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चित्रनगरी संवाद मंच में एक सार्थक चर्चा

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई में बड़े ही आत्मीय माहौल में दिल्ली से पधारे सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय की संस्मरण पुस्तक ‘यादों के झरोखे से… : दिल्ली विश्वविद्यालय का स्मृति राग’ पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। रविवार, 18 जनवरी 2026 को केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव के मृणाल ताई हॉल में आयोजित यह ऐतिहासिक चर्चा जाने-माने कथाकार विभूति नारायण राय और वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश के सानिध्य में संपन्न हुई।
संयोजक व संचालक देवमणि पांडेय ने प्रस्तावना पेश करते हुए कहा कि इस किताब में दिल्ली विश्वविद्यालय के लेखकों के संघर्ष भी हैं और मंज़िल तक पहुंचने की उनकी दास्तान भी। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि मशहूर हस्तियों पर ये संस्मरण व्यंग्य की शैली में लिखे गए हैं, इसलिए बेहद पठनीय और रोचक हैं। पांडेय जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी और फ़िराक़ साहब के एक मज़ेदार प्रसंग का ज़िक्र किया तो उस पर ठहाके भी लगे।
व्यंग्यकार सुभाष काबरा ने अपने चिरपरिचित अंदाज़ में प्रेम जनमेजय का परिचय पेश किया, जो लीक से हटकर और दिलचस्प था। कथाकार हरि मृदुल ने प्रेम जी के कथेतर गद्य को विलक्षण गद्य की श्रेणी में रखते हुए कहा कि ये सिर्फ़ आलेख नहीं हैं, इनमें व्यंग्य की छटा छाई हुई है। मृदुल जी ने कई हस्तियों के महत्वपूर्ण प्रसंगों का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह पुस्तक दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित हस्तियों का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है।
आत्मकथ्य पेश करते हुए प्रेम जनमेजय ने कहा कि परसाई मेरे लिए एक पाठशाला हैं। उन्होंने व्यंग्य विधा के प्रति परसाई के नज़रिए को भी रेखांकित किया। प्रेम जी ने रामदरश मिश्र के साथ आत्मीय मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए उन पर लिखी अपनी नई किताब ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ के बारे में भी अपने अनुभव साझा किए।
दूसरे सत्र के आरंभ में विभूति नारायण राय और सूरज प्रकाश के सान्निध्य में प्रेम जनमेजय की नई पुस्तक ‘रामदरश मिश्र की व्यंग्य चेतना’ का लोकार्पण किया गया। प्रेम जनमेजय को बधाई देते हुए सूरज प्रकाश ने कहा कि एक अच्छे लेखक में नज़र, नज़रिया, स्मृति और अनुभव—ये चार चीज़ें होनी चाहिए और प्रेम जनमेजय में ये चारों मौजूद हैं।
‘शहर में कर्फ्यू’ जैसा चर्चित उपन्यास लिखने वाले कथाकार विभूति नारायण राय का परिचय सूरज प्रकाश ने विस्तार से दिया और साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर उनकी राय पूछी।
विभूति नारायण राय ने चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई की तारीफ़ करते हुए कहा कि आज यहां जितने श्रोता मौजूद हैं इतने श्रोता दिल्ली और इलाहाबाद की साहित्यिक गोष्ठियों में नहीं मिलते। साहित्य के वर्तमान परिदृश्य पर अपने विचार रखते हुए राय साहब ने कहा कि कहा कि इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण साहित्य के पाठक बढ़े हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली पुस्तक मेले में प्रवेश द्वार पर उन्होंने बहुत लंबी लाइन देखी। ऐसी ही लाइन उन्होंने पटना और कोलकाता के पुस्तक मेले में भी देखी थी। राय साहब के अनुसार कथेतर (Non-fiction) किताबों की मांग ज़्यादा है। दिल्ली पुस्तक मेले में ‘ए आई’ पर हिंदी में अनूदित किताबों की ज़बरदस्त बिक्री हुई।
सुभाष काबरा, हरि मृदुल, सुधाकर पांडेय, मधु चौधरी, नीता वाजपेयी, प्रज्ञा मिश्र, विराट गुप्ता आदि कई रचनाकारों ने विभूति नारायण राय से सवाल पूछे। सवालों का जवाब देते हुए राय साहब ने कहा कि 50 साल पहले भी लोग कहते थे कि साहित्य के पाठक नहीं हैं और आज भी कहते हैं। किताबों के पाठक हर जगह हैं। हर कोई मोबाइल में कुछ न कुछ पढ़ रहा है। जगह-जगह फेस्टिवल हो रहे हैं। फेस्टिवल में गंभीर चर्चाएं भी होती हैं।
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि यह लेखकों के लिए मुश्किल समय है। टिके रहना मुश्किल काम है। जोख़िम उठाना और सत्ता से टकराना भी ज़रूरी है, तभी हमारा लेखन सफल हो पाएगा।
कार्यक्रम की शुरुआत में अभिनेत्री मनीषा कंठालिया का कहानी पाठ हुआ। मनीषा एक बहुआयामी रचनाकार हैं। वे स्टोरीटेलर, थिएटर कलाकार, कवयित्री, लेखक और आरजे हैं। यही कारण है कि ‘डर के आगे’ कहानी उन्होंने बिना काग़ज़ देखे सुनाई। उनकी कहानी श्रोताओं को पसंद आई। उन्होंने अपनी दो ग़ज़लों का भी पाठ किया। कथाकार गंगाराम राजी और प्रो राम बक्ष इस अवसर पर विशेष रूप से मौजूद थे। कुल मिलाकर यह एक ऐसा आयोजन था जिसमें श्रोताओं को अपने कई सवालों के जवाब मिले और उनका अंतस समृद्ध हुआ।
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