‘ईं धरती रो रुतबो ऊंचो ,आ बात कहे कूंचो कूंचो ।’
जी हां, ये राजस्थान की धरती है जिसके कण-कण में इसकी यशोगाथा के स्वरों की गूंज है। मानवता की सुवास है । प्रचंड उर्वरा शक्ति है जो नानाविध रूपायित हो जनमानस को लुभाती रही है। साहित्यकारों की रचनाधर्मिता में इसकी मुखरता का प्रमाण है, “राजस्थान के साहित्य साधक”।
श्री प्रभात सिंघल जी की साधना का सुफल है,”राजस्थान के साहित्य साधक”।
‘जो जाको गुण जांणई सो तेहि आदर देत’
साधक ने साधकों को खोजा और फिर अपनी खोजी प्रवृत्ति से बहुत कुछ खोज निकाला। सामने आई एक शानदार कृति के नाम फर राजस्थान के मंजे हुए साहित्यकारों के कृतित्व एवं उसके आधारभूत व्यक्तित्व की सुसज्जित झांकी!
कौन-से कारकों ने आकर्षण दिया है इसे?कितना विस्तार है इसका? आखिर क्या-क्या है इसमें? क्या उपादेयता है इसकी? ऐसे अनेक प्रश्न इस संबंध में विचारणीय हैं।
आकर्षक आवरण से सुसज्जित , बहुमान्य रचना धर्मियों के प्रति भरपूर सम्मान-भाव से सम्पृक्त सार्थक शीर्षक, ‘राजस्थान के साहित्य साधक’ से अलंकृत,सजिल्द निर्मित 383पृष्ठों की यह पुस्तक समूचे राजस्थान के प्रतिष्ठित रचनाकारों के श्रमफल के सारतत्व को स्वयं में संजोए हुए है।
राजस्थान के हिन्दी साहित्य की इस पुस्तक के मुख- पृष्ठ पर भारतीय संस्कृति को इंगित करता चित्र लेखक की विशिष्ट रूचि के साथ उस चातुर्य को भी दर्शा रहा है जो पुस्तक द्वारा साहित्य और संस्कृति के गहरे संबंध को पुस्तक के कई आलेखों की समाप्ति पर दिए गए चित्रों से रेखांकित किए हुए है। संभवतः लेखक इनके द्वारा कहना चाहते हैं कि संस्कृति के संरक्षण एवं परिष्कार का दायित्व भी साहित्यकार का है;न कि चित्रण मात्र।
श्रेष्ठ साहित्य के नाम पर क्या नहीं है इस कृति में?एक नहीं अनेकानेक साहित्य- साधकों का लेखन जहां एकत्र हो वहां तो अनेकों तीर्थों का लाभ ही मिलेगा।
जरूरत है ऐसे लाभार्थियों की जो लाभ लेने की लगन व क्षमता रखते हैं या प्राप्त करना चाहते हैं। अधिकाधिक पाठक इस कृति में रुचि लेकर इस कृति में आंशिक रूप में वर्णित रचनाधर्मियों के संपूर्ण साहित्य का रसास्वादन कर सकें एतदर्थ प्रेरणार्थ कृति की उपादेयता पर दृष्टिपात उचित होगा।
*मथे हुए दधि की शक्ति मक्खन में समा जाती है। इसी प्रकार परिवेश से उद्भूत संवेदन, चिन्तन, मनन, मंथन से स्थानीय विशेषताएं रचनाकार के सृजन में समाविष्ट हो जाती हैं।इन विशेषताओं का अध्ययन स्थान विशेष से जुड़े साहित्य से किया जा सकता है । इस संबंध में इस कृति में प्रचुर जानकारी उपलब्ध है । अतः राजस्थान के साहित्यकारों के कृतित्व पर प्रकाश डालने का जो महत्वपूर्ण कदम डॉ.प्रभात सिंघल जी ने पुस्तक लेखन के श्रम द्वारा उठाया है वह निश्चय ही श्लाघनीय है।
मन के पोषण-तोषण के लिए सत्साहित्य पढ़ना आवश्यक है।इस कृति से सत्साहित्य काआनन्द लिया जा सकता है और आनन्द की भरपूर संतुष्टि के लिए सत्साहित्य के बड़े-बड़े भंडारों तक सुगमता से पहुंचा जा सकता है।पुस्तक- प्रेमी उत्सुकता से इसे पढ़ें तो उनमें हिन्दी साहित्य के प्रति आस्था जागृत होगी। यदि आस्था है तो उसमें वृद्धि होगी।
साहित्य प्रेमियों में साहित्य काआनंद लेने की जितनी क्षमता होगी वे उतना भरपूर आनंद इस पुस्तक से ले सकेंगे।वे प्रयत्न करें तो सोच और साहित्य की समझ का स्तर भी इस पुस्तक के पठन से उन्नत कर सकेंगे। इस दृष्टि से साहित्य के विद्यार्थियों के लिए भी यह पुस्तक लाभकारी सिद्ध होगी।
शोधार्थिर्यों के लिए तो यह कृति अमूल्य है । भविष्य में हिन्दी साहित्य का इतिहास लिखने में भी यह कृति मददगार होगी।
यह एक मात्र पुस्तक राजस्थान के श्रेष्ठ 62 साहित्यकारों के सारगर्भित कृतित्व एवं व्यक्तित्व से सुपरिचित करवाती है। अन्यथा इतने साहित्यकारों का साहित्य प्राप्त कर उसे पढ़ना दुष्कर है।
