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सकारात्मक विचार, सार्थक पहल, सटीक अभिव्यक्ति, समुचित संवाद और सतत् प्रतिपुष्टि

विचार जहाँ आन्तरिक शक्ति को गतिशील करता है वहीं कार्यान्वयन के लिए जागरूक रहकर आगे का पथ निर्मित करता है। सकारात्मक विचार रचनात्मकता को ऐसा वितान प्रदान करते हैं कि उस वितान के भीतर सार्थक पहल करने वाले व्यक्तित्व की सटीक अभिव्यक्ति पर समुचित संवाद करते हुए लोग जुड़ते चले जाते हैं और वैचारिक सन्दर्भ के फलीभूत होने का उजास फैलने लगता है। इस उजास के प्रभाव को स्थायित्व प्रदान करने और सामाजिक स्तर पर सदुपयोगी बनाने में सार्थक और अनुकरणीय सन्दर्भ विकसित करने तथा अपनी अभिव्यक्ति और अभियान को सार्थकता के सोपान प्रदान करने के लिए ऐसे व्यक्ति सतत् रूप से प्रतिपुष्टि करते रहते है।

बानगी के तौर पिछले दिनों सोशल मीडिया पर  पर्यटन – संस्कृति जागरूकता अभियान कार्यक्रम के अंतर्गत आयोजित हुई प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के सर्वेक्षण के लिए पूछे गए प्रश्नों के उत्तर कदाचित्  इसलिए पूछे गए कि प्रतिभागी एवं जो प्रतिभागी नहीं रहे ; किन्तु इसे देखा है ; वे भी अपने विचार प्रेषित करेंगे तो निश्चित रूप से आयोजन को और अधिक सफलता के सोपानों तक पहुँचाया जा सके।

मुझ (विजय जोशी) से भी यह विचार साझा किया तो पर्यटन – संस्कृति जागरूकता अभियान के अंतर्गत आयोजित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के सर्वेक्षण के लिए 08 अक्टूबर को 2025 को प्रातः सवा नौ बजे पूछे गए प्रश्नों के उत्तर मैंने (विजय जोशी) साँय पोने पाँच बजे इस प्रकार से प्रेषित किए –

“1. पूछे गए प्रश्नों को आप किस तरह देखते हैं।

  • ये सभी प्रश्न अपने क्षेत्र और भारतीय पर्यटक स्थलों के बारे में जानने, खोजने और उन्हें समझने का अवसर देते हैं।

2. क्या पर्यटन – संस्कृति के समग्र विषयों को छूने का प्रयास किया गया ? कौन कौन से विषय रहे ? क्या कोई विषय छूट गया ?

  • इन प्रश्नों में भारतीय संस्कृति और सभ्यता के साथ राष्ट्रीय धरोहर और कलात्मक सन्दर्भों जैसे विषय सम्मिलित रहे। साहित्यिक सन्दर्भों को और अधिक लिया जा सकता था।

3. जागरूकता उत्पन्न करने में ये आयोजन किस तरह सहायक बनते हैं?

  • इस प्रकार के आयोजन अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक धरोहर के साथ वर्तमान के विकास क्रम को भी समझने और परखने का अवसर प्रदान करते हैं।

4. इस तरह की प्रतियोगिता के क्या लाभ हैं?

  • इस तरह की प्रतियोगिताएँ प्रतिभागी और सामान्य जन की जान अभिवृद्धि के साथ अपने स्वयं के कौशल को निखारने का अवसर देती है।

5. आपने अपने ज्ञान के अतिरिक्त उत्तर खोजने में किन माध्यमों का उपयोग किया?
गूगल, पुस्तकें, परिचितों से विमर्श आदि।

  • स्व अध्ययन

6. आप अपने लिए किस तरह इसे उपयोगी मानते हैं?

  • इससे कई स्थलों और सन्दर्भों को समझने के लिए स्वाध्याय के प्रति रझान हुआ।

7. अन्य कोई आपके विचार ?

