कोटा की साहित्यकार डॉ. अपर्णा पाण्डेय की काव्य संकलन कृति “उन्मेष प्रवासी मन” कविताओं के संकलन का एक ऐसा पुष्प गुच्छ है जो किसी एक विषय पर केंद्रित न हो कर धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, प्रेम, प्रकृति सौंदर्य आदि प्रसंगों को समेटे हुए विविधवर्णीय और बहुमुखी है। कहने को तो यह एक कृति है पर वास्तव में दो कृतियों का प्रतिनिधित्व करती है। दो खंडों में विभक्त कृति में लेखिका ने स्वयं दो बार मन की बात कही है। एक भाग में विविध विषयों पर स्वस्फूर्त 29 रचनाएं हैं तो दूसरे भाग में 31 ऐसी कविताएं हैं जो उनके ढाका प्रवास के दौरान सृजित कविताओं का दर्पण है। साथ में 9 ग़ज़ल भी इस खंड में शामिल हैं। इनकी कविताओं में मानवता, देश प्रेम, आशा, विश्वास, आनंद, चिंता, पीड़ा, विरह, मिलन के भाव इन्हें कुशल शब्द शिल्पी बना देते हैं।
उन्मेष एक संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ पलकें खुली रखना है। इन्होंने अपनी खुली आंखों से जो देखा और महसूस किया वही कविताएं उन्मेष खंड में प्रतिध्वनित हैं। इस भाग की स्वस्फूर्त कविताओं में जिंदगी के कई रंग भरे हैं। सृजन गंभीरता लिए पर संदेश परक है। भाषा शैली मन को छू लेने वाली है।
भारतीय संस्कृति में ॐ – नाद का महत्व रचा – बसा है। यम, नियम,आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और समाधि जैसे आचार – विचार के नियम आज तिरोहित हो रहे हैं। संयम रह नहीं गया है। स्वदेशी को भूल बैठे हैं। मानवता को जिंदा रखने के लिए इन्हीं को आधार बना कर “ॐ – नाद” कविता में लिखा है (पृष्ठ ३)…
भारत की पावन भूमि से, ऋषि ने फिर ललकारा है/ उठो देश के अमर सपूतों / यह संसार तुम्हारा है। / ॐ नाद की ब्रह्म ध्वनि से/ गूंजा भारत सारा है / ऋषियों की पावन वाणी से /भाग रहा अँधियारा है / यम, नियम/ आसन/ प्राणायाम/ प्रत्याहार/ समाधि से/ जीवन-नौका पार उतारो / यह संकल्प हमारा है / रहो स्वदेशी, त्याग विदेशी/ जीवन में संयम धारो/ ऋषियों के आदर्श आचरण का / जयघोष हमारा है॥
समाज में फैल रही विकृतियों और धर्म से विमुख होते प्राणियों पर चिंता जाहिर कर प्रभु में मन रमाने के भाव पर लिखी कविता “विमूढ़ मन” देखिए (पृष्ठ ७)…
हम चौराहे पर खड़े, किस पंथ पर मन को रमायें/ भक्तिपथ को गह रहें, भव पंथ पर पग को बढ़ायें / इन्द्रियों के अश्व भव को / विषय रस की ओर लायें / मूढ़ बन मानव इन्हें ही, लक्ष्य जीवन का बनायें…
निर्गुण भक्ति रस के कबीरदास जी की वाणी को आधार बना कर जीवन मूल्यों की गिरावट पर लिखा गया अंश (पृष्ठ ४)…
कबिरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर / भ्रष्ट तन्त्र चारों तरफ, मनुज-मनुज में बैर…
मातृभूमि की वेदना, प्रेम भावना, बच्चों की कविताएं, प्रकृति पर रचनाएं, इतिहास का निर्माण, शरद ऋतु, ऋषि दयानंद — सभी में संदेश परक भाव हैं।
दूसरे भाग में (ढाका प्रवास) के अनुभवों का गहरा प्रभाव दिखता है — रूढ़ियों से जूझती महिलाएं, प्रकृति, प्रेम, विद्यार्थी, और अधिकारियों का आचरण।
कविता “दूर हो” (पृष्ठ ७६) का भाव:
चांदनी रात है, और तुम दूर हो / प्यार की बात है और तुम दूर हो…
कविता “ऊंचे लोग” (पृष्ठ ७५):
बहुतों को देखा है मैंने / कबूतर की तरह फूले हुए…
कविता “मेघ का आना” (पृष्ठ ६०):
ये काले मेघ का आना / हवा का गीत फिर गाना…
कविता “प्रश्न” (पृष्ठ ५५,५६):
ऊपर से तो रूप मनोहर, अंतर में तो ज्वाला है / सामाजिक बंधन क्यों इतने, झेले हैं महिलाओं ने…
इस भाग की अन्य उल्लेखनीय कविताएं हैं:
मुक्ति, ध्यान बहुत है, जीवन, प्रेम, मुक्ति का प्रसाद, द्वीप बन कर रह गया हूँ, मानवीय प्रेम की नीप, जीवन नहीं, दर्द बीज बोया लगता है, मेह – पुरुष, बन सको तो, समझौता, मिट्टी, अमोघ, मेघ क्यूं रूठे, प्रीति, सीख लिया और प्यार नहीं गुजरता।
यह काव्य संग्रह लेखिका ने अपने स्व. पिता श्री लाल बिहारी शास्त्री और माता श्रीमती कृष्णा देवी को समर्पित किया है।
भूमिका:
कवि, समीक्षक और भारत सरकार के अधिकारी वीरेंद्र सिंह विद्यार्थी लिखते हैं:
“…कवयित्री का परम्परा-बोध प्रखर रूप से उभरता है परन्तु वह जड़ता को दृढ़ता से तोड़ता हुआ, जूझता हुआ भी दिखाई पड़ता है…”
अभिमत:
जयश्री कुंडू (ढाका) –
“इनकी कविताएं सुंदर हैं… विद्यार्थियों के बीच अच्छी शिक्षिका रही हैं…”
शिवराज श्रीवास्तव –
“इनकी कविताओं में एक सजग, जाग्रत और संघर्षशील भारतीय नारी के दर्शन होते हैं।”
पुस्तक : उन्मेष प्रवासी मन (काव्य संकलन)
लेखिका : डॉ. अपर्णा पाण्डेय, कोटा
प्रकाशक : वृंदावन बिहारी दार्शनिक अनुसंधान केंद्र, नई दिल्ली
मूल्य : ₹120