समुद्र से मोती निकालना दुष्कर है। व्यक्ति विशेष ने उन्हें निकाल कर उनके निहित सौंदर्य को स्पष्ट कर सुलभ किया है तो उस श्रम का सम्मान करते हुए सहज ही लाभ लिया जा सकता है। यहां तो पुस्तक लेखक ने रचनाकारों के साहित्य को बोधगम्य बनाकर प्रस्तुत किया है।
लेखक ने स्वयं अपने बारे में भी जो विस्तृत जानकारी दी है, वह भी कम प्रेरक नहीं । इससे भी पाठक पुस्तक के प्रति श्रद्धावान् होंगे। श्रद्धावान् लभते ज्ञानं।
कृति में रचनाकारों के कृतित्व को पढ़कर पाठकों के मन में प्रश्न उठेगा आखिर किन परिस्थितियों में पल-बढ़ कर यह लेखन संभव हुआ, तो जवाब तैयार है ,रचनाकार के परिचय के रूप में। इससे मनोवैज्ञानिक अध्ययन का अवसर प्राप्त होगा
इस कृति से बहुमूल्य सीख प्राप्त होना संभव है। पुस्तक में उल्लेखित रचनाधर्मियों व पुस्तक -लेखक के सम्मान, पुरस्कार, प्रकाशन आदि का वर्णन भी पाठकों में आस्था व प्रेरणा जगाएगा।
पुस्तक से 62 प्रेरक व्यक्तित्वों का परिचय मिलता है जो भव्यता में एक से बढ़कर एक हैं।
उदाहरणार्थ यहां उनकी कुछ विशिष्टताओं पर प्रकाश डालना चाहूंगी –
लेखन की तीव्र इच्छा शक्ति -श्री अतुल कनक जी ने ‘अंतिम तीर्थंकर’ उपन्यास पूर्ण करने के लिए 550 दिन तक भोजन का त्याग किया।
डॉ.ओम नागर देश के प्रथम युवा कवि और लेखक हैं जिन्हें देश के तीन प्रतिष्ठित साहित्य संस्थानों द्वारा युवा पुरस्कार से नवाजा गया है।
डॉ.रति सक्सेना की कविता को चीन की लोकप्रिय पुस्तक ‘दुनिया की 110 आधुनिक कविताएं’के लिए चुना गया।
पुस्तक में उल्लेखित दर्जनों साहित्यकार अनेकानेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। स्व. डॉ. महेंद्र भानावत जी लगभग 6 दर्जन पुरस्कार व सम्मान प्राप्त कर चुके हैं। जैसे 2.50लाख रु.का लोक भूषण पुरस्कार, 2.25लाख रु.का डॉ कोमल कोठारी पुरस्कार, स्वर्ण पदक आदि।
डॉ.अखिलेश पालरिया जी ने 40वर्षों में 40 पुरस्कार प्राप्त किए । वेद व्यास जी को साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान स्वरूप 2 लाख 51 हजार रुपए की राशि प्रदान की गई। डॉ.विमला भंडारी जी को 6 दर्जन से अधिक पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए।
डॉ.विकास दवे 150 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से विभूषित हैं।
इस पुस्तक में उल्लेखित कितने ही ऐसे रचनाधर्मी हैं जिनके मुख्य पुरस्कारों को भी यहां गिनाना दुष्कर है। इस पुस्तक के पठन से नई पीढ़ी के साहित्यकारों को इनकी जानकारी मिलेगी और उनका उत्साहवर्धन होगा।
भावनाओं का परिष्कार ; सामाजिकों की भावनाओं को परिष्कृत करना साहित्य का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। इस दृष्टि से पुस्तक बहुत उपयोगी है।
यह पुस्तक अवगत कराती है कि-
श्री रामेश्वर शर्मा, रामू भैया एवं श्री जितेन्द्र निर्मोही जी अनेक नवोदित साहित्यकारों के प्रेरणा- स्त्रोत बने। इनके मार्गदर्शन और प्रोत्साहन से अनेक साहित्यकार पुष्पित-पल्लवित हैं। ये साहित्यकारों के उत्साहवर्धन हेतु सदैव ही तत्पर रहते हैं।
श्री रघुनंदन हटीला जी भौतिक साधनों को महत्त्व न देकर मन के सुख को सर्वोपरि मानते हैं। यह सीख सभी आत्मसात् कर लें तो क्या कहना! क्यों भ्रष्टाचार, मिलावटखोरी और जमाखोरी हो? आप मथुरा और कोटा में समाज सेवी संस्थाओं से जुड़कर विकलांग कल्याण और नेत्रदान आदि अनेक सेवा कार्यों में सक्रिय रहते हैं। ऐसे परोपकारी सृजनकार की आत्मा की आवाज है उनकी प्रार्थना की ये पंक्तियां –
इस मन को थोड़ा सुख दे दो,
सब कुछ ही मेरा प्रभु ले लो।
धन्य है यह प्रेरक व्यक्तित्व!
