खोज की जो कि आज तक दलाल स्ट्रीट के नाम से प्रसिद्ध है।
3 दिसम्बर 1887 को शेयर दलालों ने इस एसोसिएशन को औपचारिक स्वरूप दिया और `दि नेटिव एंड स्टॉक ब्रोकर्स एसोसिएशन’ का जन्म हुआ। इस तरह जुलाई 1875 में मात्र 318 व्यक्तियों ने रू. 1 के प्रवेश शुल्क के साथ शेयर बाजार मुंबई की संस्था गठित की। इन्होंने एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें नेटिव शेयर एंड स्टॉक ब्रोकरों के हित, दर्जा एवं स्वरूप की रक्षा के लिए एसोसिएशन के सदस्यों के उपयोग के लिए एक हॉल अथवा मकान का निर्माण करना निश्चित हुआ। 1887 तक इस निर्णय पर अमल नहीं किया जा सका परंतु एक ट्रस्ट डीड जरूर बनी और 1887 में इस ट्रस्ट-डीड में लिखे गये शब्द वर्तमान मुंबई शेयर बाजार के नींव के पत्थर बन गये। इस तरह आज के बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) के रूप में प्रसिद्ध विराट संस्था की स्थापना इन लोगों के सार्थक प्रयासों से संभव हुई। इस प्रकार एक वृक्ष के नीचे शुरू हुई यह यात्रा आज आधुनिक स्वरूप में वैश्विक मंच पर महत्त्वपूर्ण स्थान बनाकर विकास की दिशा में आगे बढ़ रही है।
उस संगठित स्टॉक ट्रेडिंग की घटना 18 वीं सदी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा उसकी विविध प्रवृत्तिओं के लिए पूंजी उगाही के लिए जारी हुए टर्म पेपर्स (अवधि दस्तावेजों) की ट्रेडिंग द्वारा की गई, जिसके साथ ही कमर्शियल बैंक, मर्केन्टाइल बैंक ऑफ बॉम्बे जैसे बैंको के शेयरों में भी ट्रेडिंग की शुरूआत हुई।
शुरुआती पृष्ठभूमि (1850–1874)
- 19वीं सदी के मध्य में ब्रिटिश राज के समय भारत में कपास (cotton) और अफीम का व्यापार खूब हो रहा था।
- मुंबई (तब बॉम्बे) का बंदरगाह एशिया के बड़े व्यापारिक केंद्रों में से एक था, और यहां कई व्यापारी ब्रिटिश और यूरोपीय कंपनियों के साथ काम कर रहे थे।
- 1850 के दशक में कुछ व्यापारी मुंबई की हॉर्नीमन सर्कल (Fort area) और बंदरगाह के पास इकट्ठा होकर शेयर और कमोडिटी का सौदा करने लगे।
- शुरुआत में ये सौदे बिना किसी औपचारिक इमारत या संगठन के, खुले में होते थे।
औपचारिक शुरुआत — “नेशनल कॉटन मिल” के दौर (1850s–1870s)
- मुंबई में शेयर ट्रेडिंग का पहला बड़ा उछाल 1850 के दशक के अंत में आया, जब मुंबई में कपास की मिलें बनने लगीं।
- “प्रथम शेयर”: 1850 में मुंबई की पहली कपास मिल “बॉम्बे स्पिनिंग एंड वीविंग कंपनी” के शेयर बेचे गए, जिससे शेयर बाजार की नींव पड़ी।
- 1860s में अमेरिकी गृहयुद्ध (American Civil War) के कारण ब्रिटेन को अमेरिका से कपास मिलनी बंद हो गई, और मुंबई के व्यापारी अचानक बहुत अमीर हो गए, क्योंकि उन्होंने भारत से ब्रिटेन को कपास भेजी।
- इसी समय, “ब्रोकर” (दलाल) नामक पेशेवर वर्ग उभरा, जो खरीदार और विक्रेता के बीच सौदा कराने लगे।
3. औपचारिक संगठन का जन्म (1875)
- स्थापक: सेठ प्रेमचंद रायचंद, रमदास मोरारजी, और कुछ अन्य प्रमुख गुजराती एवं पारसी व्यापारी।
- 9 जुलाई 1875 को, 22 ब्रोकरों के समूह ने “The Native Share and Stock Brokers Association” नाम से एक औपचारिक संस्था बनाई — यही आगे चलकर BSE बनी।
- शुरू में, ये ब्रोकर मुंबई के टाउन हॉल के पास बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर सौदे करते थे।
- बाद में वे हॉर्नीमन सर्कल और मेयो हॉल के पास की जगहों पर शिफ्ट हुए।
4. नई इमारत और आधिकारिक पहचान (1899–1957)
- 1899 में इस संस्था ने अपना स्थायी स्थान दलाल स्ट्रीट पर ले लिया — जो आज भी भारत के वित्तीय जगत का प्रतीक है।
- 1923 में इसने अपने खुद के नियम-कानून बनाए, जिससे लेन-देन अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित हुआ।
- 1957 में भारत सरकार ने BSE को “मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज” का दर्जा दिया।
5. तकनीकी और आर्थिक विकास (1980–2000)
- 1986: SENSEX (Sensitive Index) लॉन्च किया गया — यह BSE का मुख्य सूचकांक बना।
- 1995: BSE पूरी तरह कंप्यूटरीकृत ट्रेडिंग प्रणाली पर चला गया।
- 1992: हर्षद मेहता घोटाले ने BSE की प्रतिष्ठा को झटका दिया और भारतीय शेयर बाजार में पारदर्शिता की मांग बढ़ी।
6. BSE का वर्तमान स्वरूप (2000–अब तक)
- 2001 में BSE एक कंपनी के रूप में पुनर्गठित हुआ — “BSE Ltd.”
- 2017 में BSE ने खुद अपने शेयर बाज़ार में लिस्ट किए — यह भारत का पहला स्टॉक एक्सचेंज बना जिसने खुद का IPO लाया।
- आज BSE के पास:
- 5000+ लिस्टेड कंपनियां (दुनिया में सबसे ज्यादा)
- मार्केट कैपिटलाइजेशन 4 ट्रिलियन USD से अधिक (2025 तक)
- अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भी ट्रेडिंग प्लेटफ़ॉर्म
संस्थापक योगदान
- सेठ प्रेमचंद रायचंद: “कॉटन किंग” और “बुलियन किंग” के नाम से मशहूर, जिन्होंने BSE के लिए नियम और व्यावसायिक आधार तय किए।
- दलाल स्ट्रीट का नाम इन्हीं शुरुआती ब्रोकरों (दलालों) के कारण पड़ा।
मुख्य ऐतिहासिक मील के पत्थर
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1850 | मुंबई में पहली कपास मिल के शेयर बेचे गए |
| 1860s | अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान शेयर ट्रेडिंग बूम |
| 1875 | Native Share and Stock Brokers Association की स्थापना |
| 1899 | दलाल स्ट्रीट में स्थायी भवन |
| 1957 | भारत सरकार से मान्यता |
| 1986 | SENSEX की शुरुआत |
| 1995 | ऑनलाइन ट्रेडिंग सिस्टम |
| 2017 | BSE का IPO |

