15 अगस्त 1947 की सुबह। दिल्ली के पुराने किले में लगे शरणार्थी कैम्प में एक छोटी 4 महीने की बच्ची बिलख रही है।
“बिटिया, चुप हो जा। मैं जानता हूँ, तू भूखी है। जल्दी दूध का इंतज़ाम करता हूँ।”
दीनानाथ से अपनी पोती का रोना देखा नहीं जा रहा था। बच्ची को चुप कराने का असफल प्रयास करते हुए बार-बार उसकी स्वयं की रुलाई छूट रही थी।
“बहनजी, कुछ देर मेरी पोती को रख लीजिए। भूखी है! मैं इसके लिए दूध लेकर आता हूँ।”
दीनानाथ ने हाथ जोड़ कर पास के टैंट में बैठी अधेड़ महिला से कहा।
“न बाबा न! क्या पता जान छुड़ा कर भाग रहे हो! बच्ची हमारे गले पड़ जाएगी।”
महिला ने टका सा जवाब दिया। विभाजन की विभीषिका ने लोगों के अंदर की सम्वेदना को कलुषित कर दिया था।
दीनानाथ को याद आया कुछ दिन पहले वो लाहौर का एक बड़ा लाला था। अपनी इसी पोती के जन्म पर उसने कितना दान दिया था!
“लो बाबा लड्डू।”
एक सफेद खादी का कुर्ता पहने आदमी ने आकर दीनानाथ को कहा।
“किस खुशी में?” — दीनानाथ की शून्य से निकलती आवाज़ ने पूछा।
“बाबा, हमारा देश आज़ाद हो गया। इससे बड़ी खुशी क्या होगी।”
“अच्छा!” व्यंग्य मिश्रित स्वर में दीनानाथ ने कहा।
“तो भाई! दो-तीन लड्डू दे दो।”
दीनानाथ भूखी बच्ची के मुंह में लड्डू के छोटे-छोटे दाने डालने लगा। बच्ची चुप हो गयी।
बचे हुए लड्डू दीनानाथ की हथेली पर थे। वह गौर से उन्हें देख रहा था।
उसके बेटे, भाई, पत्नी की चीखें उन लड्डुओं से छन-छन कर आ रहीं थीं। बेटियों, बहुओं के बलात्कार के दृश्य लड्डुओं में साकार हो गए थे। उनकी सिसकियां लड्डुओं के दानों में गूंज रहीं थीं।
दीनानाथ ने अपनी हथेली कस कर भींच ली। उसे लगा — उसकी मुठ्ठी में बन्द लड्डुओं से खून निचुड़ कर भारत की धरती पर फैल रहा है!
डॉ संगीता गांधी
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