स्व. डॉ.महेन्द्र भानावत जी के प्रेरक वैभवशाली व्यक्तित्व को कौन पाठक शत्-शत् नमन नहीं करेगा? डॉ. भानावत जी ने देश-विदेश के एक हजार से अधिक व्यक्तियों को शोध विषयों से संदर्भित मार्गदर्शन दिया है। विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा प्रस्तुत शोध प्रबंधों का मूल्यांकन व मौखिक परीक्षण भी किया है। आप अपने प्रिय विषयों पर देशभर में आयोजित गोष्ठियों में शोध आलेखों के वाचन,व्याख्यान और प्रस्तुतीकरण की कला में सर्वथा अतुलनीय हैं।
वेदव्यास जी ऐसे सृजनकार हैं जिन्होंने अपनी प्रगतिशील सोच के साथ जनहित को अपनी हर सांस में जिया है। गजसिंह राजपुरोहित जी मायड़ भाषा की मान्यता के लिए 25 वर्षों से प्रयासरत व कटिबद्ध हैं।इस संबंध में आपके नेतृत्व में युवाओं का जुड़ाव अति सराहनीय रहा है।आप हर मंच पर इस मसले को दृढ़ता से उठाते रहे हैं।
श्री श्याम महर्षि जी कीचड़ में खिले कमल की भांति ईमानदारी के गुणों से सुवासित हैं ।आपका चिंतन स्व पर आधारित न होकर सर्व कल्याण पर आधारित है। हिन्दी के विकास के लिए और साहित्य को आगे लाने के लिए आपने डूंगरगढ़ में राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति की स्थापना की और महात्मा गांधी के रचनात्मक कार्यों के अन्तर्गत हिन्दी के प्रचार- प्रसार को अपनी साहित्यिक गतिविधियों का माध्यम बनाया।
वर्तमान में जनमानस में धैर्य और श्रमनिष्ठा की कमी होती जा रही है जो गुणवत्ता को दुष्प्रभावित कर रही है। हमें डॉ.संदीप अवस्थी जी से प्रेरणा लेनी चाहिए। आपने कलेक्टर साहब कहानी एक वर्ष के श्रम से लिखी। तीन बार सुधारी और दिल्ली में कहानी पाठ करने के बाद भी उसमें सुधार किया। अपने कार्य में सुधार की गूंजाइश को समझ लेना और सुधार कर लेना ही श्रेष्ठतम बनने का मार्ग है।
पुस्तक के संबंध में अपने मन्तव्य के स्पष्टीकरणार्थ यहां कुछ साहित्य-साधकों के लेखन पर यत्किंचित् प्रकाश डालना चाहूंगी –
जो लेखनी दोषों को खोद निकालती दिखाई दे,सच मानिए तो वही लेखनी है।
माननीय स्व. अजहर हाशमी जी की लेखनी इस कसौटी पर खरी है तभी वह बुलंदी के साथ कहती है-
शोषण है पूंजी का अत्याचार फैला है,
हर फाइल के बीच में चांदी की दीवारें,
नौकर से अफसर तक भ्रष्टाचार फैला है,
वह साहित्य अतिमहत्वपूर्ण होता है जिसमें देश-समाज की पीड़ा प्रस्फुटित हुई हो और उसका समाधान भी मिलता हो या समाधान की उत्तेजना मिले। परिवर्तन लाने में सक्षम हो। इस दृष्टि से हाशमी जी का साहित्य बड़े महत्व का है।आपका लेखन शिल्प आपके मनोभाव को सीधा हृदय में उतारता है। क्यों न हो,सटीक प्रतीक आपकी कलम को धार जो देते हैं।
सार्वभौमिक मूल्यों का परचम फहराना हाशमी जी की गहरी सोच,अच्छी समझ और सत्य की पकड़ का सबूत है।हाशमी जी के काव्य के रसात्मक वाक्य बहुमूल्य हैं जिन पर सुधी पाठकों को गौर करना ही चाहिए-धर्म मानवता की मुंडेर पर चेतना का चिराग है।
रिश्ते बड़े महत्त्व के होते हैं मंजु चतुर्वेदी जी ने रिश्तों की सूक्ष्म विवेचना की है। आपने कहानीकारों की कहानियों में प्रेम के स्वरूप की तलाश की हैऔर स्वयं प्रेम रस में डूबीं कविताएं लिखी हैं। आपके सृजन में मीरा की भक्ति और उदात्त प्रेम की प्रेरक गहरी अनुभूति है। गहराई लिए हुए डॉ. मंजु चतुर्वेदी जी का भावपूर्ण लेखन बहुत जबरदस्त प्रेरणादायी है। हां,इसे समझने के लिए धैर्य चाहिए। धैर्य की अपेक्षा वाले कार्य ही धैर्य के जनक होते हैं।यदि समय है तो धैर्यवान् हों या अधीर सभी को ऐसी रचनाएं अवश्य पढ़नी व समझनी चाहिए;चाहे किसी की मदद ही क्यों न लेनी पड़े। क्षविशिष्ट अवधेय काव्य पंक्तियां –
‘तुम्हारी रोशनी की नदी में हमारे स्वप्न नहाएं’ – कवयित्री के ये शब्द टनों वज़न रखते हैं। प्रायः अपने स्वप्न में कोई खोट नहीं देखता।उसका दीवाना होकर बेताबी से उसे साकार ही करना चहता है।पर आप इतनी संयमित व उदार हैं कि परिवर्तन के लिए सहर्ष तैयार हैं। आप जिनके प्रति श्रद्धा से परिपूर्ण हैं, उनके ज्ञान और प्रसन्नता की रोशनी से पवित्र हुए स्वप्नों का ही आनन्द लेना चाहती हैं। उन्हें उस रोशनी से अलग नहीं चाहतीं।
मधु माहेश्वरी जी ने कविताओं में मनोहारी दृश्य चित्र खींचे हैं। आपका साहित्य एकता का संदेश देता है। मीनाक्षी पंवार जी की सरल सहज भाषा में कम शब्दों में भाव संप्रेषण की कला द्रष्टव्य है। शुद्ध प्रेम के अहसास से मिलती पूर्ण तृप्ति की अभिव्यक्ति का सुंदरतम निदर्शन भी क्या खूब है …..
