राहुलजी की साहित्यसाधना या तपस्या की सबसे बड़ी उपलब्धि उनका लोकोन्मुखी दृष्टिकोण है ।उन्होंने न कभी सामान्य जन को भुलाया ,न परम्परा को , न समष्टिभाव को और न लोकमंगल को।
१९३३ में गंगा के पुरातत्त्व विशेषांक में महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने एक निबन्ध लिखा था , जिसमें उन्होंने लोकसाहित्य के संकलन की प्रेरणा दी थी और उसके महत्त्व का प्रतिपादन किया था ! हिन्दी में लोकसाहित्य के प्रति जागरण का यह सबसे पहला स्वर था ! उन्हॊने स्वयं भी कौरवी के लोकगीतों और लोककथाओं का संकलन किया , जो. “आदि हिन्दी के गीत और कथाएं ” नाम से प्रकाशित हुआ !
उनकी घुमक्कड़ी का प्रयोजन लोकजीवन से जुड़ा हुआ है।
काशी नागरी प्रचारिणी सभा ने सभा ने जब हिन्दी साहित्य के वृहद इतिहास की योजना बनाई तो आपने हिन्दी की लोकभाषाओं और उनके साहित्य का प्रश्न उठाया , परिणाम-स्वरूप सोलहवें खंड को हिन्दी की लोकभाषा और साहित्य पर केन्द्रित किया गया ! उसके प्रधान संपादक राहुलजी ही थे , हालाँकि इस बीच वे चीन की यात्रा पर चले गये थे और डा. कृष्णदेव उपाध्याय को अपना सहायक नियुक्त कर दिया था !इस ग्रन्थ में उन्होंने कुलुई , चंबियाली और काँगड़ी जैसी लोकभाषाओं को भी स्थान दिया था !
लोकसाहित्य को लेकर लिखे गये अनेक शोधप्रबन्धों की भूमिका उन्होंने लिखी ! वे लोकसाहित्य की शब्दावली को लेकर बहुत सावधान थे और चाहते थे कि इस प्रकार की शब्दावली के कोश तैयार किये जायें ! वे स्वयं भी अपने लेखन में इस प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते थे !
लोक संबंधी उनका दृष्टिकोण इसके भी आगे बढ़ चुका था , उन्होने लोकभाषाओं को और लोकसाहित्य को जागरण का माध्यम बनाया ! उन्होंने स्वयं भी भोजपुरी में ८ नाटकों की रचना की और उनमें लोकधुन के आधार पर स्वयं भी गीत लिखे ! लोक से उनका संबंध अकादमिक ही नहीं था , इस बात को किसान -आन्दोलन में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका से जाना समझा जा सकता है ।
पंडित विद्यानिवासमिश्र बहुत समय तक महापंडित राहुलसांकृत्यायन के साथ रहे थे ।एक दिन वे कुशीनगर गये । वहाँ भगवान् बुद्ध की प्रतिमा है, जिसमें वे महानिर्वाण की मुद्रा में लेटे हुए हैं ।राहुलसांकृत्यायन ने प्रतिमा के चरणों में माथा नवाया ।मिश्रजी ने भी नवाया ।लेकिन मिश्रजी माथा नवाने के बाद थोड़े मुस्करा दिये। राहुलबाबा ने उनकी मुस्कान को देखा भी और समझ भी लिया ,आखिर बाबा कम्युनिस्ट थे ।
राहुलबाबा बाहर आकर बोले – पंडित ! तुमने सोचा होगा कि मैंने बौद्ध चीवर छोड़ दिया है , बुद्ध का मेरे लिये क्या महत्त्व ?देखो पंडित ! सच यह है कि मनुष्य कहीं न कहीं झुकना चाहता है , वह भले ही किसी ग्रन्थ के आगे झुके ,किसी ढूह के आगे झुके ,कहीं भी झुके !झुकने में उसकी हेठी नहीं होती । झुकने के कारण ही उसके मन में ऊंचे उठने का एक नया संकल्प उभर आता है ।महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने कहा था कि विगत ढाई हजार साल के अन्तराल में संसार में बुद्ध से बडा कोई विचारक नहीं हुआ , जिसने मनुष्यता को बहुत दूरतक प्रभावित किया ।
राहुल की लोकोन्मुखी दृष्टि थी ।बहुत से लोग यह सोचते थे कि राहुल जैसा महापंडित क्यों निपट गंवार लोगों के बीच इतना समय नष्ट कर देता है ??एक दिन विद्यानिवासमिश्र जी ने उनसे पूछ ही लिया ,विद्यानिवासमिश्र जी उन दिनों राहुलजी के साथ पारिभाषिक-शब्दावली के काम में लगे थे , युवा थे ।राहुलजी ने ज्ञान का एक सूत्र देते हुए कहा कि – “देखो, हरेक आदमी के पास जीवन का अनुभव होता है,उसमें एक अद्वितीयता होती है और उसे विनम्र भाव से ग्रहण करना चाहिये ।”एक दिन विद्यानिवासमिश्र जी के गांव के एक चाचा उनसे मिलने आये , वे दो दर्जा पास थे , किताब पढ लेते थे ।
उन्होंने अज्ञेय का उपन्यास “शेखर : एक जीवनी” भी पढा था ।उस दिन वे राहुलजी से बतिया रहे थे कि अज्ञेयजी राहुलजी से मिलने आ गये ।राहुलजी ने अज्ञेयजी के सामने ही गांव के चाचा से पूछा कि आपने ” शेखर : एक जीवनी” पढा है ?उन्हें क्या पता था कि उपन्यास का लेखक सामने ही आया हुआ है, वे बोले -का बताई , अज्ञेय मिलते त उनके दुइ हाथ लगवतीं , शेखर के कहीं क त नाहीं रख लें ! राहुलजी खिलखिला कर हंस पडे और अज्ञेयजी मुसकाने लगे ।जब चाचा ऊपर चले गये तब अज्ञेयजी ने कहा कि -देखिये मुझे मंजूरी मिल गयी , इतने कम पढे आदमी तक शेखर संवेदना जगा सका !राहुलजी ने भी कहा कि संवेदना सच्ची हो तो हृदय में उतर जाती है !
