बहुत कम लोग भारत में यह जानते हैं इस समय, विशेष कर कुशिक्षा के प्रभाव से आधुनिक हिंदू इस विश्व विदित सत्य को बहुत कम जानते हैं कि राष्ट्रवाद यानी नेशनलिज्म नाम की वस्तु केवल पौने 200 वर्ष पहले पहली बार यूरोप में कल्पित हुई।
इसके पहले वहां नेशनलिजम जैसी कोई चीज उनके इतिहास में ही नहीं थी क्योंकि कोई नेशन स्टेट ही वहाँ कभी नही था। इलाके थे, छोटी छोटी रियासत थी और state थे। यूरोप का पहला नेशन स्टेट है Germany जो 1870 मे बिस्मार्क ने 300 रियासतों को बल पूर्वक मिला कर बनाया। इंग्लैंड भी उसके बाद ही नेशन स्टेट क्रमशः बना है। उसके पहले इंग्लैंड कोई नेशन स्टेट नहीं था। जो अंग्रेज यहां आते थे वह व्यक्तिगत हैसियत से आते थे।
1858 में भी जब वहां के क्राउन ने भारत क्षेत्र के एक अंश की भूमि पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का कार्य किया तो वह कोई इंग्लैंड नामक राष्ट्र का भारत नामक राष्ट्र पर आक्रमण नहीं था। हस्तक्षेप भी राष्ट्र का नहीं था। केवल राजा रानी और उनकी सेना की एक टुकड़ी का था। तब तक इंग्लैंड में कोई स्टैंडिंग आर्मी नहीं थी और कोई नेशनल आर्मी उनकी नहीं थी। 300 से अधिक हिंदू राजाओं से संधि करके संधि पत्र पर दोनों ओर से हस्ताक्षर करने के बाद वे यहां आए थे और इस बात की घोषणा विक्टोरिया की ओर से भारत में जगह-जगह 1 नवंबर 1858 को की गई थी। तब तक उनका मुख्यालय कोलकाता था। दिल्ली नहीं।
तो कोलकाता में और प्रयाग एवं मुंबई मद्रास में भी तथा कुछ अन्य शहरों में यह विक्टोरिया की घोषणा सार्वजनिक रूप से पढ़ी गई कि अपने मित्र राजाओं के साथ हुए करार के अनुसार ही हम रहेंगे। हम उनकी सीमा मे कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे, उनके उत्तराधिकार के नियमों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे और उनसे आशा है कि वह अपनी सेना भेज कर हमारी सीमा में कब्जा नहीं करेंगे यानी भारत में जिस हिस्से पर हमारा कब्जा है, उसमें बलपूर्वक प्रवेश नहीं करेंगे और उससे कुछ हमसे छीनेंगे नहीं।
इंग्लैंड की रानी की यह घोषणा थी और भारत के राजाओं ने इंग्लैंड की रानी को वचन दिया था कि भारत के जिस हिस्से पर आप कब्जा कर रहे हैं, उस हिस्से को हम आपसे छीनेंगे नहीं। हम अपने राज्य में रहेंगे। आप अपने इलाके में रहिये। आपको भगा रहे राजाओं की जागीरें आपकी हैं। उनको जीतने मे हमारी मदद रही है।
अंग्रेजों के मित्र हिंदू व मुस्लिम परिवारों में से कुछ बच्चे जब इंग्लैंड पढ़ने गए और यूरोप में नेशनलिज्म शब्द का अचानक बढ़ता प्रभाव और चारों ओर फैल रही चर्चा पढ़ी और सुनी, तब उन्होंने भारत में इस शब्द का प्रयोग शुरू किया।
उसके पूर्व कंपनी के ही कुछ लोगों से सुनकर और अंग्रेजी साहित्य पढ़कर उस समय बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जगदंबा दुर्गा के एक रूप विशेष की तरह भारत माता की काव्यप्रतिमा और छवि प्रस्तुत की और बहुत ही सशक्त रचना वंदे मातरम में उनका भावना से भरा स्मरण और वर्णन एवं वंदन किया। उन दिनों संपूर्ण देश में राष्ट्रभक्ति की बात ही हो रही थी। भारत माता की भक्ति, राष्ट्र की भक्ति, यही शब्द प्रयुक्त होते थे। नेशनलिज्म शब्द को उसी राष्ट्र भक्ति का पर्याय मानकर श्री अरविंद आदि ने पहली बार प्रयोग किया लेकिन हिंदी में राष्ट्रभक्ति शब्द ही चलता रहा।
भारत में तो शास्त्रो में राष्ट्रवाद शब्द का कभी कोई प्रयोग हुआ ही नहीं है। यहां राष्ट्र की भक्ति, भारत माता की भक्ति की ही बात होती रही है।
वाद तो एक पंथ प्रवर्तन की प्रक्रिया हो सकती हैं। कोई वास्तविक आदर्श या लक्ष्य नहीं। भारत में जो भी व्यक्ति राष्ट्रवादी है वह तत्वतः अहिंदू है और इस अर्थ में वस्तुतः वह अभारतीय हैं यद्यपि वह निश्चित ही इंडियन है। यह जानना चाहिए।
(लेखक एतिहासिक व राष्ट्रवादी विचारों पर शोधपूर्ण लेख लिखते हैं)