अल्फाज़ सारे खतम हैं
मोहब्बत के बाद
मंजिल की चाहत नहीं
उसकी एक नज़र के बाद
आता है तूफान तो आने दे,
कश्ती का खुदा खुद ही हाफिज है।
कुसुम खेमानी जी का सृजन नारी सशक्तीकरण की परिभाषा को गढ़ता है। कहानी व उपन्यास यथार्थवाद पर आधारित हैं। कथासाहित्य में आप बड़ी विलक्षण कलात्मकता से मनुष्य और समाज के परिष्कार की अन्योन्याश्रितता का विधान और विज्ञान रचती हैं। एक पुरुष के भीतर स्त्री और स्त्री के भीतर एक पुरुष का अपने समय की परिवर्तमान प्रक्रिया में द्वन्द्वात्मक अन्वेषण और उसका रचा जाना अद्भुत है।
भाषा में वैविध्य पूर्ण शब्दावलि और मिठास है। आप हिन्दी को बोलचाल की एक नई अर्थवत्ता और भंगिमा प्रदान करती हुई प्रवाह देती हैं।
इकराम राजस्थानी के गीत अपनी अनूठी पहचान रखते हैं। आपने टैगोर जी की कालजयी कृति का दोहा-शैली में काव्यानुवाद ‘अंजलि गीतां री’ के रूप किया है। गीतांजलि काव्य को राजस्थानी में छंद में पिरोकर उनके बिंबों को सरलता एवं गूढ़ता से प्रस्तुत किया है।
ओम नागर की सीधी-सादी शैली भी अद्भुत है। कितनी बड़ी उपयोगी बात कही है……….
दुख मन का है, और मैं खुरचता हूं दुख की देह…
सुख की कोई देह नहीं
न ही सुख का कोई मन
सृष्टि में दुख अमर है।
डॉ.मंजुला सक्सेना जी के भावों की उदात्तता देखिए –
भरती रहूंगी अपने सारे अहसासों के इस कैनवास पर
स्नेह- अनुराग -ममत्व के रुपहले अहसास।
आपने कथात्मक शैली में भी काव्य रचना की। बाल साहित्य भी लिखा ।
नंदू राजस्थानी का बुलंद हौसला प्रेरणास्पद है –
नए खून को इस हौसले की जरूरत है।
फासले हों लाख पर मैं
दूरियां तो तय करूंगा।
समां में बादलों के साथ आगे बढ़ रहा हूं।
स्व. इन्द्र प्रकाश श्रीमाली की पुस्तक‘आवाज का जादू’ मंच संचालन की बारीकियों, उच्चारण, पोज़ेंज़,स्ट्रेस,पंचूएशंस की पूरी जानकारी देती है।
हेमराज सिंह ‘हेम’ जी के काव्य में राष्ट्रप्रेम और ओजस्विता द्रष्टव्य है-
-अधरों की अब त्याग गुलामी,
वीरोचित नवदीप जलाना।
विश्वामित्र दाधीच जी ने राजस्थानी में मनमोहक गीत रचे हैंं।आपने लोकजीवन की शैली को उजागर करते हुए सामाजिक व पारिवारिक समस्याओं व हास्य विनोद को लेखन का केन्द्र बनाया है।भजन ,दोहे ,सौरठे कविताएं,बाल कविताएं, उपन्यास व संस्मरण भी लिखे हैं।
स्व. डॉ. महेन्द्र भानावत जी नेलोक संस्कृति का श्रमसाध्य अध्ययन किया है। आप खास कर जनजातीय संस्कृति पर लिखते हैं।आपका लोक साहित्य विश्व लोक साहित्य बन गया है। आपकी एक दर्जन से अधिक पुस्तकें आदिवासी जीवन-संस्कृति पर हैं । आपका सर्वाधिक लेखन व प्रकाशन लोकसाहित्य-संस्कृति-कला के अछूते व अज्ञात विषयों पर है। आप विशेष रूप से स्तंभकार के रूप में जाने जाते हैं। आपके संस्मरण और परिचर्चाएं भी प्रसारित हुई हैं।
सत्य को उजागर करते डॉ.अतुल चतुर्वेदी जी के व्यंग्य, अभिव्यक्ति कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यथा….
-‘खरीद लेंगे मुस्कान फेंककर विश्वास
शब्द बिखेरकर भोलापन’
-‘चुनाव नहीं है यह आपकी परिपक्वता के निर्णायक क्षण हैं।’
शोषण, समाज में स्त्रियों की दशा और स्थिति,प्रेम की धारा और ज्वलंत हैं समस्याएं आपके साहित्य सृजन के आधार हैं। अतुल जी के शब्दों में लड़की की विवशता देखिए…
‘उसे पीना है उतना ही पानी
और सोना है उतना ही
जितना कहे पिता और शास्त्र’
अतुल कनक जी गहरे तक समाई प्रेम की अनुभूति को यों अभिव्यक्ति देते हैं ……
‘अनगिनत रंग बिखरे हैं मेरे चारों ओर
हर रंग में से चुनता हूं
तुम्हारे साथ बीते क्षणों की सुधियां।’
– ‘स्मृतियों का रंग कविता
यही नहीं कृष्ण-भक्ति के रस में भीगी आपकी प्यासी मनुहार भी चुनौती देती है, इष्ट देव को-
“तुम घनश्याम हो तो बरसना ही होगा तुम्हें प्यासी मनुहारों पर……छुप सको तो फिर भी छुपा लेना
अपने आप को” आपने राजस्थानी में उपन्यास लिखे हैं। राजस्थानी भाषा के तो आप सिद्धहस्त साहित्यकार हैं।
जितेन्द्र निर्मोही जी बहुआयामी अद्भुत सशक्त व्यक्तित्व और कृतित्व के धनी हैं।आप जीवन- दर्शन व सांस्कृतिक निष्ठा के कवि हैं।आपको हाड़ौती के साहित्यकार पितामह भी कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।आप प्रबंध काव्य और खण्ड काव्य भी रच चुके हैं।आपकी अनेक वंद्य विशिष्टताएं हैं। साहित्य सृजन का फलक व्यापक है।
वियोग हो या श्रृंगार ,लगता यों
काव्य कला अभिव्यक्ति को,
स्वयं ही किया करे मनुहार ।
श्रृंगार रस से पगी ये अभिव्यक्ति तो देखिए ..
