Homeभारत गौरवमेला एक, यात्राएँ अनेक: व्यापार मेले में प्रगति और अवसरों की कहानियाँ

मेला एक, यात्राएँ अनेक: व्यापार मेले में प्रगति और अवसरों की कहानियाँ

नई दिल्ली । दशकों से  व्यापार मेलों ने दिखाया है कि जब लोग, उत्पाद और विचार मिलते हैं, तो बाजार किस तरह विकसित होते हैं। इस वर्ष का भारत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला “एक भारत श्रेष्ठ भारत” विषयवस्तु के अंतर्गत इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। इसके 44वें संस्करण में 31 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 3,500 से अधिक प्रतिभागी प्रदर्शनी लगाने वाले एक साथ 11 देशों से आ रहे हैं, जो भारत मंडपम को संस्कृति और वाणिज्य के संगम में रूपांतरित रहा है। बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश जैसे सहयोगी राज्य, जिनमें झारखंड राज्य केंद्र बिंदु है, न केवल वस्तुएं, बल्कि अपने प्रदेशों की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को भी प्रस्तुत कर रहे हैं।

सरकारी विभागों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, एमएसएमई, स्टार्ट-अप, अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शकों और कारीगर समूहों के एक ही छत के नीचे आने से यह मेला छोटे उत्पादकों, पारंपरिक शिल्पियों और नए युग के उद्यमियों के लिए भारत के सबसे मजबूत मंचों में से एक के तौर पर विकसित हुआ है।

एक गलियारे में, मिस्र से आए इस्लाम कमाल, अपने संगमरमर के हस्तशिल्प को निहारते आगंतुकों को घनिष्ठता के साथ देखते हैं। उनका परिवार 25 सालों से आ रहा है, जो मेले के बदलते स्वरूप के साथ उनके व्यावसायिक सफर को समझने के लिए काफी है।

वे कहते हैं, “इस क्षेत्र में लगातार प्रगति हुई है। हमें हमेशा अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है और मांग भी बढ़ी है।” उनके लिए, भारत मंडपम “अब तक का सबसे बड़ा व्यापार मेला” है, एक ऐसी जगह, जहां सहयोग हमेशा बना रहता है और आगंतुकों की संख्या लगातार बढ़ती रहती है। उनका अनुभव कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों के अनुभव से मेल खाता है, जो इसलिए नहीं लौटते, क्योंकि उन्हें आना ही पड़ता है, बल्कि इसलिए कि भारत अपने आप में एक भरोसेमंद बाजार बन गया है।

तुर्की से आने वाले उलास के लिए, यह रिश्ता और भी गहरा है। वे कहते हैं, “हम करीब 24-25 सालों से भारत आ रहे हैं। पहले हम दूसरे व्यापार मेलों में जाते थे, लेकिन अब हम सिर्फ भारत में ही प्रदर्शनी करते हैं।” वे और उनकी टीम साल का आधा वक्त यहीं बिताते हैं, और उन्होंने ऐसे रिश्ते बनाते हैं जो मेले से भी आगे तक चलते हैं।

वे मुस्कुराते हुए कहते हैं, “हमारे ग्राहक हर साल लौटते हैं। यही हमें प्रेरित करता है।”

एक जगह पर, कोल्हापुरी चप्पलों की दुकान गुलज़ार है। सचिन सातपुते के लिए, यह मेला सिर्फ एक बाजार नहीं है; यह एक सांस्कृतिक स्थल है, जहां विरासत को सराहने और खरीदने वाले खरीदार मिलते हैं।

“इस तरह के आयोजन हमें मार्केटिंग और ब्रांडिंग में बड़ी मदद करते हैं,” वे कहते हैं। 15 दिनों में छः महीने की कमाई: उनके बेचे जाने वाले चमड़े की तरह ही ये आंकड़े भी ठोस हैं।

महाराष्ट्र की शोभा, जो चटनी, अचार और घी का कारोबार करती हैं, कहती हैं, “व्यापार मेले में यह हमारा दूसरा मौका है।” वह अपने पिछले अनुभव को याद करते हुए कहती हैं: “हमने लगभग 2-3 क्विंटल के उत्पाद बेचे, और मेला खत्म होने से 2-3 दिन पहले ही हमारा स्टॉक खत्म हो गया।”

वह इस प्रतिक्रिया को “बहुत अच्छा” कहती हैं, जो छोटे उत्पादकों के लिए एक भरोसा है, जो अक्सर किसी भी चीज से अधिक पहुंच पर निर्भर करते हैं।

यहां आने वाला हर शख्स व्यापार के लिए नया नहीं होता; कुछ तो बस एक अलग बाजार में कदम रख रहे होते हैं। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के मोहम्मद फाजिल आमतौर पर धातु के हस्तशिल्प और सजावटी सामान यूरोप और अमेरिका को निर्यात करते हैं। लेकिन इस बार, वह भारत मंडपम में एक नए उद्देश्य से आए हैं: “हम घरेलू बाजार में और अधिक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं,” वे कहते हैं। उनके लिए यह मेला एक परीक्षण स्थल है, एक ऐसी जगह, जहां ब्रांडिंग होती है और लोग भी आते हैं और हॉल के किसी भी कोने से नए खरीदार निकल सकते हैं।

हालांकि, कुछ यात्राएं बदलाव से कम नहीं होतीं। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता, उत्तर प्रदेश के इकराम हुसैन कहते हैं, “यह मेरा व्यापार मेले में दूसरा मौका है, और यह मेरे लिए बहुत फायदेमंद रहा है।” तीन महीने की बिक्री सिर्फ 15 दिनों में: वे इस अवसर को अनोखा बताते हैं।

“यहां मिले मौके ने मुझे अपने व्यवसाय का काफी विस्तार करने में मदद की है,” वे आगे कहते हैं। उनकी कहानी बताती है कि कैसे ऐसे मंच उन कारीगरों के लिए एक प्रेरणा बन सकते हैं, जो अपनी वर्कशॉप से भी बड़ा सपना देखते हैं।

थाईलैंड की किम लगभग 12 सालों से इस मेले में आ रही हैं। वह कहती हैं, “यहां आने वाले ग्राहक आमतौर पर अगले साल दोबारा आते हैं।” मेले के बाद उन्हें थोक में ऑर्डर भी मिलते हैं, जिससे पता चलता है कि यहां बने रिश्ते मेले से भी दूर तक फैले हैं।

मेले में कुछ देर घूमिए और एक नया पैटर्न उभर कर आपके सामने आएगा। चाहे वह मिस्र का संगमरमर हो, थाईलैंड के जेवरात हों, महाराष्ट्र का चमड़ा हो या फिर उत्तर प्रदेश का धातुकर्म, हर प्रदर्शनी वाला प्रगति, दृश्यता, जुड़ाव और आय की बात करता है, जो 14 दिनों के आयोजन से कहीं आगे तक फैली हुई है।

इस तरह के व्यापार मेले बिक्री बढ़ाने से कहीं अधिक करते हैं। ये एक ऐसा माहौल बनाते हैं, जहां कारीगरों को पहचान मिलती है; निर्यातकों को घरेलू बाजार मिलता है, और छोटे उत्पादकों को ऐसे ग्राहक मिलते हैं, जो उनके भरोसेमंद बन जाते हैं।

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