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कैवल्यधाम ने योग को शास्त्रीय और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर सशक्त बनायाः श्री रामनाथ कोविंद

लोनावला। “कैवल्यधाम योग संस्थान पारंपरिक योग ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सुंदर संगम प्रस्तुत कर रहा है। यह संस्थान योग को शास्त्रीय और व्यवहारिक दोनों स्तरों पर सशक्त बना रहा है। यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे यहाँ दोबारा आने का अवसर मिला, लेकिन ये ऐसा स्थान है कि यहां बार बार आने को मन करता है।”

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ये विचार पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने लोनावला के कैवल्यधाम योग संस्थान में स्वामी कुवलयानंद योग पुरस्कार प्रदान करते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि जिस योग संस्थान के माध्यम से स्वामी कुलयानंद ने आज से 100 साल पहले योग को पूरे विश्व में फैलाने की कल्पना की थी, वह योग आज दुनिया के 175 देशों में अपनी पहचान बना चुका है। उन्होंने कहा कि जो देश योग को धर्म विशेष का मानकर इसका विरोध करते रहे आज उन देशों में भी योग किया जा रहा है और योग दिवस मनाया जा रहा है, ये सब आज के भारत की और हजारों साल पुराने योग की ताकत है कि पूरी दुनिया इसको अपना रही है।

इस अवसर पर कैवल्यधाम  शताब्दी समारोह आयोजन समिति के अध्यक्ष एवँ पूर्व केंद्रीय मंत्री श्री सुरेश प्रभु ने कहा यह हमारी हजारों साल पुरानी संस्कृति की विशेषता है कि समय समय पर योगाचार्य कुलयानंद जैसे लोग जन्म लेते रहते हैं और हमारी सांस्कृतिक विरासत की धारा को प्रवाहित करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि कैवल्यधाम ने विगत सौ वर्षों में भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर के लाखों लोगों को योग से जोड़ा। यह संस्थान ऐसे समय में शुरु हुआ था जब लोनावला में साधन तो क्या यहाँ पहुंचने के लिए सड़क तक नहीं थी, फिर भी दुनिया भर के लोग यहाँ आते रहे। श्री प्रभु ने कहा कि आज ये स्थान एक ऐसी  पुण्य भूमि बन चुका है जहाँ आकर व्यक्ति अपने आपको रूपांतरित कर लेता है।

इस अवसर पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री डी.वाय. चन्द्रचूड़ ने कहा कि मेरे जीवन को सकारात्मक व स्वस्थ बनाने में योग का ही योगदान है। मेरे योग शिक्षक ने मुझे योग की बारिकियाँ सिखाई और समझाई और जब मैने इसको अपने जीवन में उतारा तो इसके चमत्कारिक परिणाम हुए। उन्होंने योग गुरु कुवलयानंद जी को याद करते हुए कहा कि मुझे हैरानी इस बात की है कि आज से 100 साल पहले लोनावला में आने को न सड़क थी न बिजली थी तब उन्होंने इस स्थान को योग केंद्र के रूप में चुना और दूसरी हैरानी की बात ये है कि ये संस्थान पूरी गरिमा और विश्वसनीयता के साथ 100 साल बाद भी चल रहा है और यहाँ का वातावरण देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने इसे सभी वरदानों से लाद दिया है।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पतंजलि रिसर्च फाउंडेशन, हरिद्वार की अनुसंधान सलाहकार एवं परामर्शदाता सुश्री शर्ली टेलिस ने कहा कि मैने मेडिकल विज्ञान की पढ़ाई की है लेकिन जब मैने योग के माध्यम से मरीजों में होने वाले चमत्कारिक प्रभावों का अध्ययन किया तो मैं दंग रह गई। योग में वह ताकत है जो दुनिया की किसी दवाई में नहीं है।

 

योग के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले योगाचार्य रंभाऊ खंडवे (अध्यक्ष, जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल, नागपुर) ने अपने पुरस्कार को अपने गुरु कुवल्यानंद जी को समर्पित करते हुए कहा कि मैने उनसे योग की दीक्षा समाज के हर कोने में योग पहुँचाने के लिए ली थी, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि जिस संस्थान से मुझे दीक्षा और शिक्षा मिली वही संस्थान मुझे पुरस्कृत भी करेगा। उन्होंने कहा कि माननीय कोविंद जी और माननीय चन्द्रचूड़ जी की उपस्थिति में सम्मानित होना मेरे लिए गर्व की बात है।