पड़ी प्रीत पाटकली सूनी दूर बस्या मनमीत
हिंडोलो रीतो जावै छै,बैरी गीत न भावै छै
आप कथा साहित्य में भी प्रेम और रोमांस लिखते हैं। आदरणीय निर्मोही जी की दृष्टि इतनी सक्षम है कि विशालता के अंतिम छोर तक पहुंचती है। यह बात नारी की महिमा के गान में देखिए-
“संपूर्ण सृष्टि उसका आंचल
वह धरती है या गगनांचल”
आप श्रृंगार के अनूठे गीतकार हैं और देश के 350 श्रेष्ठ गीतकारों में से एक हैं।
पारंपरिक लेखन से आधुनिकता को छूती किशन प्रणय जी की कविताएं लेखन और उससे जुड़े अनुभवों के हर आस्वाद के साहित्य के प्रति अपने समर्पण के निशान छोड़ जाती हैं।आपकी उच्च कोटि की साहित्यिक रचनाएं संवेदना के स्तर और शिल्प की दृष्टि से एक नए कैनवास की रचना करती हैं। पंक्तियां द्रष्टव्य हैं …….
अर्थ उगे स्वाद द़फ्न
रेंगती-सी पंक्तियों में
संवाद द़फ्न
हाड़ौती भाषा के लेखन में नए विषय और नई सोच दिखाई देती है-
बळता अरमान कर्या छै,चरड़ चरड़
दनभर बळबा की हूंस छै पण उम्मीदां का
बळीता ई कोईनै।
कृष्णा कुमारी जी की कविताओं में सर्वतोमुखी काव्य सौष्ठव द्रष्टव्य है। इनसे काव्य रसिक तो आह्लादित होंगे ही नई पीढ़ी को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा। अनेकानेक विषयों पर आपके दोहे, गीत, ग़ज़ल व कविताएं उल्लेखनीय हैं। श्यामा शर्मा जी का बाल-साहित्य बच्चों के ज्ञान वर्धन एवं मनोरंजन की दृष्टि से बड़े महत्व का है।यह मनोवैज्ञानिकता एवं रौचकता से भरपूर होने तथा सरल भाषा में होने से सम्प्रेषण गुण सम्पन्न है। रघुनंदन हटीला जी
प्रायः छंदबद्ध लिखते हैं । आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारधारा के कवि हैं। आपने महाभारत के प्रसंगों पर मुक्तक लिखे हैं। आपकी रचनाओं में कथ्य और शिल्प अनुकरणीय है। हटीला जी के साहित्य में प्रकृति-सौंदर्य भी लुभाता है। विस्तृत शब्दकोश और गंभीर विषयों पर खूबसूरत अभिव्यक्ति आपको अतिविशिष्ट बनाती है।
रामू भैया हास्य-व्यंग्य की सरस रचनाएं करने और सामयिक विषयों पर लिखने में रामू भैया बड़े दक्ष हैं। इसके उदाहरणार्थ ये चंद पंक्तियां भी काफी हैं……
बुरी तरह से इन्द्र देव ने,खाकर हम पर खार।
बातचीत में किया बंधुओ , जब्बर वाक् प्रहार।
राजस्थानी भाषा में ग़ज़ल लिखने में आप अपना सानी नहीं रखते। आपकी कृतियों में सामाजिक सद्भावना का उल्लेख तथा विसंगतियों पर करारा प्रहार हुआ है।जीव-जगत् के अनेक तथ्यों को आपने बड़े ही सहज सरल ढंग से अभिव्यक्त किया है। आपकी कविताओं का मुख्य स्वर सामाजिक जागरूकता,परस्पर सामंजस्य स्थापना तथा राष्ट्रीय भावना का प्रचार-प्रसार है। अतः आपका पद्य साहित्य लोकसाहित्य बनकर जन -जन की प्रेरणा का आधार बिंदु बन गया है। आपकी गीत पुस्तिका ‘हरिद्वार से द्वार द्वार ‘का सीधा प्रसारण आस्था चैनल द्वारा 159 से भी अधिक राष्ट्रों में देखा गया। वंदेमातरम् गीत का हिंदी काव्यानुवाद 15 भाषाओं में 15 लाख प्रतियों में किया गया।
रश्मि गर्ग विषमता में धैर्य से जीना सिखाती हैं। अपने आलेखों द्वारा आपने विषमता में समता से जीने की कला सिखाई है। उम्दा सीख देती इनकी की काव्य पंक्तियां तो देखिए …..
