राष्ट्रीय शिक्षा नीति में त्रिभाषा सूत्र को अपनाने का विरोध विभिन्न राज्यों में हो रहा है। तमिलनाड़ु में सन् 1937 से माध्यमिक स्कूलों में हिंदी पढ़ाए जाने के विरोध का इतिहास रहा है। इस साल फरवरी में एम के स्टालिन ने कह दिया कि हिंदी से उनकी मातृभाषा को खतरा है। अब वही विरोध महाराष्ट्र में आग की गति से फैल रहा है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुधवार को बैठक लेकर इस बारे में स्पष्टीकरण दिया है। मुंबई के अपने शासकीय निवास स्थान पर हुई बैठक में उन्होंने कहा कि त्रिभाषा सूत्र के बारे में साहित्यकारों, भाषा विशेषज्ञों, राजनेताओं आदि से चर्चा करके अंतिम निर्णय लिया जाएगा। बुधवार की बैठक में उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, शालेय शिक्षा मंत्री दादा भुसे, राज्यमंत्री डॉ. पंकज भोयर, महाराष्ट्र राज्य शैक्षणिक अनुसंधान तथा प्रशिक्षण परिषद के संचालक तथा शिक्षा विभाग के अधिकारी भी उपस्थित थे।
महाराष्ट्र के विद्यालयों में पहली कक्षा से हिंदी सिखाए जाने के विरोध में बुधवार को ही पुणे के कोथरूड महर्षी कर्वे की प्रतिमा के सामने आम आदमी पार्टी (आप) के कार्यकर्ताओं ने निषेध आंदोलन किया। आप के राज्य प्रवक्ता मुकुंद किर्दत का कहना है कि व्यावसायिक और आर्थिक प्रगति के लिए अंग्रेजी भाषा आवश्यक लगती है। मराठी मातृभाषा होने से उसके प्रति अपनापन, आस्था और गर्व है। उनका कहना है कि हिंदी भाषा को महाराष्ट्र की व्यवहार भाषा बनाने की महायुति सरकार की चाल है जिसका आप कार्यकर्ता विरोध कर रहे हैं।
हास्यास्पद है कि अंग्रेज़ी भाषा से किसी को कभी कोई खतरा महसूस नहीं हुआ। यदि किसी भाषा को हटाने की बात है तो क्यों ने अंग्रेज़ी को छोटी कक्षाओं से हटाया जाए। पूरे विश्व में अंग्रेज़ी तो बोली नहीं जाती। आपको कई देशों में जाने के लिए चीनी, जापानी, जर्मनी आना भी अनिवार्य है तो यदि सीखनी ही है तो सारी विदेशी भाषाएँ सीखा दी जाएँ, केवल अंग्रेज़ी ही क्यों? हिंदी के विरोध का जवाब देने वाले बड़ी मासूमियत से कह रहे हैं कि राज्य की स्वायत्ता और अपनी भाषा-संस्कृति की रक्षा करने की दिशा में यह पहल है। महाराष्ट्र में मराठी भाषा की अनिवार्यता उसी कड़ी का हिस्सा है। आप जिस प्रांत में रहते हैं, आपको वहाँ की भाषा आनी ही चाहिए, इसमें कोई दोराय नहीं। इसी तर्क पर क्या यह सही नहीं कि आप जिस देश में रहते हैं, आपको उस देश की भाषा से भी लगाव होनी चाहिए, कोई दुराव या अलगाव नहीं। मुंबई में ही हिंदी फिल्मों की मायानगरी है, जिससे राजस्व आता है। उसका विरोध करने का विचार किसी के मानस में नहीं आता।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार हैं और समसामयिक विषयों पर स्वांतः सुखाय लेखन करती हैं)
संपर्क -09850804068