इस आयोजन को सफल बनाने में कैवल्यधाम की सुश्री भूमि और सुश्री ईश्विंधा के साथ ही सभी कर्मचारियों का अप्रतिम योगदान रहा। कार्यक्रम में शामिल हुए सभी मेहमान कैवल्यधाम के प्राकृतिक वातावरण से लेकर अहोभाव से हुए अतिथि सत्कार से अपने आपको सम्मानित महसूस कर रहे थे।

मुंबई से आए बोनांजा पोर्टफोलियो के श्री एसपी गोयल ने कहा कि इतने विशाल परिसर को प्राकृतिक वातावरण की मौलिकता बनाए रखते हुए इतना सर्वसुविधायुक्त परिसर बनाना और इसे सफलतापूर्वक संचालित करना, इस बात का प्रमाण है कि इस संस्थान से जुडे लोग कितने समर्पित और सेवाभावी है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कैवल्यधाम के महासचिव श्री सुभाष आर. वारेकर ने की।

समारोह का संचालन राजीव वाचस्पति शालाका ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन श्याम वासलकर ने किया।

योग पुरस्कार प्राप्त विशिष्ट व्यक्तियों के बारे में

डॉ. न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश

उनकी विशिष्ट यात्रा — अकादमिक क्षेत्र से लेकर देश की सर्वोच्च न्यायपालिका तक — न्याय, संवैधानिक मूल्यों और विधि के शासन के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का प्रमाण है। उन्होंने स्वयं को भारत के सबसे सम्मानित न्यायविदों में स्थापित किया है।

भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा देने के बाद, उन्होंने नवंबर 2024 में पदमुक्त होकर एक गौरवशाली न्यायिक जीवन का समापन किया। उनका करियर वर्ष 2000 में बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से प्रारंभ हुआ। इसके बाद उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश (2016 से) के रूप में कार्य किया।
अपने आरंभिक कार्यकाल में वे भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल रहे और वर्ष 1998 में उन्हें बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया।

वे सेंट स्टीफन्स कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस लॉ सेंटर के स्नातक हैं। इसके पश्चात उन्होंने हार्वर्ड लॉ स्कूलअमेरिका से एल.एल.एम. और विधि में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

कानून के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान से परे, डॉ. चंद्रचूड़ योग के समर्पित साधक रहे हैं। वे अपने युवावस्था से ही योग का अभ्यास करते आए हैं और दशकों से इसका पालन करते हैं। जीवन और नेतृत्व के प्रति उनका दृष्टिकोण योग की मूल भावना को प्रतिबिंबित करता है —
योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि संतुलन, संयम और आत्म-जागरूकता के सिद्धांतों पर आधारित जीवन का समग्र दृष्टिकोण है।

मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने न्यायिक क्षेत्र में योग, स्वास्थ्य और कल्याण को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया। उनके नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट में एक योग हॉल का उद्घाटन किया गया, जहाँ नियमित योग सत्रों की शुरुआत हुई — जिससे न्यायालय में सजगता, स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन की संस्कृति का विकास हुआ।

डॉ. चंद्रचूड़ के लिए योग आसनों के अभ्यास से आगे बढ़कर आत्म-अनुशासन, सत्यनिष्ठा और सामंजस्य के यम-नियम जैसे मूल सिद्धांतों का प्रतिनिधित्व करता है। ये मूल्य उन्होंने अपने व्यक्तिगत आचरण और सार्वजनिक सेवा में निरंतर अपनाए हैं। उनका नेतृत्व योग से उत्पन्न उस आध्यात्मिक संतुलन को दर्शाता है जो बुद्धि को करुणा और न्याय को मानवता के साथ जोड़ता है।

योग के आदर्शों के प्रति उनके जीवनपर्यंत समर्पण के सम्मान में, कैवल्यधाम को गर्व है कि वह डॉ. न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ को स्वामी कुवलयानंद योग पुरस्कार 2025 प्रदान कर रहा है।

उनका जीवन और कार्य स्वामी कुवलयानंद की उस दृष्टि से गहराई से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने परंपरा की ज्ञान-गंगा को विज्ञान की कठोरता के साथ एकीकृत कर समाज को योग की रूपांतरकारी शक्ति के माध्यम से ऊँचा उठाने का प्रयास किया।

डॉ. शर्ली टेलिस
अनुसंधान सलाहकार एवं परामर्शदातापतंजलि रिसर्च फाउंडेशनहरिद्वार

हमारी अंतिम पुरस्कार प्राप्तकर्ता स्वयं एक उत्साही योग साधिका हैं और उनका विश्वास है कि योग अनुसंधान जीवन के प्रत्येक पहलू पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