“कुछ पतझड़ आहट देते हैं, महसूस कर लेना उस आहट को,
बसन्त बन जाना तुम उनके,पत्थर आने से पहले ’’
डॉ. इंदुशेखर-विचारों के माध्यम से आप काव्य कर्म के मर्म को उभारते हैं। भारत को समझने के लिए आपकी पुस्तक ‘हिन्दुत्व एक विमर्श ‘’बड़ी उपादेय है। इसके द्वारा हिन्दुत्व की मनमानी व्याख्या कर जो भ्रामक निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं उन्हें दूर करने का प्रयास किया गया है ।आपका लेखन भारतीय संस्कृति और संस्कारों की तात्त्विक विवेचना से उभरकर पौराणिक संबंधों की व्याख्या करता है।साथ ही समसामयिक संदर्भों पर गंभीरता से विश्लेषण प्रस्तुत कर दिशा देता है।
डॉ.वैदेही गौतम आशावादी भावनाओं को जगाना बड़ा ही महत्वपूर्ण कार्य है जो संजीवनी बूंटी- सा सिद्ध हो सकता है। डॉ.वैदेही गौतम अपने साहित्य द्वारा यह कार्य कर रही हैं। आपका साहित्य सर्वतोमुखी श्रेष्ठ है। साहित्य रसिकों को अवश्य इसका आस्वादन करना चाहिए। द्रष्टव्य है ……
पुनः पुनः हार का रसास्वादन जीत की ओर अग्रसर करे
पुनः पुनः जीत का रसास्वादन हार में हिम्मत धरे
दीनदयाल शर्मा जी राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित बाल-साहित्यकार हैं। आपके साहित्य की महत्ता है कि आपकी रचनाएं कई राज्यों के विद्यालयी पाठ्यक्रम में शामिल हैं। हिंदी और राजस्थानी में आपकी 63 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इतना ही नहीं ‘दीनदयाल की चौपाल’ से आप देशभर के साहित्यकारों की कहानियों व बाल कविताओं का यू ट्यूब चैनल से वाचन करते हैं जिसे बच्चे ही नहीं बड़े भी बड़े चाव से सुनते हैं और इनकी नई रचनाओं का इन्तज़ार करते हैं।
डॉ. विमला भंडारी जी बाल साहित्यकार हैं और आदिवासी अंचल सलूंबर जिला मुख्यालय से दुनिया में बाल साहित्य का प्रतिनिधित्व करती हैं। आपकी संस्था ‘सलिला‘आपकी कर्मनिष्ठा,पूर्ण समर्पणदृष्टिकोण और व्यापक सोच से राष्ट्रीय स्वरूप ले चुकी है। डॉ.विमला भंडारी जी के लेखन पर विद्वान् लेखकों ने शोध ग्रंथ लिखे और संपादन किया। इनकी पुस्तकों को महाराष्ट्र पुणे के कक्षा 6के पाठ्यक्रम में रखा गया है। ‘पृथ्वी ने मांगीचप्पल’ पाठ्यपुस्तक- टिप टिप टॉय सीरीज में शामिल है। आपकी पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ है।
रामस्वरूप मूंदड़ा हाइकु में सिद्धहस्त हैं। विश्व हाइकु कोश में आपके हाइकु शामिल हैं। सुदूर का लक्ष्य भी नज़रें गाड़ देने पर, इच्छा शक्ति व आशा की डोर थमाए प्रयत्नरत रखता है। लक्ष्य शनै:शनै: निकट आता है और एक दिन सफलता प्राप्त हो जाती है।ऐसी सीख देती आशा का सशक्त संबल देती रामस्वरूप मूंदड़ा जी की ये काव्य पंक्तियां तो देखिए ……
ये झुका गगन,ये उठे नयन, दूरी को भरते जाते हैं।वाह, क्या बात कही है आपने!
विजय जोशी जी निष्पक्ष और बेबाकी से सभी विधाओं पर पुस्तक पढ़ने की लालसा जगाने वाली सटीक समीक्षा लिखते हैं।आप श्रेष्ठ कहानीकार भी हैं। कहानियों द्वारा आपने पारिवारिक बिखराव सामाजिक व प्रशासनिक विसंगतियों को उजागर किया है है । आपकी कहानियां मार्मिक एवं आदर्शोंन्मुखी हैं जो समस्याओं के समाधान का संकेत भी देती हैं। पाठकों को सोचने के लिए मजबूर करती हैं और अच्छी सीख देती हैं।
राजेन्द्र केडिया जी की कहानियों के कथानक सर्वथा नवीन एवं मौलिक हैं। पाठकों को देश व राजस्थान की पुरातन लोक-संस्कृति तथा परंपरागतजीवनमूल्यों से अवगत कराने के उद्देश्य से आप लोककथा शैली में कहानियां लिखते हैं। आपने अपनी जमीन से जुड़ी राजस्थानी भाषा की बीस हजार से अधिक कहावतों का संग्रह किया है। इनमें राजस्थान की लुप्त होती संस्कृति आत्मा और मूल संस्कृति संरक्षित है।इन कहावतों के मूल विषय-वस्तुपरक संकलन का उद्देश्य ऊंच-नीच की भावना को दूर कर आपसी सद्भाव और भाईचारे को बढ़ाना है।
*राजेन्द्र राव की कहानियों का हर वाक्य लंबे अनुभव से तपकर निकला है। रिश्तों, प्रेम, परोपकार, संस्कारों केऊहापोह,भारतीय यात्राओं, मेकेनिकल लाइफ और स्वामिभक्ति में कुत्तों की सी हरकत पर उतर आते मनुष्यों की कहानियां हैं। आपने उपन्यास व रिपोर्ताज भी लिखे हैं।
रमाकांत उद्भ्रांत जी की कविताओं में अद्भुत संप्रेषणीयता है। गहरे भाव हैं। आपका साहित्य भाषा प्रयोग की दृष्टि से भी उत्कृष्ट है।नई पीढ़ी को इससे प्रेरणा लेनी चाहिए और इसे अपना आदर्श बनाना चाहिए। आपकी कविता-रुद्रावतार पर लघु शोध भी लिखा गया है। स्वयंप्रभा खंडकाव्य को मुंबई विश्वविद्यालय के स्नातक पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।गीत-कांटों का प्रतिवेदन महाराष्ट्र के 12वीं कक्षा के पाठ्यक्रम में रखा गया। डॉ.विकास दवे बाल-साहित्य के मर्मज्ञ हैं और मानद संपादक के रूप में बाल साहित्य के उत्थान के लिए कटिबद्ध हैं। भारत के हर प्रांत से देश के नामचीन 124साहित्यकारों ने आपकी साहित्यिक यात्रा को अपनी-अपनी विधाओं में बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है । डॉ.अखिलेश पालरिया जी ने मानवता और संवेदनशीलता की स्याही में डूबी हुई लेखनी से अपनी स्वभावगत मानवता को सृजन में ढालकर समाज को सुधारने का प्रयास किया है ।
डॉ.संदीप अवस्थी का साहित्यिक फलक वैश्विक स्वरूप लिए हुए है।कविता कहानी व्यंग्य नाटक आलोचना,संवाद व उपन्यास लेखन से आपने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता प्राप्त की है।
‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं’ जैसी कुछ कहानियों से आपको वैश्विक ख्याति मिली।
आपकी आर्टिस्ट कहानी बहुत प्रचलित हुई और इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता मिली। इनकी कलेक्टर साहब कहानी ने तो सनसनी मचा दी।
अगर मर भी मैं जाऊं तो जरा एहसान कर देना
वतन के नाम पर बेटे को भी कुर्बान कर देना
डॉ.मधु खण्डेलवाल जी उदात्त भावों की प्रेरक हैं। कितने उम्दा विचार हैं उनके…….