  • पर्यटन – संस्कृति जागरूकता अभियान के अंतर्गत आयोजित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता के साथ तत् स्थलीय सामूहिक प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम और ऐतिहासिक पुरातत्विक महत्व के स्थलों की स्मृति पर आधारित चित्रकला प्रतियोगिता, स्थान विशेष पर आलेख – निबन्ध प्रतियोगिता तथा आशु व्याख्यान भी रख कर अधिक रुचिकर एवं संभागित्व बढ़ा सकते हैं।

इस प्रकार अपने आयोजन और सकारात्मक विचार को सार्थक रूप से साकार करने के लिए निरन्तर संवाद के द्वारा प्रतिपुष्ट करने वाले बहुआयामी व्यक्तित्व धनी ने जब अपनी सेवाकाल के दौरान बच्चों में संस्कृति के प्रति लगाव पैदा करने और बाल प्रतिभाओं को सामने लाने के लिए सूचना केंद्र द्वारा इनरव्हील क्लब कोटा के सहयोग से 10 वर्ष तक निरंतर बरसात के मौसम में तीन दिवसीय ” मल्हारोत्सव ” का आयोजन किया तो तत्कालीन जिला कलेक्टर आर. पी. जैन साहब को इतना पसंद आया कि उन्होंने इस आयोजन को 100 वें राष्ट्रीय  दशहरा मेले से जोड़ कर चिर स्मरणीय बना दिया जो मेले का लोकप्रिय कार्यक्रम बन गया और आज तक बीते कई वर्षों से निरन्तर आयोजित हो रहा है और लोकप्रिय बना हुआ है।

यही नहीं वे अपने सकारात्मक विचारों के साथ अपनी अभिव्यक्ति से बच्चों के साथ जुड़ाव रख कर उनमें रचनात्मकता के कौशल को संरक्षित करने में भी प्रयासरत हैं।
इसी कड़ी में विश्व पर्यटन दिवस के संदर्भ में उन्होंने संस्कृति – साहित्य- मीडिया फोरम, कोटा द्वारा  नागरिकों में जागरूकता उत्पन्न करने के उद्देश्य से दस दिवसीय “पर्यटन और संस्कृति जागरूकता अभियान” चलाया। जिसके अन्तर्गत सोशल मीडिया पर दस चरणों में 28 सितम्बर से  7 अक्टूबर  तक कला, संस्कृति, पर्यटन पर प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। प्रतियोगिता में हाड़ौती, राजस्थान और देश के सन्दर्भ में कुल 160 प्रश्न पूछे गए। जिनमें 75 प्रश्न फोटो पहचान से सम्बन्धित थे। प्रतियोगिता में राजस्थान, बिहार, उत्तरप्रदेश राज्यों के 161 प्रतिभागियों ने रूचि पूर्वक भाग लिया। यह एक सकारात्मक सोच और सार्थक पहल का एक सोपान रहा।

इस सोपान को प्राप्त करने वाले यह व्यक्तित्व ” मिशन बाल मन तक ” को ही क्रियान्वित नहीं कर रहे अपितु अपनी सटीक अभिव्यक्ति से भी ऐसे रचनात्मक आयोजनों से जन सहभागिता और आयोजन विशेष से सम्बन्धित हर वय के लोगों को जोड़ने की पहल कर रहे हैं –

प्रतियोगिताएं : एक मनोरंजक खेल है –

प्रतियोगिताएं सामान्य ज्ञान में वृद्धि करती हैं, दिमाग की कसरत करती हैं, ज्ञान के स्तर को बताती हैं और स्वास्थ्य मनोरंजन करती हैं। अपने को बच्चा ही समझे। जिसके दिल और दिमाग में बचपन जिंदा रहता है उस से जिंदादिल इंसान कोई हो नहीं सकता। कितने भी बड़े हो जाए बचपन में जिएंगे तो कई समस्याएं भी स्वत: दूर हो जाएंगी। बाल साहित्य सृजन की सफलता के लिए तो कहा भी यही जाता है कि बच्चा बन कर सोचोगे तो सृजन अच्छा होगा। बचपन में जी कर देखो तो जीवन का आनंद ही कुछ और हो जाएगा।

साहित्य – संस्कृति की दो बूँद –

राजस्थान में कोटा में विगत दो वर्षों से साहित्य – संस्कृति के संरक्षण की दृष्टि से  बच्चों को इनसे जोड़ने और समझ पैदा करने के लिए अभियान चला रखा है। शिक्षक और साहित्यकार आगे आ कर इसे सफल बनाने में सहयोग कर रहे हैं।

