Homeहिन्दी जगतन्याय की भाषा पर पटना उच्च न्यायालय में विचार-गोष्ठी का आयोजन

न्याय की भाषा पर पटना उच्च न्यायालय में विचार-गोष्ठी का आयोजन

पटना। राजेंद्र सभागार,पटना उच्च न्यायालय में वैश्विक हिंदी सम्मेलन द्वारा अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन के साथ आयोजित संगोष्ठी में अध्यक्ष पद से बोलते हुए ‘अखिल भारतीय अधिवक्ता कल्याण परिषद’ के अध्यक्ष धर्मनाथ प्रसाद यादव ने कहा कि महात्मा गांधी जी कहते थे कि भले ही अंग्रेज कुछ और दिन ठहर जाए लेकिन अंग्रेजियत को निकालना पहले जरूरी है। लेकिन इसके विपरीत हुआ यह है कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन अंग्रेजी और अंग्रेजियत ने यहां अपने पांव जमा लिए हैं। हमें न्यायपालिका सहित देश की व्यवस्था में अपनी भाषाओं को स्थापित करने के लिए संघर्ष करना होगा।

विचार-गोष्ठी के मुख्य वक्ता और ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ के निदेशक डॉ मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’ ने अपने संबोधन में कहा कि अंग्रेजों के शासन के समय जब अंग्रेज न्यायाधीश होते थे, तब भी यह बात उठी थी कि जनता न्यायाधीश की भाषा सीखे या न्यायाधीश जनता की भाषा सीखें? तब अंग्रेजी सरकार ने भी यह कहा था कि न्यायाधीशों को जनता की भाषा सीखनी चाहिए। लेकिन आजादी के 80 वर्ष बीत जाने पर भी हमें अपने देश में जनता की भाषा में न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, इसके पीछे अंग्रेज नहीं वे काले अंग्रेज हैं जो निहित स्वार्थ के कारण जनता की भाषा के बजाय अंग्रेजी का वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं।

अतिथि विशेष और ‘बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ ने कहा कि न्याय की याचना करने वाले पीड़ितों को उसकी भाषा में न सुना जाए और न्याय भी उसकी भाषा में न हो, तो इससे बड़ा अन्याय और क्या हो सकता है? क्या इससे देश के कर्णधारों और न्यायकर्ताओं को लज्जा नहीं आती? उन्होंने आगे कहा कि अरब अमीरात में, जहां की भाषा ‘अरबी’ है, वहाँ की न्यायपालिका में हिन्दी तीसरी भाषा के रूप में अपना स्थान बना चुकी है और भारत में ही ‘भारती’ की यह दशा, चिंताजनक है। विशिष्ट अतिथि एवं अपर महाधिवक्ता श्री खुर्शीद आलम ने कहा कि हिंदी एक महान भाषा है जिसका मूल स्रोत संस्कृत है।

पद्मश्री विमल कुमार जैन ने कहा कि भाषा की बात तो दूर की बात है, अंग्रेजियत का हाल यह है कि पिछले 50 साल से सुनते आ रहे हैं कि अदालत में यह काले कोट वाली वेशभूषा बदली जानी चाहिए और भारत के मौसम के अनुकूल वेशभूषा होनी चाहिए, लेकिन उसे भी हम आज तक नहीं बदल सके। हमें भारत के मौसम और भारत की जनता की आवश्यकताओं के अनुकूल न्याय व्यवस्था को बदलना होगा। वरिष्ठ अधिवक्ता उमाशंकर प्रसाद ने संविधान की भाषा संबंधी प्रावधानों पर प्रकाश डाला।

अधिवक्ता एसोसिएशन के संयुक्त सचिव और विधि-विमर्श पत्रिका के संपादक रणविजय सिंह ने कहा कि न्यायपालिका द्वारा जिस प्रकार भारतीय भाषाओ को नकारा जा रहा है उसके विरुद्ध हमें संघर्ष करना होगा और जो अधिवक्ता संघर्ष कर रहे हैं, उनके साथ देना होगा।

कार्यक्रम के संचालक-संयोजक अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद ने न्यायपालिका में अपने हिंदी के संघर्ष के बारे में बताया और कहा कि जब स्वतंत्रता संग्राम के लिए इतने लोगों ने बलिदान दिए  तो न्यायपालिका में जनता की भाषा में न्याय के लिए हमें भी कुछ बलिदान तो देना ही पड़ेगा। अधिवक्ता श्री अरुण कुशवाहा ने भी इस विषय पर अपने विचार रखें।

कार्यक्रम के दौरान वैश्विक हिंदी सम्मेलन के निदेशक डॉ. मोतीलाल गुप्ता आदित्य द्वारा राष्ट्रीय ‘अधिवक्ता कल्याण परिषद’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष धर्मनाथ सिंह यादव को तथा हिंदी सेवी मूरत दास को वैश्विक हिंदी सम्मान से विभूषित करने की घोषणा की गई ।

कार्यक्रम के अंत में डॉ गुप्ता द्वारा बड़ी संख्या में उपस्थित अधिवक्ताओं और अन्य महानुभावों को शपथ दिलवाई गई कि वे बिहार में न्यायपालिका के हर क्षेत्र में हिंदी की स्थापना के लिए हर संभव प्रयास करेंगे और इसके लिए संघर्ष करने वाले अधिवक्ताओं का तन, मन और धन से साथ देंगे।

साभार-vaishwikhindisammelan@gmail.com

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