मैं सम्मान ही देना चाहती हूॅं उन्हें
जो करते हैं नफरत मुझसे सदा
ताकि प्रेम जिंदा रहे मुझ में….
मैं प्रार्थना करती हूॅं हक में
जिन्होंने गलत ही किया मुझसे
ताकि शान्ति सलामत रहे मुझ में….
डॉ. नन्द भारद्वाज जी हिन्दी व राजस्थानी के प्रतिष्ठित साहित्यकार, साहित्य आलोचक व चिंतक हैं।आपकी बौद्धिक क्षमता, सृजन कौशल, साहित्यिक अन्वेषण दृष्टि के सभी कायल हैं। यही करण है कि आप देश के साहित्यपटल पर शोभायमान ध्रुव तारे हैं।
वेदव्यास जी प्रगतिशील लेखक ,चिंतक और विचारक हैं। शिक्षा , साहित्य, कला, संस्कृति और पत्रकारिता के क्षेत्र में अनवरत लेखन कर रहे हैं। सामाजिक विकृतियों, विद्रूपताओं, अन्याय व अनीति के खिलाफ सतत् संघर्षरत रहे हैं। नीरज दइया जी ने लेखन के अतिरिक्त राजस्थानी भाषा साहित्य के क्षेत्र में समालोचना व नवाचार भी किया है जिसे बहुप्रतिष्ठत साहित्यकार श्री जितेन्द्र निर्मोही जी ने अप्रतिम और अनूठा कहा है।
उनके अनुसार आपने परंपरा को बदलते हुए राजस्थानी भाषा साहित्य को खंगालकर हरेक अंचल के ऐसे साहित्यकार पर भी कलम चलाई जिनको प्रकाश में लाना आवश्यक था। आपकी कृति ‘आंगळी-सीध’राजस्थानी साहित्य के लिए मील का पत्थर है। श्री श्याम महर्षि जी के काव्य- संग्रह ‘उकळती ओखळ’,’सांच तो है’ ,’गवाड़ अर अड़वो’,’मेह सूं पैल्या’ आदि इनकी प्रगतिशील चेतना के संवाहक एवं लोक चेतना के आदर्श उद्धरण हैं। आपने सशक्त रचना कौशल से समाज को झकझोर दिया है आपकी रचनाएं समाज को हिम्मत देती हैं।राजस्थान की संस्कृति पर महर्षि जी पंक्तियां तो देखिए …
जिंदगानी रो दरसण स्वरूप/ गाभा है
आपणै समाज रा/ चुंदड़ी अर साफा है।
राजेन्द्र पी.जोशी जी की कहानियां व कविताएं जनमानस को बखूबी जागरूक करती हैं। समाज के उपेक्षित और वंचित वर्ग की समस्याओं और जीवन को आपने अपनी रचनाओं में नई सोच, दृष्टिकोण और प्रगतिशील विचारधारा के साथ उभारा है।बी.एल.आच्छा जी राष्ट्रीय स्तर पर व्यंग्यकार के रूप में जाने जाते हैं। इससे भी बढ़कर समालोचक के रूप में आप विख्यात हैं। लघु कथाकार भी हैं।आपके व्यंग्य, व्यंगरसिकों को किस कदर गुदगुदा सकते हैं, इसका अनुमान निम्न प्रेरक उद्धरणों से लगाया जा सकता है …….
“अभी राजनीति की आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का अवतार हुआ नहीं है तो कम्प्यूटरी बाबाओं से राजनीति के फेशियल का नया कोण उपजा है। वे ही पॉलिमेथेमेटिक्स के गुरु बताते हैं, किसके साथ तत्थई की कौन-सी पदचाप मिलाकर घुंघरू बजाएं तो सत्ता की कुर्सी के पाए स्थिर हो जाएं।”
प्रभात गोस्वामी जी की व्यंग्य लेखन की शैली में विशेष अपनापन होता है। आपके व्यंग्य- संग्रह अनेक विसंगतियों के सूक्ष्म पर्यवेक्षण और समस्याओं की गहन पड़ताल कर जिम्मेदारी के साथ रचे गए हैं। आपके ध्येय में सकारात्मकता मुख्य है।आप दक्ष कार्टूनिस्ट भी हैं। फारुख आफ़रीदी जी व्यंग्य लेखन में राष्ट्र स्तर के लोकप्रिय रचनाकार हैं।’मीन मेख’, बुद्धि का बफर स्टॉक और ‘ धन्य है आम आदमी’आपके व्यंग संग्रह हैं। ‘धन्य है आम आदमी’की समीक्षा 70 सेअधिक प्रतिष्ठित व्यंग्यकार कर चुके हैं। आफरीदी जी की व्यंग्य रचना मीठी मार करती हुई वर्तमान का गर्त दिखाती है। बखूबी व्यवस्था की पोल खोलती है।आपने प्रौढ़ों,नव साक्षरों व बच्चों के लिए कहानियां कविताएं भी लिखी हैं।व्यवस्था के विरोध में आपकी कविताएं बहुत कुछ कहती हैं।कविताओं में प्रेम और सद्भाव भी मुखर है। कविताओं से आप वंचित वर्ग के पैरोकार के रूप में भी सामने आते हैं।
शिखा अग्रवाल जी उम्मीदों की दीपशिखा हैं। आपकी रचनाओं में प्रेम का प्रकाश है और है संकल्प की दृढ़ शक्ति व अनूठा अभिव्यक्ति कौशल । नारी विमर्श की कविता में अभिव्यक्ति के पेंतरे तो देखिए ….