इस अभियान की गूंज केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय और साक्षरता विभाग तक भी पहुँची कि अंचल के बच्चों से कहानी , कविताएं और लोक गीत लिखने से जोड़ा जाएगा। अब बच्चों को साहित्य – संस्कृति की दो बूंद पिला कर आने वाले समय के लिए साहित्य और संस्कृति के संरक्षण के बीज पैदा किए जाएंगे।

इस सन्दर्भ ने सृजनशील ऊर्जावान व्यक्तित्व में एक नया जोश भरा जिस से वह आगे और भी ज्यादा ऊर्जा के साथ कार्य करने को उद्धत हुए।

ऐसे रचनात्मक सोच और समर्पित भावना जे धनी ने विगत वर्ष प्रारंभिक चरण में पाँच हजार बच्चों का प्रत्यक्ष रूप से साहित्य – संस्कृति से जोड़ा जो सबके सामने आया। इस वर्ष उन्होंने कहानी और कविता लेखन विधा को भी जोड़ा और अब तक तीन माह के अल्प समय में विभिन्न शिक्षण संस्थानों के ढाई हजार से अधिक बच्चे इस विधा से जुड़ कर पुरस्कृत हो चुके हैं।

अपने कार्य की प्रगति और सफलता के आयाम को जब उन्होंने  गूगल पर खोजा तो सामने आया कि -” कोटा और हाड़ौती अंचल में बच्चों को साहित्य और संस्कृति से जोड़ने के लिए कई अभियान चलाए जा रहे हैं, जिनमें “मिशन बाल मन तक”, विभिन्न साहित्य मेलों और प्रतियोगिताएं शामिल हैं। ये अभियान बच्चों में रचनात्मकता को बढ़ावा देने, साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने और संस्कृति के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर केन्द्रित हैं।” यह अभिव्यक्ति कार्य के सकारात्मक आयाम को उभारती है जो उनके कार्य एवं समर्पण की एक बानगी है।

ऐसे ऊर्जावान व्यक्तित्व के धनी तथा सकारात्मक विचार, सार्थक पहल, सटीक अभिव्यक्ति, समुचित संवाद और सतत् प्रतिपुष्टिकरण के साथ सहजता से अपने कार्य को सामाजिक चेतना के सोपान तक पहुँचाने वाले व्यक्ति हैं – “डॉ. प्रभात कुमार सिंघल” जिन्होंने अद्यतन साहित्यिक पत्रकारिता करते हुए अंचल के साहित्यिक परिदृश्य को समृद्ध ही नहीं किया वरन्  “जियो तो ऐसे जियो,” “नारी चेतना की साहित्यिक उड़ान” एवं  “राजस्थान के साहित्य साधक” जैसी कृतियों के साथ संस्मरण कृति नई बात निकल कर आती है को सृजित कर साहित्यिक परिदृश्य को अपने समीक्षात्मक तथा रचनात्मक कौशल से दिशाबोधित किया है।

अपने लेखन को समर्पित ऐसे सृजनशील व्यक्तित्व डॉ. प्रभात कुमार सिंघल का जन्म 15 अक्टूबर, 1953 को कोटा में हुआ। आप राजस्थान सरकार के सूचना एवं जन-संपर्क विभाग से अक्टूबर, 2013 में संयुक्त निदेशक पद से सेवा निवृत्त हुए। इतिहास, पुरातत्व, कला-संस्कृति, पर्यटन, पत्रकारिता और साहित्य पर आपकी 51 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी पर्यटन पर 10 पुस्तकें वीएसआरडी एकेडमिक पब्लिकेशन हाउस, मुंबई के प्लेटफार्म से 160 देशों में उपलब्ध कराई हैं। संस्कृति के अध्ययन के लिए निजी खर्च पर 18 राज्यों और नेपाल की यात्रा कर चुके हैं। देश की कई प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा आपको ग्लोबल, राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। आप सतत् रूप से लेखन एवं पत्रकारिता में सक्रिय और समर्पित हैं।

– विजय जोशी
कथाकार एवं समीक्षक, कोटा

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