जब शिक्षा मंत्रालय अपने आँकड़ों की स्वर्णिम थाली बजाता है और कहता है, “देखो! समावेशन का सूर्य उदित हो चुका है”। तभी धरती के किसी भूले-बिसरे ग्राम में एक जर्जर पाठशाला अपनी अंतिम साँस लेती है। पाँच वर्षों में अठारह हज़ार से अधिक (18,000+) गुरुकुल-सदृश विद्यालय लोक से विलुप्त हो गए, मानो किसी अदृश्य यज्ञ में उनकी आहुति दे दी गयी हो। एक दशक में तिरानबे हज़ार से अधिक (93,000+) शिक्षालय विलय के नाम पर निगल लिए गए। जैसे, शिक्षा नहीं, राज्य का कोई भूगोल सुधारा जा रहा हो।
उधर, निजी विद्यापीठों की इंद्रसभा में पुष्पवृष्टि हो रही है! एक ही वर्ष में आठ हज़ार से अधिक नवीन शुल्क-देवालय अवतरित हुए। जहाँ प्रवेश का मंत्र “फीस स्वाहा” है और ज्ञान की देवी का वाहन अब ईएमआई है। यह कलियुग का नया उपनिषद है, “जो देयकं ददाति, सः विद्यां लभते” या “यः शुल्कं ददाति, स एव विद्यां प्राप्नोति”।
इधर आरक्षण पर महासमर छिड़ा है। यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन ने आदेश दिया है, कि हर विद्यापीठ में शिक़ायतों की समितियाँ बनें। मानो धर्मराज की न्यायसभा उतर आयी हो। सोशल मीडिया के क्षत्रिय की-बोर्डों पर शस्त्र उठाए खड़े हैं; कोई 15%, कोई 7.5%, कोई 27% का शंखनाद कर रहा है। संविधान के श्लोकों में अनुसूचित जाति को 15% और अनुसूचित जनजाति को 7.5% का वरदान मिला, फिर मंडल के महामंत्र से अन्य पिछड़े वर्गों को 27% का कवच प्राप्त हुआ। कुल मिलाकर अर्धशतक की मर्यादा। जिसे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने “लक्ष्मण-रेखा” कहकर अंकित कर दिया। फिर 2019 में 10% का एक और वर, ‘आर्थिक रूप से दुर्बल सवर्णों के लिए’ मानो देवताओं की सभा में एक अतिरिक्त आसन जोड़ दिया गया हो।
परन्तु, हे नीति-पुरुषों! प्रश्न यह नहीं कि स्वर्ग के द्वार पर कितने प्रतिशत का पुष्पचिह्न अंकित है? प्रश्न यह है, कि पृथ्वी पर वह पगडंडी ही कहाँ है जो स्वर्ग-द्वार तक ले जाये? जब मूल विद्यालय ही बंद हो जाएँ, जब ग्राम की सरस्वती-धारा ही सूख जाये, तब ‘आरक्षण का अमृत-पात्र’ किसे और कहाँ प्रदान करोगे?
आप कहते हो, “देखो! भागीदारी बढ़ी है; 3.85 करोड़ से 4.13 करोड़ तक पहुँच गयी!” अहो, अद्भुत! किंतु, जिनके गाँव की पाठशाला विलीन हो गयी, जिनके घर से निकटतम विद्यालय अब सात कोस दूर हैं, जिनकी जेब में बस किराये का भी वरदान नहीं, उनके लिए यह संख्या-पुराण किस काम का? वह तो अभी वर्णमाला के द्वार पर ही खड़े हैं; तुम उन्हें विश्वविद्यालय के सिंहासन का स्वप्न दिखा रहे हो!
यह वैसा ही है, जैसे किसी वनवासी को कहो, “तुम्हारे लिए राजमहल में आधा आसन सुरक्षित है” …और उसी क्षण उसका वन ही नीलाम कर दो। पहले बीज छीनो, फिर फल पर वाद-विवाद करो; पहले गुरुकुल गिराओ, फिर ‘प्रवेश-प्रतिशत’ पर धर्मयुद्ध छेड़ दो! कलियुग की यह लीला अद्भुत है!
अंततः आरक्षण का प्रश्न तो महाभारत का चक्रव्यूह है; कौन भीतर जाए? कौन बाहर रहे? परंतु, उससे भी बड़ा प्रश्न यह है, कि अभिमन्यु को युद्धभूमि तक पहुँचने का रथ मिला भी या नहीं? जब मूल शिक्षा ही विलुप्त हो रही हो, तब प्रतिशतों की यह बहस ऐसे है, जैसे शून्य में राजसूय यज्ञ; धुआँ बहुत, अग्नि नहीं; घोष बहुत, प्रकाश नहीं!

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