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देश की 565 रियसतों में से मात्र 16 पर ही ब्राह्मणों का राज था

जब भारत को अंग्रेजों ने छोड़ा तब 565 रियासतों में से सिर्फ 16 ब्राह्मण राजाओं द्वारा शासित थीं। सांगली, भोर, मिराज, कुरुन्दवाड, जामखंडी, औंध, रामदुर्ग और झाँसी ही किसी तरह से रियासत कही जा सकती हैं, बाकी कुछ मध्य भारत में चौबों की जागीर थीं।
औंध याद कीजिए तो महात्मा गाँधी के ग्राम स्वराज को लागू करने वाला पहली रियासत थी और 1939 के अपने स्वराज संविधान के अंतर्गत राजा ने अपनी सत्ता पंचायतों को सौंप दी थी।इस रियासत ने ऐसे शिक्षा सुधार लागू किये थे जिन्हें नेहरू जी ने true training in democracy कहा था। सूर्य नमस्कार को स्वास्थ्य सेवा का अंग बनाने वाली रियासत थी यह। सांगली की प्रजा परिषद् 1922 की थी।  जामखंडी की इन्दु पटवर्धन को princess of the people कहा जाता था। उन्होंने महलों के सुख पूरी तरह से त्याग दिये थे।
फीरोजपुर से पाकी मुसलिमों द्वारा अपहृत महिलाओं के पुनर्वास के लिए उन्होंने इतने काम किए थे कि जिनकी सर्वत्र सराहना हुई थी। उन्हें दलित मित्र का पुरस्कार दिया गया था और कर्नाटक ने ताम्रपत्र प्रशस्ति दी थी।इसके शंकरराव पटवर्धन देश के पहले राजा थे जिन्होंने भारत संघ में शामिल होने की स्वीकृति दी थी। इन्होंने बस तीन चीजें चाहीं थीं जिनमें से कोई वर्णवादी नहीं थी। एक जामखंडी को जिला बनाने की- हुआ यह कि उसे बगलकोट जिले का अंग बनाया गया। दूसरी थी बागलकोट-कुडाची रेलवे लाइन बनाने की जो परियोजना अभी तक चल ही रही है और तीसरा कृष्णा नदी पर जांबगी पर बाँध और सेतु बनाने की जो अब भी अधूरा पड़ा हुआ है। भोर रियासत ने भी भारत में शामिल होने की लगभग तब ही स्वीकृति दे दी थी जब जामखंडी ने दी थी। वैसे भी भोर प्रातिनिधिक शासन के प्रयोगों और अस्पृश्यता उन्मूलन के अपने क़ानूनों के कारण पहचान बनाने वाली रियासत थी।
फिर भी देखिए कि हमारे यहाँ ब्राह्मणों को ऐसे चित्रित किया गया जैसे वे ही शासक थे।565 में से मात्र 16. बाकी पर कौन शासन कर रहा था? क्षत्रिय शासक भी उन 565 में से 105 थे। बाकी मुस्लिम और आज के आरक्षित वर्गों से थे। इन ब्राह्मण शासकों ने किसी ने दलितिस्तान की तर्ज पर अपना स्वतंत्र ब्राह्मिनिस्तान नहीं माँगा था।
और ये ब्राह्मण शासक जनोन्मुखी थे।
पर आज के नैरेटिव-निर्माताओं को देखिए तो सब कुछ उलट-पलट हुआ पाएँगे।
(लेखक मप्र के सेवानिवृत्त आइएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मप्र के चुनाव आयुक्त हैं) 
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