निशा काम से घर लौटते समय एक साइकिल की दुकान पर रुकी। उसका आठ साल का बेटा एक नई साइकिल चाहता था—एक शानदार नीली साइकिल, जिसमें गियर और एक हेलमेट हो। लेकिन दुकान में महंगी-महंगी साइकिलें देखकर वह उलझन में पड़ गई।
निशा और रवि ने बॉस्टन के पास एक छोटे से शहर में अपनी ज़िंदगी बसाई थी। दोनों आईटी क्षेत्र में काम करते थे। निशा को लगता था कि सेल के दौरान खरीदारी करने से पैसे बचते हैं, इसलिए वह अक्सर चीज़ें जमा कर लेती थी। धीरे-धीरे घर में इतना सामान इकट्ठा हो गया कि अलमारियाँ तक कम पड़ने लगीं। पर्स, चप्पल, जूते, फूलदान, असली और नकली फूल, पौधे, किताबें, कॉफी मेकर, कपड़े, टोपी, फोटो फ्रेम, खिलौने—हर कोना चीज़ों से भर गया।
साइकिलें देखते हुए, उसने दो महिलाओं की बातचीत सुनी। एक बोली, “पांच साल के बच्चे के लिए इतनी महंगी साइकिल पर पैसा मत उड़ाओ!” दूसरी बोली, “‘Buy Nothing’ में बच्चों की साइकिल मिल जाएगी।”
निशा के कान खड़े हो गए। महिला ने आगे कहा, “बच्चा जब बड़ा होगा, तब बड़ी साइकिल लेना। तब तक—Buy Nothing!”
निशा ने उत्सुक होकर पूछा, “ये Buy Nothing क्या है?” महिलाओं ने कहा, “ये पता और नंबर लो। वहाँ रेबेका मिलेगी। वो सब समझा देगी।”
निशा उस पते पर पहुंच गई। वहां एक हंसमुख, लगभग 50 साल की महिला ने उसका स्वागत किया।
“मेरा नाम रेबेका है। Buy Nothing में आपका स्वागत है!” उसने कहा।
निशा ने पूछा, “ये Buy Nothing है क्या?”
रेबेका ने चश्मा ठीक करते हुए कहा:
“मैंने और मेरी दोस्त ने एक फेसबुक ग्रुप शुरू किया था। करीब छह-सात साल पहले मैं भारी आर्थिक संकट में थी। मैंने लोगों से चीज़ें उधार माँगनी शुरू की। लोगों ने मुझे खाना तक दे दिया! जब मेरी स्थिति सुधरी, तब मैंने ज़रूरी चीज़ों के लिए ये ग्रुप शुरू किया।
आज हमारे लोकल Buy Nothing ग्रुप में हज़ार से ज़्यादा सदस्य हैं। इसमें शामिल होने के लिए एक मामूली फीस होती है, और कुछ सवालों के जवाब देने होते हैं।
अगर तुम्हें कुछ चाहिए, तो हज़ार लोगों में से किसी के पास ज़रूर होगा। उपयोग करो और काम खत्म होने पर वापस कर दो।
कुछ भी खरीदने की ज़रूरत नहीं है।
जो उपयोग में नहीं है, वो दूसरों को दे दो। और जो ज़रूरत हो, वो दूसरों से ले लो। इससे पैसे की बचत होती है, वैश्विक कचरा घटता है, पर्यावरण की मदद होती है, और इंसानों के बीच संबंध बनते हैं। केवल व्यक्तिगत साफ़-सफाई की चीज़ें ही खरीदनी चाहिए। हर शहर का अपना ग्रुप है। और अब तो दुनिया भर में 16 लाख से भी ज़्यादा सदस्य हैं!”
वहीं पर निशा ने Buy Nothing फेसबुक ग्रुप जॉइन किया और पूछा—“क्या किसी के पास नीली गियर वाली साइकिल है?” तुरंत 30–40 जवाब और साइकिल की तस्वीरें आ गईं। उसने एक चुन ली—जिसमें सात गियर थे!
लोग बच्चे के झूले, बीच चेयर, व्हीलचेयर, खिलौने, किताबें—हज़ारों चीज़ें बाँट रहे थे और बिना एक पैसा खर्च किए—तो झगड़ा भी नहीं!
रेबेका ने कहा: “लोगों की परवाह करना सीखो। चीज़ों से कम लगाव रखो। बस इतना याद रखो।”
“संपूर्ण पृथ्वी ही मेरा घर है”—इस भाव को जीती हुई, निशा सात-गियर वाली नीली साइकिल लेकर घर पहुंची।
रवि हैरान रह गया। रेबेका की बात उसके मन में गूंज रही थी: “इतना क्यों इकट्ठा करना? जब जाना है, तो साथ कुछ नहीं ले जाओगे।”
एक-एक करके निशा ने अपने घर की बेकार चीज़ें Buy Nothing ग्रुप पर पोस्ट करनी शुरू कीं। कई लोग उनका उपयोग करने लगे।
अब वह अपने शहर के बहुत से लोगों को जानती है। विचारों का आदान -प्रदान हो रहा है। भारत से दूर रहते हुए भी, कभी-कभी कोई मामा जैसा लगता है, कोई भैया जैसा। रिश्ते बन रहे हैं।
ज़िंदगी भर हम चीज़ें इकट्ठा करते रहते हैं—जबकि हमें पता है कि अंत में हम कुछ भी साथ नहीं ले जा सकते!
अब उसने निश्चय किया है—
चीज़ों की जगह, मोहब्बत, दोस्ती और रिश्ते इकट्ठा करने हैं।