डॉ. टेलिस ने पारंपरिक चिकित्सा (एम.बी.बी.एस.) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। इसके बाद उन्होंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेस (NIMHANS), बेंगलुरु से योग अभ्यास के प्रभावों पर न्यूरोफिज़ियोलॉजी में एम.फिल. और पीएच.डी. पूरी की।

अपने डॉक्टरेट के पश्चात, डॉ. टेलिस ने स्वामी विवेकानंद रिसर्च फाउंडेशन, बेंगलुरु से जुड़कर वहाँ प्रयोगशालाएँ स्थापित करने का अद्वितीय पोस्टडॉक अनुभव प्राप्त किया और अनुसंधान कार्य आरंभ किया।
वर्ष 2007 से, डॉ. टेलिस पतंजलि रिसर्च फाउंडेशनहरिद्वार से जुड़ी हुई हैं।

उन्हें वर्ष 1998 में ध्यान-साधकों पर fMRI अध्ययन करने हेतु फुलब्राइट फैलोशिप प्राप्त हुई, जो यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडागेंसविलअमेरिका के रेडियोलॉजी विभाग में किया गया।

वर्ष 2001 में उन्हें टेम्पलटन फाउंडेशन से न्यूरोबायोलॉजी में सृजनात्मक विचारों के लिए पुरस्कार मिला।
2007 में वे इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अंतर्गत सेंटर फॉर एडवांस्ड रिसर्च, बेंगलुरु में योग और ध्यान के प्रभावों पर अध्ययन करने वाली पहली भारतीय वैज्ञानिक बनीं। उन्होंने स्वायत्त तंत्रिकाओं, प्रेरित एवं घटना-संबंधी विभवों, पॉलीसोमनोग्राफी जैसे विषयों पर शोध किया।

उन्होंने लगभग 200 शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं जो विभिन्न अंतरराष्ट्रीय डेटाबेस में उद्धृत हैं, और पुस्तकों की रचना की है।

डॉ. टेलिस को भारत एवं विश्वभर में योग और आयुर्वेद के स्वास्थ्य एवं उपचार में अनुप्रयोगों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया है।
उनके योगदानों ने योग को एक वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में वैश्विक समझ को अत्यधिक समृद्ध किया है।

योगाचार्य रंभाऊ खंडवे
अध्यक्षजनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल

हमारे दूसरे पुरस्कार प्राप्तकर्ता का परिचय देना हमारे लिए गौरव की बात है — योगाचार्य रंभाऊ खंडवे, जिन्होंने अपने जीवन के छह दशकों से भी अधिक समय योग की निःस्वार्थ सेवा में समर्पित किया है। उनका यह समर्पण जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडलरामनगरनागपुर के साथ उनके गहन संबंध के माध्यम से प्रकट होता है, जिसकी स्थापना परम पूज्य जनार्दन स्वामी ने वर्ष 1951 में की थी।

श्री रंभाऊ खंडवे अनेक वर्षों तक मंडल के कार्यवाह रहे हैं और वर्ष 2022 से अध्यक्ष के रूप में सेवा दे रहे हैं।

कैवल्यधाम द्वारा प्रचारित योग के आदर्शों के प्रेरक वाहक के रूप में, योगाचार्य रंभाऊ खंडवे ने अपने अनुशासित जीवन, पतंजलि के अष्टांग योग के गहन ज्ञान, और करुणा-पूर्ण शिक्षण दृष्टिकोण से अनगिनत साधकों को प्रेरित किया है।

नियमित कक्षाओं, प्रशिक्षण शिविरों और जन-जागरण के माध्यम से उन्होंने विशेषकर महाराष्ट्र में समाज के ताने-बाने में योगिक मूल्यों को समाहित करने का कार्य किया है।
उनकी जीवनशैली — जो आध्यात्मिक गहराई और सामाजिक प्रासंगिकता का संतुलित उदाहरण है — उन्हें योग पथ पर अनेक लोगों के लिए एक मार्गदर्शक बनाती है।

जनार्दन स्वामी योगाभ्यासी मंडल में अपने आजीवन कार्य के माध्यम से उन्होंने पतंजलि के अष्टांग योग की भावना को बनाए रखा और विनम्रता, अनुशासन, विवेक तथा ज्ञान पर आधारित पारंपरिक योग साधनाओं को आगे बढ़ाया।
उन्होंने स्वामी कुवलयानंद जी की उस दृष्टि को साकार करने में योगदान दिया जिसमें योग को विज्ञान की दृढ़ता के साथ जोड़कर मानव उत्थान और कल्याण का माध्यम बनाया गया।

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