बोल भारत तू ने क्या देखा?
“पद्मावत के जौहर में नारी को देखा,
लक्ष्मीबाई की कटार में नारी को देखा,
हाड़ा रानी के कटे शीश में नारी को देखा।
बोल भारत…..”
डॉ.अपर्णा पांडेय जी की उम्दा सोच, मौलिक सृजन, कथ्य एवं शिल्प सभी अत्यंत श्लाघनीय हैं। आपके कृतित्व को अधिकाधिक पाठकों द्वारा पढ़ा जाना चाहिए।आप बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न रचनाकार हैं।आप जीवनमूल्यों से भरपूर एवं सरस संस्कृत के महानतम साहित्यिक,
धार्मिक व दार्शनिक ग्रन्थों का सुंदरतम अनुवाद एवं काव्यानुवाद हिन्दी में कर भारत के समृद्ध ज्ञान को सुगम बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही हैं।
श्रृंगार, वीर और करुण रस से आल्हादित करने वाली रचनाकार डॉ. प्रीति मीना जी की प्रेम का सही स्वरूप समझाती ……..
सीमित दायरे के संकीर्ण गलियारों में
मत समेटो विराट प्रेम को
स्त्री या पुरुष देह में ही अगर
तुम प्रेम खोजते हो तो
कदाचित् भूल में हो तुम…!!
इसी सूक्ष्म प्रेम ( दया, करुणा, मानवता) की डोर सेअब तक यह धरती जिन्दा है।
डॉ. रति सक्सेना जी संस्कृत की विदुषी और वेदशोधकर्ता हैं। आपकी भाषा बड़ी समृद्ध है।लेखक प्रभात सिंघल जी के अनुसार आप में एक खास किस्म की दृष्टि है जिससे आप एक छोटी कविता को महाकाव्य का रूप दे पाती हैं। आपने दुनिया की सैर कर यात्रा वृत्तांत लिखे हैं। आपके साहित्य से बहुत कुछ सीखा जा सकता है।
*अपनी रचनाओं से जागृति लाने का प्रयास करने वाले भगवत सिंह जादौन ‘मयंक’के साहित्य की सुंगध का परिचय देने के लिए उनकी चंद काव्य पंक्तियां काफी हैं……
हमारे देश के लीडर घिरे लाखों सवालों से
हमारे देश की संसद हवालातों से कायम है
यहां आतंक का चेहरा निशानातों सेकायम है ।
रात को विषय बनाकर लिखी कविता का क्या कहना!
उलझ उजाला अंधकार से थककर चकनाचूर हुआ
दिनभर तपते सूरज का दर्द दलन कर जाती रात
समेट कर दिन के पंखों को नीड़ों में धर देती है
दिन तो दूना ही रह जाता और चौगुनी आती रात
सी.एल सांखला जी ने गद्य व पद्य की लगभग सभी विधाओं में कलम चलाई है।आप राजस्थानी बाल कहानियां, राजस्थानी छंद, पुस्तक समीक्षा व भूमिका लेखन में सिद्धहस्त हैं। ग्रामीण जन-जीवन की व्यथा को समझने के लिए भी सांखला जी का साहित्य पठनीय है। श्री जयप्रकाश पाण्ड्या,मोहन वर्मा,दिनेश कुमार माली, डॉ.चंद्रकान्ता बंसल एवं ऋतु भटनागर जी की लेखनी ने भी कवि धर्म का निर्वाह सुष्ठुरूपेण किया है।
अन्ततः डॉ. प्रभात सिंघल जी का राजस्थान के साहित्य साधक स्वरूप में पुस्तक लेखन सौद्देश्य, सार्थक एवं विशिष्ट समादरणीय है ।यह पुस्तक राजस्थान के साहित्यकारों की लेखनियों का एकीकृत उजास है। यह ज्योति पर्व का महासरस्वती पूजन का थाल है
जिसमें राजस्थानी साहित्य साधना की जोत के बिम्ब- प्रदीप आलेख स्वरूप संजोए गए हैं, जिन्हें डॉ. प्रभात सिंघल जी की उत्कट अभिलाषा और उद्योग की अग्नि शलाका द्वारा उद्दीप्त किया गया है।
राजस्थान में जन्मे,यहां आकर बसे व राजस्थान के प्रवासी रचनाधर्मियों की कलम के उजालों का उजास है जिसकी रश्मियां पंछियों की चहक से शब्दायमान प्रभात वेला की भांति ‘उत्तिष्ठ जागृत भव’ का संदेश देती, राजस्थान के साहित्यकारों के समूचे साहित्य उदधि में अवगाहन का आनंद लेने की गुहार लगाती- सी प्रतीत होती हैं।