राहुल सांकृत्यायन ने जनता की लड़ाई लड़ी । राहुल सांकृत्यायन ने भोजपुरी में नाटक लिखा था > जोंक !इसमें राहुलसांकृत्यायन ने जमींदार को खून चूसने वाले जोंक के रूप में चित्रित किया था !दुर्दिनमां के हलक हरान , रे फ़िकिरिया मारलक जान !बैल बेच रजवा के दे लूँ छोड़इ नहिं बेईमान !जमींदार के जुलुम होइबे चेतइ भाइ किसान ! अमवारी में जमींदार के गुंडों ने राहुलबाबा को पीटा था , जमींदार का हाकिमों पर असर था , परिणाम-स्वरूप राहुलजी को जेल की हवा भी खानी पड़ी !
जिस साहित्य में जनता की लड़ाई नहीं है , जिस साहित्य में करुणा नहीं है , जिस साहित्य में लोकजीवन की संवेदना नहीं है , वह साहित्य नहीं,कचरा है।
महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने मातृभाषा शीर्षक निबन्ध लिखा था और भारत में लोकभाषाओं के जनतन्त्र का सवाल उठाया था ।
राहुलजी का भोजपुरी में लिखा हुआ एक पत्र
हर्नक्लिफ ,हैपी वैली , मसूरी
21.6.52
रघुबंस भैया,
चिट्ठी पाइके औ इ खबरि सुनिके मन बड़ परसन्न भइल कि ” भोजपुरी ” पतिरिका निकरे के बा । जबले मतारी के दूध के साथ पीयल भाखा के मान-सम्मान ना बढी तबले गरीब जनता के उधार ना होई, येहि बात में कौनो अनेसा नइखे । ई बहुत अचरज और अफसोस के बात इहो जो दुई करोड़ भोजपुरिहा बेटा-बेटी के रहतौ हमनी के भाखा के कतहूँ पुछार नइखे , उ टावर-टूवर लेखा बाटके भिखारी बनल बिया ।
भोजपुरी के कवन रुप होखे के चाहीं , ओमे कविता में कथा में कइसे लिखेके चाहीं, सबदन में इस्तिरी मैं पुरुखा के विचार कइसे होखे के चाहीं , एहि सब बातन के फेर में अबहिन पड़े के नइखे । अबहिन त निमन-निमन चीज कविता में हो , चाहे बतकही में, लिखके आवे के चाहीं ।
हमनी के भाखा में छपरा , आरा , और बनारस-आजमगढ में फरक बाटे और फरक तो दस-दस कोस में देखल जाला । एके अबहिन फिकिर करैके काम नइखे । जेकर बोली जौना इलाका के होखे , उ अपने बोली में लिखो , आगे चलके अपने रहता निकरि आई । भोजपुरिहा जवान अपनी बोली में जे किछु थोड़ा-बहुत लिखत बाडे , ओसे पता लागता जे भोजपुरी भाखा के आग उजियार बा ।
हम इहै चाहत बानी कि मिरजापुर , बनारस , जौनपुर , आजमगढ , गाजीपुर , बलिया , गोरखपुर , देवरिया , छपरा , चौपारन औ आरा के सब भोजपुरिहा भाई अपना बुद्धि , बल , पौरुख , बिरताई से समुचा देस के फैदा करावे खातिर अपनी भाखा के मदत से उठिके खड़ा होई जाव । ” भोजपुरी ” चिरंजीवी रहे , इहे हमार मनसा बा ।
अपने के
राहुल
( भोजपुरी वर्ष 1 , अंक 1 जुलाई , 1952 )

(लेखक साहित्यिक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं)

